
स्कूलों को ज्ञान का मंदिर कहा जाता है। ऐसा मंदिर जिसमें बच्चों की आराधना में जीवन मूल्यों का पाठ शामिल होता है। जहां पढ़ाई के साथ-साथ संस्कार व अनुशासन की घुट्टी भी पिलाई जाती है। माता-पिता भी अपने बच्चों को स्कूल में दाखिला कराने के साथ ही यह उम्मीद बांधते हैं कि वे न केवल संस्कारित होंगे बल्कि भावी जीवन की राह भी आसान करने की सीख लेंगे। लेकिन जब ज्ञान के किसी मंदिर में बच्चों को सजा के रूप में मां की गाली लिखने को कहा जाए तो अभिभावकों का यही भरोसा टूटता नजर आता है। न केवल यह भरोसे के टूटने का सवाल है बल्कि हमारी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की चयन प्रक्रिया पर भी सवाल है जिसमें ऐसे शिक्षक तैनात कर दिए जाते हैं जो खुद ही संस्कारवान नहीं है।
छत्तीसगढ़ के सरगवां में एक निजी स्कूल में दो बच्चों के बीच हुई मारपीट की घटना में आठवीं कक्षा के एक छात्र को सजा के रूप में सौ-सौ बार हिंदी व अंग्रेजी में मां की गाली लिखने को कहा गया। इतना ही नहीं छात्र को यह भी फरमान सुनाया गया कि वह गालियां लिखी इस कॉपी पर अपने माता-पिता के हस्ताक्षर करा कर लाए। हैरत की बात यह कि यह फरमान देने वाली शिक्षक भी खुद महिला थी। स्कूल में दो बच्चों के बीच कहासुनी के बाद हुई मारपीट के बाद यह उम्मीद की जाती थी कि शिक्षक की भूमिका समस्या के समाधान के रूप में होगी। उम्मीद यह भी कि बच्चों को सही-गलत का भेद समझाने के प्रयास भी किए जाते। लेकिन सजा का ऐसा फरमान न केवल समूचे शिक्षा जगत के लिए शर्मनाक है बल्कि शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करने वाली है। सवाल यह कि क्या शिक्षक बनने के लिए सिर्फ निर्धारित शैक्षणिक योग्यता ही पर्याप्त है? क्या शिक्षक के आचरण, उसकी मनोस्थिति और बच्चों के प्रति संवेदनशील होने जैसी बातों को इस चयन प्रकिया में नहीं देखा जाना चाहिए? छत्तीसगढ़ की यह घटना तो बानगी है। देशभर की शिक्षण संस्थाओं में गाहे-बगाहे शिक्षकों के आचरण से जुड़े ऐसे मामले सामने आते रहते हैं जिनमें लगता है कि जो स्वयं ही संस्कारित न हो वे भला बच्चों में क्या संस्कार दे पाएंगे।
वस्तुत: शिक्षकों का चयन एक संवेदनशील प्रक्रिया है। इसमें शैक्षणिक योग्यता के साथ-साथ चयनित शिक्षकों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण भी जरूरी है। बच्चों के प्र्रति सहानुभूति, वात्सल्य भाव, सभी पक्षों को धैर्य से सुनने की क्षमता व विवाद का निष्पक्ष व उचित समाधान जैसे विषय ऐसे हैं जो ऐसे मनोवैज्ञानिक परीक्षण का हिस्सा बनाए जाने चाहिए। ऐसी चयन प्रक्रिया जिसमें शिक्षक खुद ही विवेकशील नहींं हो बल्कि बच्चों को भी विवेकवान बनाने में सक्षम हो। क्योंकि बचपन में शिक्षकों की कही अप्रिय बातें बच्चों के मन में बैठ जाती हैं, जो जीवनभर याद रहती हैं। बच्चों के प्रति संवेदशील व चरित्रवान शिक्षक नियुक्त होंगे तो ऐसी घटनाएं स्वत: ही थम जाएंगी।
Updated on:
31 Jul 2026 09:40 pm
Published on:
31 Jul 2026 09:39 pm
