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पुख्ता रोकथाम, मजबूत समन्वय और समय पर कार्रवाई ही सुरक्षा कवच

असली समाधान उन खामियों को खत्म करने में है, जिनके जरिये पैसा लूटा जाता है और पीडि़तों को उनकी रकम वापस दिलाने में है।

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राकेश हरि पाठक, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार - यदि फिशिंग कॉल्स के जरिये साइबर ठगी पर बनी 2020 की लोकप्रिय वेब-सीरीज 'जामताड़ा' को एक चेतावनी माना जाए, तो बीते वर्ष को खतरे की घंटी कहना गलत नहीं होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ शब्दों में पिछले वर्ष बताया था कि बैंकिंग व्यवस्था और दूरसंचार कंपनियों की कुछ गंभीर चूकें आज साइबर ठगों के लिए खुला मैदान बन चुकी हैं। नतीजा यह है कि बेनाम, बेखौफ ठग लाखों आम और असहाय लोगों को आर्थिक रूप से तबाह कर रहे हैं।


साइबर ठगी का मतलब है- डिजिटल माध्यमों से धोखा देना। इसमें अनाधिकृत पहुंच, डेटा चोरी, फिशिंग कॉल्स, फर्जी ईमेल और ऑनलाइन घोटाले शामिल हैं, जिनका मकसद सीधे-सीधे लोगों का पैसा हड़पना होता है। सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि साइबर सुरक्षा से जुड़ी घटनाएं 2022 में जहां 10.29 लाख थीं, वहीं 2024 में बढ़कर 22.68 लाख तक पहुंच गईं। राज्य और केंद्र की एजेंसियों के बीच तालमेल का काम करने वाली संस्था इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर का अनुमान है कि सिर्फ इस साल साइबर ठगी से भारतीयों को 1.2 लाख करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हो सकता है। इसी तरह केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) के अनुसार 'डिजिटल अरेस्ट' और साइबर डकैती के जरिये अब तक करीब तीन हजार करोड़ रुपए की ठगी हो चुकी है। इस स्थिति को बेहद गंभीर मानते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के जरिये लोगों से छीना गया धन चौंकाने वाला है। अदालत ने कहा कि बैंकिंग सिस्टम में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जो इन खामियों को तुरंत पहचान सके और पूरे देश में समय रहते चेतावनी जारी करे। ठगी को रोकने के उपाय अब भी कमजोर हैं। उदाहरण के लिए, किसी एक व्यक्ति या संस्था को सैकड़ों सिम कार्ड मिल जाना। गिरफ्तारी, एफआइआर और मुकदमे जरूरी हैं, लेकिन ये समस्या की जड़ नहीं काटते। असली समाधान उन खामियों को खत्म करने में है, जिनके जरिये पैसा लूटा जाता है और पीडि़तों को उनकी रकम वापस दिलाने में है। यह समस्या केवल भारत की नहीं है। पूरी दुनिया इससे जूझ रही है। अंतरराष्ट्रीय आकलनों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर साइबर ठगी का आकार दस ट्रिलियन अमरीकी डॉलर से भी अधिक हो सकता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के दोगुने से ज्यादा है।


'पिग बुचरिंग' जैसी मनोवैज्ञानिक चालों से अक्सर फिशिंग कॉल्स के जरिये लोगों को धीरे-धीरे जाल में फंसाया जाता है। एक बार पैसा सैकड़ों बैंक शाखाओं में फैले हजारों 'म्यूल अकाउंट्स' में पहुंच गया, तो विदेशों में बैठे ठगी के मास्टरमाइंड जांच शुरू होने से पहले ही रकम बाहर भेजने में देर नहीं करते। बैंकों की ओर से केवाईसी की ढिलाई, संदिग्ध खातों में तेज लेन-देन और नए लाभार्थियों को समय पर न पकड़ पाना वो कमजोरियां हैं, जिनका फायदा ये 'अदृश्य ठग' उठाते हैं। ठग आज नई तकनीकों का भी भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं। 'स्पूफिंग' से वे खुद को भरोसेमंद संस्थान दिखाते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बने 'डीपफेक' वीडियो और फिशिंग ईमेल-संदेश लोगों को गुमराह कर निजी जानकारी निकलवाते हैं। भारत की सबसे लोकप्रिय डिजिटल भुगतान प्रणाली यूपीआइ भी सुरक्षित नहीं रही है। साइबर ठगी पर लगाम कसने के लिए सरकार ने पिछले वर्ष प्रमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन गेमिंग बिल, 2025 पारित किया। इसका उद्देश्य ई-स्पोट्र्स और सामाजिक खेलों को बढ़ावा देना है, जबकि ऑनलाइन पैसे के खेल, उनके प्रचार और लेन-देन पर पूरी तरह रोक लगाई गई है। सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने भी माना कि व्यवस्था में कुछ गंभीर खामियां हैं, जिनके कारण ये घोटाले हो रहे हैं और इन्हें दूर करने की कोशिशें चल रही हैं। अदालत की ओर से नियुक्त न्याय मित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पीनई ने बताया कि ब्रिटेन में ऐसे मामलों में 90 प्रतिशत से अधिक ठगी की रकम पीडि़तों को वापस मिल जाती है।


सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों से निपटने के लिए सीबीआइ को और अधिकार दिए जा सकते हैं और विशेषज्ञ साइबर टीमों की मदद ली जा सकती है। अब बैंकों और दूरसंचार कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे सिस्टम की कमजोर कडिय़ों को तुरंत मजबूत करें। मजबूत समन्वय, पुख्ता रोकथाम और समय पर कार्रवाई- यही वह सुरक्षा कवच है, जिसकी आज हर नागरिक को जरूरत है।