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ग्लोबल वार्मिंग से बचने के लिए विकसित किए जाएं विशेष जोन

डॉ. अतुल अग्रवालभारतीय प्रबंधन संस्थान सिरमौर, हिमाचल प्रदेश मैदानों से लेकर पहाड़ों ने इस वर्ष गर्मी के सभी रेकॉर्ड तोड़ दिए। यह सर्वविदित है कि तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने में वन बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। हम सभी जानते हैं कि विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। पेड़ मुख्यत: […]

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Global Warming

डॉ. अतुल अग्रवाल
भारतीय प्रबंधन संस्थान सिरमौर, हिमाचल प्रदेश

मैदानों से लेकर पहाड़ों ने इस वर्ष गर्मी के सभी रेकॉर्ड तोड़ दिए। यह सर्वविदित है कि तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने में वन बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। हम सभी जानते हैं कि विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। पेड़ मुख्यत: शहरीकरण, विभिन्न प्रकार के उद्योग स्थापित करने, फर्नीचर, ईंधन इत्यादि प्राप्त करने एवं सड़कों को बनाने तथा चौड़ा करने के नाम पर काटे जा रहे हैं। बड़े - बड़े बांध बनाने, कृषि योग्य भूमि विकसित करने एवं आग लगने की घटनाओं से भी वन सम्पदा का नुकसान हो रहा है। केंद्र एवं राज्य सरकारों ने हरे पेड़ काटने पर रोक लगाई हुई है, परन्तु यह रोक वन माफिया के हाथों को बांधने में नाकाफी साबित हुई है।
वन एक कार्बन सिंक की तरह काम करते हैं एवं वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों को अवशोषित कर प्राणवायु ऑक्सीजन उत्सर्जित करते हैं। ग्लोबल वार्मिंग की रोकथाम के लिए वनों का संरक्षण एवं विकास अत्यंत आवश्यक है। इस बात को ध्यान में रखते हुए ही भारत सरकार ने वनों के विस्तारीकरण का लक्ष्य इस प्रकार से रखा है ताकि 2030 तक 2.5 से 3 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड को वन रूपी कार्बन सिंक के माध्यम से अवशोषित किया जा सके। वृक्ष लगाने के साथ- साथ उनकी कटाई रोकना भी बहुत आवश्यक है। पेड़ों को बचाना एवं लगाना, दोनों ही हमारा प्रकृति के प्रति निस्वार्थ भाव दर्शाता है। यह एक प्रेरणात्मक एवं आनंदमयी जुड़ाव है जो सदियों से चला आ रहा है। लगभग 300 वर्ष पहले जोधपुर के खेजड़ली गांव में विश्नोई समाज के 363 लोग पेड़ों की रक्षा के लिए उनसे लिपट गए एवं पेेड़ों के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। कुछ ऐसा ही एक आंदोलन वर्ष 1970 के दशक में उत्तराखंड के चमोली जिले में शुरू हुआ था जो कि बाद में चिपको आंदोलन के नाम से जाना गया। जब ये दोनों आंदोलन हुए तब ग्लोबल वार्मिंग जैसे शब्द कहीं चलन में ही नहीं थे और साक्षरता दर बहुत कम थी परन्तु वृक्षों की उपयोगिता शायद उन लोगों को आज से ज्यादा पता थी।
विभिन्न संगठन एवं सरकारें वृक्ष बचाने एवं लगाने की दिशा में सराहनीय काम रहे हैं परन्तु सिर्फ पौधों को लगाने से कुछ नहीं होगा, उनको पालना भी होगा। अभी तो लगाए गए ज्यादातर पौधे या तो पानी और खाद के अभाव में सूख जाते हैं या फिर विभिन्न पशुओं एवं समाजकंटकों द्वारा खराब कर दिए जाते हैं। रोपित पौधों को एक यूनिक आइडी देकर रियल टाइम मॉनिटरिंग करने के बारे में जल्दी सोचा जाना चाहिए। भारत में बड़े शहरों के साथ-साथ अब छोटे शहर भी प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। पेड़ों के अभाव में कंक्रीटनुमा शहर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के चलते बेचैन से प्रतीत होते हैं। हर जिला एवं तहसील स्तर पर स्पेशल एनवायरनमेंट जोन (सेज) अर्थात विशेष पर्यावरण क्षेत्र बनाए जाने चाहिए। इस तरह के सेज में आधुनिक तकनीक की सहायता से सघन वृक्षारोपण किया जाए। इसी के साथ सड़कों के दोनों किनारों पर तथा घर के बाहर छायादार पेड़ लगाने एवं उनको पालने की मुहिम चलाई जाए। ऐसा करने से न सिर्फ शहरों का बढ़ता तापमान नियंत्रित होगा, वरन प्रदूषण, मिट्टी का अपरदन, जलवायु परिवर्तन, कम बारिश, बाढ़ इत्यादि समस्याओं से भी निपटा जा सकेगा। ऐसे उद्योग जो एनर्जी इंटेंसिव हैं, उनकी इकाइयां सम्बंधित जिला प्रशासन के साथ मिलकर स्पेशल एनवायरनमेंट जोन (सेज) बनाने की दिशा में काम कर सकती हैं। ये सेज वन, मूक पशु-पक्षियों का भी सहारा बनेंगे एवं हमारी आगामी पीढिय़ों के लिए एक उज्जवल भविष्य लेकर आएंगे। आज से ही पेड़ लगाना शुरू करें। कोई भी छायादार पेड़ सरकारी नर्सरी में मुफ्त या बहुत कम मूल्य में प्राप्त हो जाता है। बदले में यह पेड़ हमें जो देगा, उसकी कीमत शायद कोई कभी नहीं चुका सकता।