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आस्था का सवाल

जो काम समाज में बड़े-बुजुर्गों और नागरिक संगठनों को स्वत: अपने हाथ में लेना चाहिए, उसे करने की जिम्मेदारी भी अदालतों को निभानी पड़ रही है।
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Sunil Sharma

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Aug 24, 2018

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supreme court of india

पूजा स्थल इतने पवित्र माने जाते हैं कि वहां अन्याय की कल्पना भी आमतौर पर नहीं होती। पवित्रता का अहसास इतना गहरा होता है कि साफ-सफाई में कोताही की भी हम अनदेखी कर जाते हैं। अपने आराध्य को कुछ भी अर्पित करते समय यह जानने की कोशिश भी नहीं करते कि आखिर उनका किस तरह सदुपयोग हो रहा है। आस्था और विश्वास की जगहों को भी शक की निगाह से देखना पड़े तो उनके होने का औचित्य ही क्या रहेगा? धार्मिक स्थलों के प्रबंधकों के खिलाफ बढ़ती शिकायतें बताती हैं कि वे इस आस्था का बेजा फायदा उठाने में लगे हुए हैं। अंतिम उम्मीद लेकर प्रार्थना-गृह पहुंचने वाले भी जब वहां हुए अन्याय के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाने को मजबूर हो जाएं तो समझना चाहिए कि मामला वाकई गंभीर है। इसलिए धार्मिक स्थलों व परमार्थ संस्थाओं की न्यायिक पड़ताल करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला समय की जरूरत है।

शीर्ष अदालत ने स्वत: संज्ञान लेते हुए देश भर की जिला अदालतों को निर्देश दिया है कि सभी धर्मों के पूजा स्थलों पर साफ-सफाई, सबके लिए समान पहुंच, संपत्ति व खर्च का ब्योरा संबंधी शिकायतों सहित पूरी व्यवस्था की पड़ताल कर हाईकोर्ट को रिपोर्ट दें। उन रिपोर्टों को जनहित याचिका मानते हुए सभी हाईकोर्टों को सुनवाई शुरू करने का निर्देश भी दिया गया है। यह आदेश धार्मिक स्थलों पर असरकारक हो सकता है। देश में करीब 20 लाख प्रमुख मंदिर, तीन लाख सक्रिय मस्जिद और हजारों चर्च हैं। सबकी जांच-परख दुरूह काम हो सकता है। अदालतों में करीब तीन करोड़ मामले लंबित हैं और बड़ी संख्या में जजों के पद खाली पड़े हैं। यह नया काम स्थानीय प्रशासन के सहयोग बिना संभव नहीं है और प्रशासनिक सहयोग लेना भी अपने आप में एक कठिन काम होगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हमें यह भी बताता है कि किस तरह हमारा समाज अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में असफल हो रहा है। जो काम समाज में बड़े-बुजुर्गों और नागरिक संगठनों को स्वत: अपने हाथ में लेना चाहिए, उसे करने की जिम्मेदारी भी अदालतों को निभानी पड़ रही है। होना तो यह चाहिए कि कोई धार्मिक मामला अदालत में जाए ही नहीं, पर हो यह रहा है कि पूजा स्थलों में प्रवेश व दर्शन में भेदभाव से लेकर साफ-सफाई, चढ़ावे का प्रबंध और अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों के कारण अक्सर कोर्ट को दखलंदाजी करनी पड़ रही है। कभी-कभी धार्मिक स्थल हत्या व बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के कारण भी कलंकित हुए हैं। जब बाड़ ही खेत खाने लगे तो फसल कहां जाए? जहां अन्याय हो, वहां अदालत का दखल लाजिमी है। न्यायपालिका हमारी आस्था का दूसरा पवित्र केंद्र है। उम्मीद कर सकते हैं कि इस लंबी जद्दोजहद से धार्मिक स्थलों की पवित्रता बहाल रखने में जरूर मदद मिलेगी।