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बीती सदी इस बात की साक्षी रही है, जिसमें पश्चिमी सभ्यता के ‘वर्चस्व की राजनीतिक परियोजना’ के तहत दुनिया के विभिन्न मूल व देशज समाजों को भौगोलिक संदर्भ में ही नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक और वैचारिक आयामों में भी अधीनस्थ बनाए रखा गया। हाल ही में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में आत्मनिर्भर और वैचारिक स्वराज की सामाजिक- सांस्कृतिक जमीन को शिक्षा के माध्यम से एक नई उर्वरता देने की परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसका एक उद्देश्य ‘प्रोजेक्ट ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ के माध्यम से पश्चिमी विचार के बरक्स भारतीय ज्ञान-विज्ञान-सामाजिकी को एक रणनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करना है। इसके तहत ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा संस्थानों में बिना किसी औपचारिक अनिवार्य अर्हताओं/शोध-उपाधि के ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ को नियुक्त करने का निर्णय लिया है।
वस्तुत: किसी भी संस्थान या संगठन में सृजनात्मक संभावनाएं ‘सिद्धांत एवं अभ्यास’ की जुगलबंदी से ही उत्पन्न होती हैं, जहां ये दोनों पक्ष समतामूलक अक्षों के तहत अंतक्र्रिया करते हुए संगठन एवं प्रक्रिया को संपोषित करते हैं। अभ्यासकर्मियों के विभिन्न राज्यपोषित संस्थाओं में, पाश्र्व नियुक्तियों के तहत, निर्णायक भूमिका अदा करने के इस नीतिगत निर्णय को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
Updated on:
07 Sept 2022 09:47 pm
Published on:
07 Sept 2022 07:26 pm
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