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अनूठा कर्म कौशल

इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि पर विशेष: इंदिरा जी स्वभाव से कम बोलती थीं। एक तरह से वे शून्य से अंक बना लेती थीं। उनकी स्पष्टवादिता अक्सर भ्रम पैदा करती रही। वे इस भ्रम में से ही अपना मार्ग निकालती रहीं।  

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indira gandhi

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प्रवीण छाबड़ा, टिप्पणीकार

भगवान महावीर के निर्वाणोत्सव पर 25 अक्टूबर 1984 को नई दिल्ली में इंदिरा गांधी के आवास पर जैन मुनि नगराज के सान्निध्य में राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में एक समारोह हुआ था। इस समारोह में शामिल हुए करीब पचास श्रावकों में जैनेन्द्र कुमार व कन्हैयालाल सेठिया जैसे लोगों के साथ मैं भी मौजूद था। भगवान महावीर के अहिंसा व अनेकांत के सिद्धांत पर चर्चा करते हुए तब इंदिरा गांधी ने धर्म, जाति व सम्प्रदाय की दीवारों से ऊपर उठकर देश के नवनिर्माण का संकल्प करने की बात कही थी।

समारोह के बाद अनौपचारिक चर्चा में मैंने उनसे जयपुर के एक वयोवृद्ध अंकशास्त्री की उस भविष्यवणी का जिक्र किया जिसमें निकट भविष्य में उनके जीवन के खतरे की आशंका बताई गई थी।

मुझे याद है, तब इंदिरा गांधी के तेवर तीखे हो गए थे। उन्होंने कहा द्ग 'आपको देश पर बढ़ता खतरा नजर नहीं आ रहा है, मेरे खतरे को छोडि़ए, देश को बचाइए।' लेकिन अनहोनी हो गई और 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा जी पर हमला हुआ और वे हिंसा की बलि चढ़ गईं। इंदिरा जी स्वभाव से कम बोलती थीं। मौन साधकर अपने को समेटना और विस्तार करना जानती थीं। एक तरह से वे शून्य से अंक बना लेती थीं। उनकी स्पष्टवादिता अक्सर भ्रम पैदा करती रही। वे इस भ्रम में से ही अपना मार्ग निकालती रहीं। यह ऐसा कर्म कौशल रहा, जो उनका अपना था।

वर्ष 1977 में चुनाव कराने का निर्णय इतना अनपेक्षित था कि उनके सहयोगियों को भी यह फैसला दुस्साहसिक लगा। चुनाव में कष्ट भरी पराजय के बावजूद इंदिरा जी झुकी नहीं, टूटी भी नहीं। साथियों को सम्बल देने के साथ दृढ़ता से मुकाबला करने का हौसला देती रहीं। उन्होंने कांग्रेस को जीवंत करने का अभियान चलाया और नए संगठन को खड़ा कर दिया। इसी तैयारी में वे जयपुर भी आईं। संवाददाताओं से बातचीत के बाद अल्पाहार के लिए जा रही थीं, तो अचानक ठिठकीं। कहने लगीं- 'मैं मलहम लेकर निकली हूं। लोग कहते हैं कि मैंने बहुतों को घायल किया है। देखती हूं, कहां किसे कितना मलहम लगा सकूंगी।'

इतना सब कहने के बाद फिर बोलीं- 'घायल तो मैं भी कम नहीं हुई हूं। पर मेरे लिए कहां से मलहम आएगा, मैं नहीं जानती।' उन्होंने जिस अंदाज से कहा, उसे तब मैं आत्मसात नहीं कर सका। पर हमने देखा कि उनका साथ छोडऩे वाले बहुत से लोग वापस आने लग गए थे।

(वरिष्ठ पत्रकार। समसामयिक विषयों पर लेखन।)