
प्रो. हिमांशु राय
निदेशक, आइआइएम इंदौर
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लाभ और धन के सृजन से परे, व्यवसाय एक राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि और सामाजिक विकास में भी योगदान करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में कॉर्पोरेट संगठनों की कार्यशैली और विचारों में विकास हुआ है। अब वे अपने ग्राहकों, कर्मचारियों, स्थानीय समुदायों और अन्य विभिन्न हितधारकों के लिए दीर्घकालिक समावेशी व स्थायी संवर्धन और मूल्य निर्माण में उनकी भूमिका की कल्पना करते हैं। आज के लीडरों पर न केवल अपने संगठनों को सफलता की ओर ले जाने की जिम्मेदारी है, बल्कि उनसे यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे संगठनों को सकारात्मकता से पूर्ण रखें, ताकि वे अपने अस्तित्व का अर्थ समझ सकें, उद्देश्य को पहचान सकें। इस तरह लीडर संरक्षक की भूमिका तो निभाते ही हैं, कौशल व क्षमता के संदर्भ में अधीनस्थों का भावनात्मक व आध्यात्मिक कल्याण भी सुनिश्चित करते हैं।
20वीं शताब्दी में एक व्यक्ति के जीवन को उसके पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन में विभाजित किया जाता था और दोनों का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं माना जाता था। इसी के विपरीत, वर्तमान में कार्य पर एक व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन के प्रभाव को स्वीकारा गया है और ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ को एकीकृत किया गया है। ‘वर्क-लाइफ इंटीग्रेशन’ की इस धारणा से स्पष्ट है कि कार्य एक व्यक्ति के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है और यह जीवन के अन्य पहलुओं को बहुत प्रभावित करता है।
रिमोट वर्किंग के इस युग में, लोग जीवन के विविध पहलुओं में अपनी जटिल भूमिकाओं और जिम्मेदारियों में भाग लेने के लिए निरंतर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अधिक से अधिक संगठन अब कर्मचारियों की भावनात्मक और आध्यात्मिक भलाई के महत्त्व को महसूस कर रहे हैं। वास्तव में सकारात्मक संगठनात्मक मनोविज्ञान का उभरता हुआ क्षेत्र मानव क्षमता और शक्तियों की पहचान करने पर केंद्रित है और बताता है कि मानव प्रदर्शन और ‘वर्क-लाइफ’ की गुणवत्ता को अनुकूलित करने के लिए इन्हें अधिकतम नियोजित कैसे किया जा सकता है।
कार्यस्थल की आध्यात्मिकता का प्रमुखता से विश्लेषण और शोध किया जा रहा है। जैसे जानवर निरंतर भोजन और शारीरिक पोषण की खोज में हैं, मनुष्य निरंतर अर्थ की खोज में हैं। शारीरिक आवश्यकताओं के अलावा, मनुष्यों की उच्च-क्रम की जरूरतें भी होती हैं, जिनमें से एक है किसी भी प्रयास को बढ़ावा देने के लिए एक उच्च उद्देश्य या अर्थ खोजना और अन्यथा अराजक दुनिया का बोध कराना। हमें भावनात्मक व आध्यात्मिक पोषण की जरूरत है। अत: मेरा मानना है कि कार्यस्थल की आध्यात्मिकता, एक संगठन की संस्कृति का अहम पहलू है और इसका कर्मचारियों और लीडरों के समग्र कल्याण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह व्यक्तियों को उनके काम में उद्देश्य व अर्थ खोजने की अनुमति देता है, जो बदले में प्रेरणा, संतुष्टि और उत्पादकता में वृद्धि करता है। एक लीडर के रूप में, कार्यस्थल पर आध्यात्मिकता को शामिल करने से न केवल कर्मचारियों को लाभ होता है बल्कि सकारात्मक और पूर्ण कार्य वातावरण बनाने में मदद मिलती है। इसलिए, यह आवश्यक है कि एक लीडर कार्यस्थल की आध्यात्मिकता के महत्त्व को समझे और कर्मचारियों की भावनात्मक व आध्यात्मिक आवश्यकताओं का पोषण करने वाली संस्कृति बनाने का प्रयास करे। इससे वे न केवल अपने संगठन के समग्र प्रदर्शन में सुधार कर सकते हैं बल्कि समग्र रूप से समाज की बेहतरी में भी योगदान दे सकते हैं।
Updated on:
30 Jan 2023 09:17 pm
Published on:
29 Jan 2023 07:18 pm
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