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होर्मुज के जलमार्ग पर मंडराता ‘इलेक्ट्रॉनिक ब्लैक होल’ संकट

जीपीएस स्पूफिंग की प्रक्रिया को समझना अनिवार्य है क्योंकि यह साधारण जैमिंग से कहीं अधिक घातक है। जैमिंग में केवल सिग्नल को शोर के जरिये दबा दिया जाता है, जिससे रिसीवर को पता चल जाता है कि उसके सिस्टम के साथ छेड़छाड़ हुई है लेकिन स्पूफिंग एक 'डिजिटल मायाजाल' है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 23, 2026

योगेश कुमार गोयल, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज आज केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति का जीवंत प्रतीक बन चुका है। हाल के घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ईरान का युद्ध अब केवल मिसाइलों, जहाजों और सैनिकों तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह अदृश्य तरंगों, डिजिटल संकेतों और इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप के स्तर तक पहुंच चुका है। हॉर्मुज के आसपास जहाजों के जीपीएस सिग्नलों के साथ हो रही छेड़छाड़ इसी नए युग की युद्धक रणनीति का उदाहरण है, जिसे समझना आज बेहद आवश्यक हो गया है।

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से जो घटनाएं सामने आ रही हैं, वे चौंकाने वाली हैं। समुद्री निगरानी प्रणालियों पर जहाजों की लोकेशन वास्तविक समुद्र में होने के बावजूद सूखी जमीन पर, वह भी परफेक्ट गोल घेरों में दिखाई दे रही है। समुद्री आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनी विंडवार्ड की मुख्य डेटा विश्लेषक मिशेल विएसे बोकमैन ने जब मानचित्र पर जहाजों को समुद्र के बजाय रेगिस्तान के बीचों-बीच या एकदम सटीक ज्यामितीय गोल घेरों में चलते देखा तो वे चौंक गई। यह कोई तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि सुनियोजित इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप है, जिसे 'जीपीएस स्पूफिंग' कहा जाता है।

इस तकनीक में हमलावर नकली उपग्रह सिग्नल तैयार करता है, जो असली जीपीएस संकेतों से अधिक शक्तिशाली होते हैं। परिणामस्वरूप जहाज का नेविगेशन सिस्टम असली सिग्नल को छोड़कर इन नकली संकेतों को पकड़ लेता है और अपनी स्थिति गलत तरीके से निर्धारित करने लगता है। यही कारण है कि जहाज वास्तविक स्थान से हटकर डिजिटल नक्शों पर कहीं और दिखाई देते हैं। जीपीएस स्पूफिंग की प्रक्रिया को समझना अनिवार्य है क्योंकि यह साधारण जैमिंग से कहीं अधिक घातक है। जैमिंग में केवल सिग्नल को शोर के जरिये दबा दिया जाता है, जिससे रिसीवर को पता चल जाता है कि उसके सिस्टम के साथ छेड़छाड़ हुई है लेकिन स्पूफिंग एक 'डिजिटल मायाजाल' है। इसमें हमलावर असली सैटेलाइट सिग्नल की नकल करते हुए अधिक शक्तिशाली नकली सिग्नल भेजता है। जहाज का नेविगेशन सिस्टम इन नकली संकेतों को असली मान लेता है और गलत गणनाएं करने लगता है।

यदि नेविगेशन डेटा ही भ्रमित हो जाए तो दुर्घटना, टकराव और पर्यावरणीय आपदा की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह सब कर कौन रहा है और क्यों? आधिकारिक तौर पर किसी देश ने इसकी जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है लेकिन परिस्थितिजन्य संकेत और सैन्य विश्लेषण ईरान की ओर इशारा कर रहे हैं। ईरान लगातार यह स्पष्ट करता आया है कि वह अपने समुद्री क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं करेगा और आवश्यकता पडऩे पर जहाजों को निशाना बना सकता है। पश्चिमी विशेषज्ञों का दावा है कि ईरान जिन जैमिंग उपकरणों का उपयोग कर रहा है, वे या तो स्वदेशी तकनीक से विकसित हैं या फिर रूस और चीन जैसी महाशक्तियों से प्राप्त किए गए हैं।

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज ऐसा 'इलेक्ट्रॉनिक ब्लैक होल' बन गया है, जहां रक्षात्मक और आक्रामक दोनों ही तरह की जैमिंग प्रणालियां एक-दूसरे से टकरा रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की यह प्रकृति पारंपरिक युद्ध से कहीं अधिक जटिल और खतरनाक है। हॉर्मुज की स्थिति इसलिए और संवेदनशील है क्योंकि यह क्षेत्र पहले से ही सैन्य तनाव, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार के दबाव में है। हॉर्मुज में चल रही यह अदृश्य जंग दुनिया को यही संदेश दे रही है कि भविष्य का युद्ध केवल हथियारों की ताकत से नहीं बल्कि सूचना, संकेत और तकनीकी श्रेष्ठता से तय होगा। यह वह युद्ध है, जिसमें जीत उसी की होगी, जो दुश्मन पर बिना गोली चलाए उसकी रणनीति को विफल कर सके। जीपीएस स्पूफिंग इसी युद्ध का एक सशक्त हथियार है, जो दिखता नहीं लेकिन असर गहरा छोड़ता है। आज आवश्यकता केवल सैन्य शक्ति बढ़ाने की नहीं, बल्कि तकनीकी सतर्कता, साइबर सुरक्षा और सिग्नल विश्वसनीयता को प्राथमिकता देने की है। यदि समय रहते इस अदृश्य खतरे को नहीं समझा तो भविष्य में युद्ध के मैदान केवल जमीन, समुद्र और आकाश तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि हमारे डिजिटल ब्रह्मांड तक फैल जाएंगे।