
स्वामी दयानंद सरस्वती
सत्य प्रकाश गुप्ता
दर्शनाचार्य - वैदिक प्रचारक, भारतीय डाक सेवा अधिकारी रह चुके हैं
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आज भारतवर्ष एक ऐसे संन्यासी का जन्म द्विशताब्दी वर्ष मना रहा है जिसने अपने आप को आहूत करके समूचे भूमंडल को दैदीप्यमान किया। 19वीं सदी में जब देश औपनिवेशिक साम्राज्य की दासता से कराह रहा था तब महर्षि ने संस्कृत के इस श्लोक को चरितार्थ किया - ‘न त्वहं कामयेराज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्ं, कामये दुखतप्तानाम् प्राणीनामार्तिनाशनम्।’ उन्होंने कहा न मुझे राजा बनने की कामना है, न स्वर्ग प्राप्त करने की और न पुनर्जन्म लेने की। मेरी कामना है कि दु:ख से तड़प रहे संकटग्रस्त प्राणीमात्र के दुखों का विनाश करूं। इसी कामना को परिपूर्ण करने हेतु स्वामीजी ने वेदों व अन्य आर्ष ग्रंथों का गहन अध्ययन किया, समूचे देश का भ्रमण किया और वह सब कुछ किया जिससे देश में व्याप्त अंधविश्वास, अंधकार व अशिक्षा से मुक्ति मिल सके। इसीलिए उन्होंने ऐसे समाज को जन्म दिया जिसे आर्य समाज कहते हैं। इसमें उन्होंने कोई पद नहीं स्वीकारा, मठाधीश नहीं बने, एक साधारण सभासद ही रहे।
आर्य शब्द की व्याख्या करते हुए महर्षि अरविंद ने अपनी पुस्तक में लिखा कि आर्य वह है जो निष्कपट है, निष्पक्ष है, जो विनम्र है, योग्य है, स्पष्ट वक्ता है, साहसी है, सौम्य है, सज्जन है। वे यहीं नहीं रुके व आगे लिखा कि आर्य पुरुष में ये गुण भी होने चाहिए यथा - शुद्धता, मानवता, दयालुता, निर्बल-सहायकता, स्वतंत्रता, सामाजिक कत्र्तव्यों का निर्वहन करने वाला, ज्ञान पिपासु व विद्वानों का आदरकर्ता। महर्षि ने इस समाज के संचालन के लिए 10 नियम बनाए जो इस समाज की स्थापना से (1875 से लेकर आज तक) अर्थात 148 वर्षों बाद भी अटल हैं। नियम 6 यानी संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात शारीरिक, आत्मिक व सामाजिक उन्नति करना। इसका तात्पर्य है कि हर आर्य, जो समाज की उन्नति करना चाहता है उसे सर्वप्रथम अपने स्वयं के शरीर को उन्नत करना चाहिए और अपने खान-पान, नियमित व्यायाम व अन्य साधनों से शरीर को स्वस्थ व बलिष्ठ बनाना चाहिए। जब शरीर स्वस्थ होगा तभी आत्मा-स्वस्थ अर्थात उन्नत होगी। कहा भी है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा निवास करती है। जब मानव अपने शरीर व आत्मा को स्वस्थ करके उन्नत कर लेता है तभी वह समाज को उन्नत अर्थात स्वस्थ कर सकता है। स्वामीजी का यह अभिमत आज के युवाओं- युवतियों के लिए उनके चरित्र निर्माण के लिए रामबाण औषधि है।
स्वतंत्रता के गुण को चरितार्थ करते हुए महर्षि दयानंद ने सर्वप्रथम स्वराज्य शब्द देश को दिया। उन्होंने जीवन पर्यन्त स्वदेशी का पालन किया। उन्होंने अपने अमर ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में प्रतिपादित किया कि ‘कोई कितना ही करे, केवल स्वदेशी राज्य ही सर्वोपरि होता है। विदेशी राज्य माता-पिता के समान कृपालु-दयालु होकर भी सुखदायक नहीं होता।’ 1872 में स्वामीजी ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड नॉर्थब्रूक से कहा था, ‘मैं नित्य प्रात:-सायं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि मेरा देश पराई दासता से मुक्त हो।’
महामना मदन मोहन मालवीय ने कहा, ‘दयानंद स्वराज्य शब्द के प्रथम संदेश वाहक थे।’ लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने प्रतिपादित किया, ‘मेरी दृष्टि में स्वामी दयानंद सच्चे राजनीतिज्ञ थे, एवं भाषा, खादी, दलितोद्धार व स्वराज्य शब्द उन्होंने दिए।’ लोकसभा अध्यक्ष रहे एम.ए. अयंगर ने कहा, ‘गांधीजी राष्ट्र के पिता थे तो महर्षि दयानंद राष्ट्र के पितामह थे।’ कांग्रेस अध्यक्ष रहीं ऐनी बेसेंट का कथन था, ‘महर्षि पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारत-भारतीयों के लिए का नारा लगाया। जब स्वाधीन भारत का मंदिर बनेगा तो उसमें स्वामीजी की मूर्ति की वेदी सबसे ऊंची होगी।’ अनेक भारतीय व विदेशी विद्वानों ने भी महर्षि के स्वराज्य व स्वतंत्रता के प्रथम उद्घोषक होने के बारे में विचार व्यक्त किए हैं। अत्यधिक बलिदानों से मिली स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए स्वामी दयानंद के विचार नवयुवकों के लिए आज भी प्रासंगिक हैं।
सारांश यह कि स्वामी दयानंद एक व्यक्ति नहीं, अपितु संस्था थे। यदि वास्तव में हम उनका अनुसरण करें तो एक सभ्य समाज की स्थापना कर सकते हैं, हमारा चारित्रिक उत्थान हो सकता है जिसकी आज महती आवश्यकता है।
Published on:
15 Feb 2023 10:39 pm
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