
अश्विनी शर्मा
हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने एक भाषण में मैकाले की शिक्षा पद्धति से बाहर निकलने की आवश्यकता पर बल दिया और वर्ष 2035, जिस वर्ष अंग्रेजों की 1835 की शिक्षा नीति के 200 वर्ष पूर्ण होंगे तक इसके प्रभावों को पूरी तरह समाप्त करने का संकल्प लिया। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि मैकाले ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की कमर तोड़ दी, जो हमारे कौशल, संस्कृति और आत्मगौरव पर आधारित थी। उसकी जगह ऐसी सोच आरोपित की गई, जिसमें भारतीयों को ‘रंग-रूप से भारतीय, पर सोच से अंग्रेज’ बनाया गया।
यह बात सच है कि ब्रिटिश शासन की ओर से थोपी गई मैकाले की शिक्षा नीति ने भारतीय समाज की मूल चेतना, ज्ञान और आत्मविश्वास को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। 1835 में लागू की गई इस नीति के लगभग २०० वर्ष पूरे होने जा रहे हैं और इस अवधि में इसने भारतीयों की सोच, मूल्य व्यवस्था और भाषाई परंपराओं पर एक गहरा औपनिवेशिक असर छोड़ा है।
मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य भारतीय समाज में आधुनिकता लाना नहीं था, बल्कि ऐसे भारतीय तैयार करना था जो शरीर से भारतीय हों, लेकिन विचारों और दृष्टिकोण में अंग्रेज। इस नीति ने हमारी प्राकृतिक सोच, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों और भाषाई विविधता को कमजोर किया।
भाषा मात्र संचार का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह दुनिया को समझने और देखने का एक दृष्टिकोण भी देती है। हर भाषा के भीतर अपनी संस्कृति, व्यवहार, मूल्य, तर्क और विज्ञान छिपा होता है। परंतु पिछले 75 वर्षों में भारत में भाषाएं कब्रगाह बनती चली गईं। अनेक भाषाएं विलुप्त हो गईं, केवल शब्द नहीं मरे— बल्कि वह संपूर्ण जीवन-दृष्टि चली गई, जो पीढिय़ों तक व्यवहार, अनुभव और परंपरा के माध्यम से हस्तांतरित होती थी। पुस्तकों से अधिक जो ज्ञान अनुभव आधारित होता है, वह भी नष्ट हुआ। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह मैकाले की शिक्षा पद्धति की देन है।
यह शिक्षा मॉडल भारतीय समाज में आपसी संबंधों और सामुदायिक जीवन को जोडऩे वाली कडिय़ों को कमजोर करता चला गया। पहले जो शिक्षा जीवन और समाज से जुड़ी होती थी, वह धीरे-धीरे केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा केंद्रित होती गई। आज हम देखते हैं कि समाज का ढांचा, जो आपसी विश्वास और सहयोग पर आधारित था, उसमें दरारें आई-यह भी उस औपनिवेशिक मानसिकता की निरंतरता है।
नयी शिक्षा नीति: एक आशा या फिर वही गलती?
