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Patrika Opinion: यह वक्त न पदयात्रा का, न शक्ति प्रदर्शन का

Patrika Opinion: कोविड प्रतिबंधों और सप्ताहांत कर्फ्यू की पाबंदियों को ताक पर रखकर कांग्रेस का कर्नाटक में राजनीतिक पदयात्रा शुरू करना हमारे राजनेताओं की कथनी और करनी में अंतर का जीता-जागता उदाहरण है। पदयात्रा का मकसद तमिलनाडु के साथ कानूनी दांवपेंच में फंसी मैकडाटू परियोजना का शीघ्र क्रियान्वन कराना है।

नई दिल्ली

Published: January 12, 2022 07:40:13 am

Patrika Opinion: कोविड प्रतिबंधों और सप्ताहांत कर्फ्यू की पाबंदियों को ताक पर रखकर कांग्रेस का कर्नाटक में राजनीतिक पदयात्रा शुरू करना हमारे राजनेताओं की कथनी और करनी में अंतर का जीता-जागता उदाहरण है। पदयात्रा का मकसद तमिलनाडु के साथ कानूनी दांवपेंच में फंसी मैकडाटू परियोजना का शीघ्र क्रियान्वन कराना है। माना कि मुद्दा जनता से जुड़ा हुआ है।

राजनीतिक दल होने के नाते कांग्रेस को जनहित के मुद्दे सड़कों पर ले जाने का पूरा अधिकार भी है। पर क्या ये समय ऐसी पदयात्राओं के लिए उचित माना जा सकता है। तब, जबकि कर्नाटक में एक दिन में कोरोना से संक्रमित होने के११ हजार से अधिक केस आ रहे हों। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव में भी अभी सवा साल का समय शेष है। ऐसे में पदयात्रा का तात्कालिक राजनीतिक कारण भी आमजन की समझ से परे है।

Patrika Opinion: यह वक्त न पदयात्रा का, न शक्ति प्रदर्शन का
Patrika Opinion: यह वक्त न पदयात्रा का, न शक्ति प्रदर्शन का

कर्नाटक में कांग्रेस की पदयात्रा सिर्फ एक बानगी है। देश के हर राज्य में, हर राजनीतिक दल और उनके नेताओं का व्यवहार एक-सा लगता है। सत्ता में बैठे राजनीतिक दल हों या विपक्षी दल, कोविड प्रतिबंधों की धज्जियां उड़ाने में कोई पीछे नहीं है। राजनीतिक दलों का आचरण भी सवालों के घेरे में है। सरकार ने हजारों पदयात्रियों को रोकने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए? यह कह देना काफी नहीं कि उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्यवाही की जाएगी।

मैकडाटू परियोजना कर्नाटक और तमिलनाडु सरकारों के बीच लंबे समय से विवाद का कारण बनी हुई है। आज इस परियोजना के शीघ्र क्रियान्वयन की बात कर रही कांग्रेस ने भी 2013 से 2018 तक कर्नाटक सरकार का नेतृत्व किया है। उसे बताना चाहिए कि अपने पांच साल के कार्यकाल में वह इसे पूरा क्यों नहीं कर पाई? उस दौर में विपक्षी दल के रूप में भाजपा, कांग्रेस को घेरा करती थी पर आज भाजपा खुद निशाने पर है। खेद की बात यह है कि राजनीतिक दल जनहित के मुद्दों पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते।

देश में अनेक राज्यों के बीच पेयजल परियोजनाओं को लेकर विवाद जारी हैं। ये विवाद कभी सड़क पर तो कभी न्यायालय की दहलीज पर टकराते नजर आ जाते हैं। बेहतर हो कि राजनीतिक मिल-बैठकर विवादों का हल निकालें। नतीजा नहीं निकले तो पदयात्रा, जुलूस और प्रदर्शन भी करें।

पर यह समय न पदयात्रा का है, न शक्ति प्रदर्शन का। कोरोना पर रोकथाम को लेकर कांग्रेस नेता केंद्र को सुझाव देते रहते हैं, ट्वीट भी करते हैं और पत्र भी लिखते हैं। नेताओं को इस समय समझदारी से काम लेना चाहिए। पदयात्रा स्थगित भी की जा सकती है। सवाल कर्नाटक की जनता का ही नहीं, समूचे देश का है।

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