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कृषि में स्वावलंबन और आत्मनिर्भर गांव का संकल्प लें किसान

23 दिसंबरः किसान दिवस खेती के मामले में देश में ही नहीं, दुनिया को भी सीख देने की स्थिति प्राप्त करें किसान  

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जयपुर

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Patrika Desk

Dec 22, 2022

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रामपाल जाट
राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान महापंचायत
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जैसे यूरिया के लिए घर-बार छोडक़र भूखे प्यासे रहकर भी धक्का-मुक्की और पुलिस के डंडे की मार सहन करने की व्यवस्था बनी हुई है और किसानों को कालाबाजारी में फंसकर दोगुने दाम चुकाने पड़ रहे हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए विचार करना अपरिहार्य हो गया है। इसके लिए भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और किसान नेता चौधरी चरण सिंह की जयंती यानी किसान दिवस से बेहतर अवसर आखिर क्या हो सकता है। यहां ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी’ सटीक लगता है। खेती करने वालों को खेती में प्रयुक्त होने वाले खाद, बीज, कीटनाशक के लिए जूझना पड़े, अनेक बार नकली बीज, कीटनाशी के कारण उपज से हाथ धोना पड़े, यह त्रासदी कमोबेश बनी ही रहती है। दुखी किसानों के मुंह से ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’ की ध्वनि सुनाई देती है। कुएं की छाया कुएं से बाहर नहीं आ सकती, उसी प्रकार किसान का दुख ‘आह’ में प्रकट होकर रह जाता है। इनको लेकर कई बार किसान संगठन सड़कों पर भी दिखते हैं पर परिणाम ‘ढाक के तीन पात’ जैसे ही हैं।

विस्मयकारी तथ्य तो यह है कि यह स्थिति तथाकथित कृषि में हरित क्रांति के बाद पैदा हुई। इसी से किसानों की बाजार पर निर्भरता बनी-बढ़ी। इतना ही नहीं, खेती की लागत भी बढ़ती गई। इसके पूर्व किसानों को पराधीनता की पीड़ा नहीं झेलनी पड़ती थी। किसान स्वयं खाद, बीज और कीटनाशी तैयार करते थे। उस खेती में परस्पर पूरकता थी। जो खेती से बचता था, वह चारा बैल के काम आता था और बैल से प्राप्त गोबर खेत के काम आता था। खेती के उपकरण हल, कुड़ी, बैलगाड़ी, फावड़ी, दांतली, फाड़ जैसे उपकरण/यंत्र गांव में तैयार होते थे। गांव की व्यवस्था में मुद्रा की भूमिका न्यूनतम थी तथा आत्मनिर्भरता गांव की विशेषता थी, सहकार उनकी जीवन प्रणाली का अभिन्न अंग था । 50 वर्ष पूर्व तक गांव में छाछ फेंकनी पड़ती थी, आज वही छाछ विक्रय की वस्तु हो गई है। क्योंकि परंपरागत प्रणाली को समयानुकूल नहीं बनाया जा सका, आत्मनिर्भर गांव और कृषि में स्वावलंबन वक्त की भेंट चढ़ गया। अब खेती मुद्रा एवं बाजार के भरोसे हो गई। इसी का परिणाम है कि कृषि उत्पादकता एवं उत्पादन बढ़ा किंतु उसका लाभ किसानों से अधिक बाजार तथा मुद्रा पर अधिकार रखने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्राप्त हुआ। किसान कंगाल और कंपनियां मालामाल हुईं। किसान ऋणी बना, उसकी ऋण चुकाने की क्षमता घटी, अनेक किसानों को ऋण नहीं चुका पाने के कारण समय से पहले अपनी जीवनलीला समाप्त करनी पड़ी। विज्ञानसम्मत परंपरागत खेती करने वाले ज्ञानी एवं अनुभवी किसानों को अज्ञानी बताकर उनके आत्मविश्वास को तोड़ा गया। ऋणजाल की बात करें तो किसान कुएं से निकल कर खाई में गिर गया। एक तरफ 1936 में संयुक्त पंजाब में तथा 1957 में कई राज्यों में ऋण मुक्ति कानून बनाए गए, तो अब बैंकों को कानून की परिधि से बाहर क्यों रखा गया है? गांव का धन गांव में रहे, इस विचार को वर्तमान में सुसंगत न होना करार दे दिया गया। पुन: उपनिवेशवादी व्यवस्था को फलने-फूलने का अवसर दे दिया गया। एक समय था, जब गांव आत्मनिर्भर थे। तब विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 23 प्रतिशत थी।

उत्पादकता-उत्पादन के साथ विपणन की उत्तम व्यवस्था किसानों की आय के लिए अपरिहार्य है। गांव से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग एवं मार्केटिंग की आवश्यकता है। इसके लिए किसानों में उत्पादों को रोककर संग्रहण का आत्मविश्वास जगाना होगा। इसके लिए 15 वर्ष पूर्व के ‘वेयरहाउस (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2007’ का उपयोग सार्थक है। किसान भंडारण का अभ्यास करें, उत्पाद की छनाई-छटाई-सफाई के द्वारा उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर का तैयार करें, जिससे मूल्य संवर्धन हो सके। इसके लिए किसानों ने ग्रेडिंग को प्राथमिकता देना शुरू किया है, जिसमें गति लाने की आवश्यकता है। मोल-भाव का अभ्यास तथा ऑनलाइन कृषि उत्पादों के विक्रय की प्रक्रिया समझने के लिए घर-घर में उपलब्ध मोबाइल के उपयोग से यह कार्य सरल बन सकेगा। इसी तरह नवीन एवं उपयोगी तकनीक के इस्तेमाल के लिए ग्राम स्तर पर प्रशिक्षण केंद्र शुरू करना भी कारगर उपाय है। इसका सीधा लाभ किसानों को प्राप्त होगा। जरूरी है कि किसान विश्व के साथ चलते हुए अपनी आवश्यकताओं को प्राथमिकता से स्थापित करें। नवाचार-अनुसंधानों को अपनाने में सरकारी दबाव से मुक्त रहकर स्वतंत्र रूप से काम करना अधिक श्रेयस्कर है। उर्वरकों के बढ़ते हुए प्रयोग के कारण विषाक्त खेती से मुडक़र ऋतुचक्र, जलवायु परिवर्तन और सिंचाई स्रोतों को लेकर गंभीरता से विचार की आवश्यकता है क्योंकि देश में 70 प्रतिशत से अधिक भूमि असिंचित है।

वर्ष 2015-16 की कृषि गणना के अनुसार 86.7% जोतें 2 हेक्टेयर से कम हैं तथा जोतों का औसत आकार 1.08 हेक्टेयर है। देश का 54.6 प्रतिशत कार्यबल कृषि पर निर्भर है। ग्रामीण क्षेत्र में 57.08% तथा कृषि क्षेत्रों में 52% परिवार ऋण में डूबे हुए हैं। ‘भारत कृषि प्रधान देश है’ - यह एक मुहावरा नहीं, तथ्य है। हमारा दायित्व है कि हम खेती के मामले में दुनिया को भी सीख देने की स्थिति प्राप्त करें। कृषि में स्वावलंबन व गांवों को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने के लिए आगे बढऩे के लिए संकल्पित हों। सरकारों की ओर कम देखते हुए अन्नदाताओं को मांगने वाला नहीं, वरन देने वाला ‘दाता’ बनाने की जरूरत को प्रखरता प्रदान करें।