भारतीय सरकार ने हाल के वर्षों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने की दिशा में एक कदम अवश्य उठाया है। इसमें भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा में शिक्षा, और स्वदेशी दृष्टिकोण को महत्व दिया गया है, जो सराहनीय है। परंतु केवल नीतियां बनाने से परिवर्तन नहीं आता—उसे लागू करने वाले विद्वान, शिक्षक और संस्थान भी सक्षम होने चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि कई राज्यों में- चाहे मध्य प्रदेश हो, राजस्थान या हरियाणा-भारतीयता और परंपरा के नाम पर पदों का बंटवारा ऐसे हाथों में दे दिया जाता है जिन्हें स्वयं विषय का ज्ञान नहीं होता। जब अयोग्य लोग नीति लागू करेंगे तो परिणाम भी वैसा ही मिलेगा जैसा दशकों से मिलता आया है— ऊपर से परिवर्तन, भीतर से शून्यता।
विश्व में बढ़ती स्वदेशी ज्ञान प्रणाली की मान्यता
विडंबना यह है कि दुनिया के देश भारत की परंपरागत ज्ञान प्रणालियों पर गंभीर शोध कर रहे हैं। अमरीका की हार्वर्ड और येल विश्वविद्यालय, जर्मनी की हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में- पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों, आध्यात्मिक और अनुष्ठानिक उपचार, ग्रामीण स्वास्थ्य परंपराएं, जल संरक्षण, मिट्टी को पुनर्जीवित करने की तकनीकें और प्रकृति आधारित जीवन शैली पर काम हो रहा है। ये वही ज्ञान प्रणालियां हैं, जो भारत में हजारों वर्षों से विकसित हुईं थीं। आज भारतीय शिक्षण संस्थानों में युवा पश्चिमी शोधों को कॉपी-पेस्ट रूप में पढ़ते हैं, जबकि इन्हें जन्म देने वाली हमारी धरती है। सोचने की बात यह है कि यदि विदेशी इन विषयों पर शोध कर सकते हैं तो हम स्वयं क्यों नहीं?
आवश्यकता केवल नीतियों की नहीं, इच्छाशक्ति और योग्य नेतृत्व की है
डिकॉलोनियल शिक्षा लागू करने के लिए ऐसे विद्वानों की जरूरत होगी जो भारतीय ज्ञान परंपरा का गहरा अध्ययन रखते हों और साथ ही आधुनिक ज्ञान से भी परिचित हों। विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थानों में ऐसी बौद्धिक क्रांति तभी संभव है जब नेतृत्व पारदर्शी, ईमानदार और विद्वत्ता पर आधारित हो। सिर्फ भाषण देने से बदलाव नहीं आएगा। यदि हम वास्तव में भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनस्र्थापित करना चाहते हैं तो —
योग्य विद्वानों की पहचान और चयन सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
स्थानीय भाषाओं में ज्ञान उत्पादन और शोध को प्रोत्साहन देना होगा।
समाज, समुदाय और प्रकृति आधारित शिक्षा को कक्षा तक पहुंचाना होगा।
औपनिवेशिक सोच और श्रेणियों पर प्रश्न उठाना आवश्यक है, न कि उन्हीं श्रेणियों से भारत को समझना।
आज यूरोप में डिकॉलोनियल शिक्षा पर गंभीर चर्चा होती है। वे अपनी शिक्षा, इतिहास और समाजशास्त्रीय श्रेणियों पर पुनर्विचार कर रहे हैं। जबकि हम भारतीय समाज के अध्ययन में अभी भी यूरोपीय श्रेणियों और सिद्धांतों पर निर्भर हैं। जब तक हम अपने अनुभवों और ज्ञान को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक भारतीय शिक्षा भारतीय मन और आत्मा को पुन: जागृत करे- यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। भारत में परिवर्तन की इच्छा सरकार में अवश्य दिखाई देती है। नीति भी तैयार है। लेकिन जो लोग संस्थानों में बैठे हैं, क्या वे इस परिवर्तन को लाने में सक्षम हैं? इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर ढूंढना होगा।
मैकाले की शिक्षा पद्धति ने भारतीय समाज को भीतर से तोड़ा। समाज की आत्मा को कमजोर किया। अब समय है, हम अपनी टूटी हुई परंपराओं को फिर से जोड़ें। जब तक हम भारतीय ज्ञान के स्रोतों, भाषाओं और परंपराओं को पुनर्जीवित नहीं करेंगे तब तक किसी भी शिक्षा क्रांति की सफलता अधूरी रहेगी। भारतीय शिक्षा को भारतीय मन, भारतीय भाषा और भारतीय अनुभव से ही शक्ति मिलेगी। यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
Published on:
05 Feb 2026 05:11 pm
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