
श्री अरबिंदो : जिनका लक्ष्य था एकजुट और एकीकृत भारत
गुरु प्रकाश पासवान
दलित चिंतक
सुदर्शन रामाबदरन
प्रख्यात लेखक
बंगाल ने हमें कई विचारक दिए हैं, जिन्होंने हमारे राष्ट्र निर्माण की नींव रखी है। आजादी के अमृत महोत्सव के तहत भारत सामाजिक एकजुटता के लिए नए कदम उठा रहा है। साथ ही अनेक उपाय कर विविधता, समानता और समावेशन सुनिश्चित करने में योगदान दे रहा है। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, रबींद्रनाथ टैगोर, जोगेन्द्रनाथ मंडल, श्री अरबिन्दो और खुदीराम बोस ऐसे ही क्रांतिकारी विचारक रहे। आज राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भारतीय विचारों पर इनके प्रभाव की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। श्री अरबिंदो बहुमुखी प्रतिभा वाले व्यक्तित्व थे। वे एक मौलिक विचारक, लेखक, कवि, नाटककार, शिक्षक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनकी लेखनी राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता, अध्यात्म और संस्कृति संबंधी विचारों का सम्प्रेषण करती है। उन्होंने पश्चिमी जगत के सर्वश्रेष्ठ दर्शन शास्त्र का अध्ययन किया और भारत लौटे, ताकि वे 'समग्र योगÓ के माध्यम से आध्यात्मिक रूपांतरण के लिए भारतीय प्रक्रिया बना सकें। भारत श्री अरबिंदो का 150वां जन्म वर्ष मना रहा है। वे श्रीकृष्ण से अत्यधिक प्रेरित थे।
पुडुचेरी स्थित उनसे प्रेरित आश्रम में मानव निर्मित भेदभाव की झलक कहीं दिखाई नहीं देती। इसके मूल में यही वजह रही होगी कि श्री अरबिंदो जातिगत भेदभाव को सामाजिक कुरीति के नजरिए से देखते थे। 'कास्ट एंड डेमोक्रेसी', 'अन-हिंदू स्पिरिट ऑफ कास्ट रिजिडिटी' और 'कास्ट एंड रिप्रजेंटेशन' जैसे उनके लेखों में यह झलकता था। ये लेख 'बंदे मातरम' नामक अंग्रेजी पत्रिका के लिए लिखे थे, वे इसके सम्पादक थे। अरबिंदो घोष ही आगे चल कर मार्गदर्शक श्री अरबिंदो कहलाए। वे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से प्रभावित थे। उनके सम्पर्क में आकर वे क्रांति के पथ पर अग्रसर हुए और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आधार तैयार कर पूर्ण स्वतंत्रता की कामना की। तिलक से ही उन्हें देश में समाज सुधार की भी प्रेरणा मिली। 'अन-हिंदू स्पिरिट ऑफ कास्ट रिजिडिटी' में श्री अरबिंदो लिखते हैं-बंगाली रिपोर्टों के अनुसार, श्री बाल गंगाधर तिलक ने जाति व्यवस्था पर कहा द्ग 'मौजूदा सामाजिक असमानता बुराई बन चुकी है।' श्री अरबिंदो का मानना था कि वे सभी को एक समान मानते हैं और भारत को दुनिया के समक्ष यही स्थापित करना है। उन्होंने सुनिश्चित किया कि भारत में शिक्षा के तहत 'समानता का वैदिक पाठ' भी पढ़ाया जाना चाहिए। अंग्रेजों ने जाति का इस्तेमाल एक राजनीतिक हथियार के तौर पर किया। इसी लेख में श्री अरबिंदो लिखते हैं द्ग 'राष्ट्रवाद से आशय है देश में दिव्य एकता की भावुक आकांक्षा।' भारत दुनिया के सामने राष्ट्रवाद के जिस आदर्श स्वरूप को प्रस्तुत करेगा, उसमें सभी जातियों और वर्गों के बीच समानता होगी। लेखों के जरिए अरबिंदो यह संदेश देते थे कि देश में जाति कितनी 'विशिष्ट' हो चली है और एकता के आध्यात्मिक दर्शन का अभाव होता जा रहा था। उन्होंने यह भी बताया कि अकस्मात आया जातिगत भेदभाव बाहरी था और इससे समाज का अवमूल्यन हुआ। उन्होंने चोखा मेला और आदि शंकराचार्य के उदाहरणों से लोगों को बताया कि सबको एक ही व समान मानें। उन्होंने लिखा, 'निम्न जाति में जन्म लेने वाले मराठा चोखा मेला संत बन गए थे। शंकराचार्य ने चांडाल को अपना गुरु बना लिया था।' भारतीय इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे।
उनकी लेखनी से एक बात तो स्पष्ट है कि अरबिंदो इंसानों के बनाए गए भेदभाव, निष्कासन और जन्म के आधार पर जातिगत अहंकार के पूरी तरह खिलाफ थे। उनका लक्ष्य था द्ग सामाजिक एकजुटता व एकीकृत भारत। श्री अरबिंदो भारतीय संस्कृति की बुलंद आवाज थे। 150 वां जन्म वर्ष उनकी शिक्षाओं को सामयिक बनाने, उनके कार्यों के बारे में पढऩे और उनके सपनों के भारत का एक पवित्र समावेशी मॉडल दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का अच्छा अवसर हो सकता है।
Published on:
23 Dec 2022 08:55 pm
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