ओपिनियन

जिस सभ्यता ने परिवार के अस्तित्व को नकारा, अंतत: वह बिखर गई

ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्री एवं स्तंभकार

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May 15, 2025

परिवार स्वयं में एक संपूर्ण शब्द है, जो कि हर उस व्यक्ति को संपूर्णता देने में सक्षम है जो परिवार के अस्तित्व को स्वीकारे। दुनिया के हर कोने में, परिवार की अवधारणा समाज की आधारशिला है, जो प्राथमिक इकाई के रूप में कार्य करती है, जिसके माध्यम से परम्पराएं, मूल्य और सांस्कृतिक पहचान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है। हालांकि, परिवारों के भीतर संरचना, भूमिकाएं और अपेक्षाएं ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक-आर्थिक कारकों द्वारा आकारित संस्कृतियों में काफी भिन्न होती हैं।
इतिहास के पन्नों को अगर पलट कर देखा जाए तो यह स्वत: स्पष्ट हो जाएगा कि सभ्यता के आरंभ से परिवार का अस्तित्व रहा है। यद्यपि इसका स्वरूप परिवर्तित होता रहा है। परंतु इसके साथ ही एक और सच सामने आता है कि जब भी किसी सभ्यता ने परिवार के अस्तित्व को नकारा है तो अंततोगत्वा वह सभ्यता समाप्त हो गई। रोमन सभ्यता के पतन का एक प्रमुख कारण परिवार संस्था की समाप्ति माना गया है। प्रसिद्ध दार्शनिक सेनेका ने रोमन सभ्यता के पतन से पूर्व चेतावनी दी थी कि ‘परिवार के टूटने से रोमन साम्राज्य का पतन होगा।’ सेनेका का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की ताकत उसके परिवारों की ताकत पर निर्भर करती है। परिवार एक मजबूत नींव है जिस पर देश की संरचना बनाई जाती है। फिलिप वैन नेस मायर्स ने अपनी पुस्तक ‘रोम: इट्स राइज एंड फॉल’ में लिखा है- रोमन समाज का आधार स्तंभ परिवार था, जो इसकी मूल इकाई थी.. और उसके बिखराव ने रोमन सभ्यता को बिखेर दिया। मायर्स कहते हैं कि सुदृढ़ परिवारों में बड़े होने वाले बच्चे अधिकार का सम्मान और आज्ञाकारिता सीखते हैं। इससे स्वाभाविक रूप से कानून का पालन करने वाले, योग्य नागरिक बनते हैं। यह प्रश्न उठना बहुत स्वाभाविक है कि सुदृढ़ परिवार कैसे सुदृढ़ राष्ट्र के निर्माण में योगदान दे सकता है? इस प्रश्न का उत्तर मायर्स की पुस्तक से मिल सकता है। वह कहते हैं ‘परिवार में माता-पिता के अधिकार का पालन करने से रोमन लोगों ने सीखा कि कैसे आदेश देना है और कैसे आज्ञा माननी है- कैसे बुद्धिमत्ता, संयम और न्याय के साथ अधिकार का प्रयोग करना है… और जब परिवार का अस्तित्व खत्म हुआ तो रोमन सभ्यता स्वत: ही समाप्त हो गई।’
भारत की परिवार परंपरा सदैव आदरणीय और अनुकरणीय रही, परंतु यक्ष प्रश्न यह है कि क्या आज भी हम गर्व से यह कह सकते हैं कि हम स्नेह और समर्पण के पर्याय परिवार संस्था का संरक्षण कर रहे हैं या कुछ ऐसा है, जिसके लिए हमें आत्म चिंतन करने की आवश्यकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने मार्च 2025 में समतोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के मामले को कहा कि ‘भारत वसुधैव कुटुम्बकम के दर्शन को मानता है। यह विश्वास कि पूरा विश्व एक परिवार है , लेकिन आज हम अपने ही परिवारों में एकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इस भावना को दुनिया तक पहुंचाना तो दूर की बात है। ‘परिवार’ की अवधारणा कमजोर हो रही है, जिससे ‘एक व्यक्ति, एक परिवार’ मॉडल का उदय हो रहा है, जो एकजुटता और सांप्रदायिक समर्थन के पारंपरिक मूल्यों से दूर एक चिंताजनक बदलाव को दर्शाता है।’
यह निर्विवाद है कि औद्योगीकरण ने भारतीय परिवार व्यवस्था को प्रभावित किया है। संयुक्त परिवार की परंपरा दरक चुकी है और एकल परिवारों का वर्चस्व बढ़ रहा है। यही नहीं अब ‘सिंगल पेरेंट फैमिली’(एकल मां या एकल पिता) का चलन तेजी से बढ़ रहा है। परिवार का मूलभूत आधार ‘अंतरनिर्भरता’ है अर्थात् अपनी  जैविक, भावनात्मक और आर्थिक आवश्यकताओं के लिए एक दूसरे पर निर्भरता। ‘अंतरनिर्भरता’ तथाकथित आधुनिक सोच से मेल नहीं खाती। सशक्तीकरण का नवीन पाठ रिश्तों से कहीं अधिक महत्त्व ‘स्वतंत्रता’ और ‘निजता’ को देता है। परिवार के मूल आधार स्तंभ सामंजस्य, समर्पण, त्याग, दायित्व निर्वहन, अब दकियानूसी श्रेणी में गिने जाते हैं। नतीजतन परिवार टूट रहे हैं। परिवार का कोई विकल्प नहीं है यद्यपि हमारी सारी जद्दोजहद ‘अहम्’ के इर्द-गिर्द घूमती है। हम यह स्वीकार करने से क्यों हिचकते हैं कि बिना स्नेह और अपनत्व के किसी भी मनुष्य के लिए जीना संभव नहीं है। अपने परिवार को रणक्षेत्र बनाकर हम बाहरी दुनिया में प्यार की तलाश में भटकते हैं और इस मृगमरीचिका का अंत हताशा और अवसाद से होता है।
खुशहाल परिवार किसी भी व्यक्ति के लिए जीवनदायिनी है, परंतु यह स्वत: नहीं बनते, इसके लिए प्रयास करने होते हैं। एक और तथ्य जिस पर ध्यान देना आवश्यक है, वह यह है कि बीते दशकों में परिवार की आर्थिक संबलता के लिए घर की महिलाएं बाहर निकलकर अर्थ अर्जन कर रही हैं परंतु दुखद सत्य यह है कि उनकी परिवर्तित भूमिका को परिवार के अन्य सदस्यों से सहयोग प्राप्त नहीं हो रहा। सूरज उगने से पूर्व घर के कार्य को करने, दफ्तर जाने और लौटकर आने पर खाना बनाने से लेकर तमाम कार्यों की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर है, पर क्या यह न्यायोचित है! काम का निरंतर दबाव उनके मन व देह को बीमार कर रहा है और शायद यह कारण है, जिसके चलते नौकरीपेशा महिलाएं परिवार नहीं बसाना चाहतीं। यह अब विचारने का प्रश्न है कि हमें परिवार को कैसे संजोकर रखना है क्योंकि अगर परिवार नहीं रहेंगे तो निश्चित है कि हम भी नहीं रह पाएंगे।

Published on:
15 May 2025 12:40 pm
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