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अध्यक्ष चुनाव में देरी से कांग्रेस में बेचैनी

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद से पार्टी डेढ़ साल से अंतरिम अध्यक्ष के भरोसे चल रही है। चार महीने पहले पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मधुसूदन मिस्त्री की अगुवाई में केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण का गठन किया था। इसका जिम्मा शीघ्र से शीघ्र अध्यक्ष चुनाव कराना था।
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मानना पड़ेगा कि कपिल सिब्बल चुप रहने वाले नेताओं में से नहीं हैं। बोलते हैं तो खुलकर। फिर चाहे वह भाजपा हो, कानूनी मुद्दा हो या अपनी ही पार्टी कांग्रेस। कांग्रेस के आंतरिक चुनाव में हो रही देरी पर उन्होंने एक बार फिर सवाल उठाए हैं। स्पष्ट कहा कि यह साफ नहीं है कि पार्टी अध्यक्ष के चुनाव कब होंगे? सिब्बल ही नहीं, पार्टी के दूसरे हजारों कार्यकर्ताओं के मन में भी ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर चुनाव होंगे कब? लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद से पार्टी डेढ़ साल से अंतरिम अध्यक्ष के भरोसे चल रही है। अगले महीने प.बंगाल समेत पांच राज्यों में चुनाव का बिगुल बजने वाला है। लेकिन पार्टी अध्यक्ष के चुनाव को लेकर असमंजस में है। सब जानते हैं कि राहुल गांधी को एक बार फिर से अध्यक्ष बनाने की तैयारियां चल रही हैं, लेकिन साफ कुछ नहीं। चार महीने पहले पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मधुसूदन मिस्त्री की अगुवाई में केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण का गठन किया था। इसका जिम्मा शीघ्र से शीघ्र अध्यक्ष चुनाव कराना था। चार महीनों में प्राधिकरण तीन बैठकें जरूर कर चुका है, लेकिन पार्टी के संगठनात्मक चुनाव की रूपरेखा सामने नहीं आई।

पांच महीने पहले कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी में आमूलचूल परिवर्तन को लेकर पत्र लिखा तो हंगामा मचा था। पत्र लिखने वालों में पांच पूर्व मुख्यमंत्री, कांग्रेस कार्यसमिति के वरिष्ठ सदस्य और अनेक पूर्व मंत्री शामिल थे। पत्र को बगावत की संज्ञा दी गई थी। लगा था कि शायद अब कांग्रेस अपनी कार्यशैली में बदलाव लाने का साहस दिखाएगी। एक महीने पहले स्वयं सोनिया गांधी ने पत्र लिखने वाले कुछ नेताओं से गहन मंथन किया था, लेकिन नतीजा आज तक नहीं निकला। पत्र में वरिष्ठ नेताओं ने जिन मुद्दों को उठाया था, उनका निराकरण भी सामने नहीं आया। पत्र का निचोड़ था कि पार्टी का नेतृत्व ऐसे हाथों में रहे, जो पार्टी को पूरा समय भी दे और लोगों के बीच नजर भी आए।

राहुल गांधी के फिर से पार्टी अध्यक्ष बनने की प्रबल संभावना है। लेकिन सवाल वही कि क्या राहुल पूर्णकालिक अध्यक्ष की तरह काम कर पाएंगे? क्या वे कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए सर्वसुलभ वाली भूमिका में आ पाएंगे? महत्त्वपूर्ण अवसरों पर वे पार्टी का नेतृत्व करने के लिए तैयार होंगे अथवा नहीं? सिब्बल की तरह ही अनेक नेता व कार्यकर्ता इन्हीं सवालों का जवाब जानना चाहते हैं। पार्टी नेतृत्व की जिम्मेदारी बनती है कि वह इसका जवाब दे। पार्टी विपक्षी दलों के सवालों का जवाब दे या नहीं, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं को तो उसे संतुष्ट करना ही चाहिए। पार्टी तभी अपनी खोई पहचान फिर कायम कर पाएगी।