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- गुलाब कोठारी
कृष्ण ने गीता में एक बार स्पष्ट कर दिया कि विश्व में मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यह बात एक नहीं कई स्थानों पर भिन्न-भिन्न परिपेक्ष्य में आधिकारिक रूप से कही है। संस्कृत भाषा में सात विभक्तियां होती है -अहम् (मैं), माम् (मुझको), मया (मेरे द्वारा), मह्यम् (मेरे लिए), मत् (मेरे से), मम (मेरा), मयि (मुझमें)। कृष्ण ने जो कुछ कहा उत्तम पुरुष में कहा। स्वयं ही सृष्टा बनकर अपनी विभूतियों का तथा अपने विराट् स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। इन तथ्यों को भी इतनी स्पष्टता दी है कि कहीं शंका न रह जाए। यथा-‘मैं ही वासुदेव हूं, मैं ही कृष्ण हूं, अर्जुन हूं।’ दूसरी ओर कह रहे हैं-‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।’ तब कृष्ण के बाहर कौन जीव बचा? पहचानना इसलिए कठिन है कि-‘नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमाया समावृत:।’ कैसा छलिया रूप है कृष्ण का! मेरी प्रकृति ही माया है, मुझे ही आवृत्त किए है। उसके भीतर भी मैं ही प्रतिष्ठित हूं। मेरे ही संकेत पर कार्य करती है। विज्ञान का नियम है कि कोई भी वस्तु बनती है, तब सर्वप्रथम केन्द्र (नाभि-हृदय) का निर्माण होता है। कृष्ण कहते हैं कि सबके हृदय में भी मैं ही ईश्वर बनकर रहता हूं।
‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति।’
अर्थात्-जड़-चेतन सबके हृदय में मैं बैठा हूं। लोक व्यवहार में तो हम जड़ को निर्जीव मानते हैं किन्तु वेद-विज्ञान चेतना-युक्त (सुप्त) मानता है। जड़ पदार्थों में इन्द्रियों का अभाव है। निर्जीव होते तब लोहे में जंग कैसे लग सकता है! वनस्पति की सजीवता पर तो अनेक वैज्ञानिक प्रयोग कर चुके हैं। किन्तु मुख्य बात यह है कि वेद में विज्ञान शब्द की जो व्याख्या है, वह आधुनिक विज्ञान से कुछ भिन्न ही है। आधुनिक विज्ञान मूलत: उपकरणों पर आधारित है। प्रयोगकर्ता प्रयोग का अंग नहीं बनता। वेद-विज्ञान में तो शरीर ही उपकरण बनता है। इसका कारण स्पष्ट है। हमारे शरीर के तीन अंश-मन, बुद्धि तथा आत्मा शरीर के भीतर ही हैं। सृष्टि के स्थूल-कारण शरीर, अव्यय-अक्षर-क्षर जैसी संस्थाएं, प्राण आदि तत्व सभी सूक्ष्मतर हैं। अदृश्य हैं। उपकरणों की क्षमता के बाहर हैं। शरीर भी ब्रह्माण्ड की प्रतिकृति है। आप शरीर के स्वरूप तथा क्रियाकलापों को समझकर सृष्टि रचना एवं गतिविधियों को भलीभांति समझ सकते हैं। दोनों के सिद्धान्त एवं घटक समान ही हैं।
संस्कृति और संस्कृत दोनों स्वतंत्र विश्व हैं, वैज्ञानिक धरातल पर प्रतिष्ठित हैं। इसका श्रेष्ठ उदाहरण वैदिक शद ‘हृदय’ ही है। यह हृदय शरीर का अवयव नहीं है। न ही हमारा मन है। बल्कि जिसको केन्द्र या नाभि कहा है, उसी की हृदय संज्ञा है। वेद-विज्ञान इसी शब्द में इसके स्वरूप को प्रकट कर देता है। मूल शद है-हृदयम्। तीन अक्षर हैं-हृ-द-यम्। जो शक्ति वस्तु का संग्रह करती है, लेती है, वह आदान-हृ-है। जो शक्ति आए हुए पदार्थों का विसर्जन करती है-फैंकती है (प्रदान) वह ‘द’ से कही गई है। तीसरी नियामक शक्ति द्वारा आदान-विसर्ग प्रक्रिया नियंत्रित रहती है। यह प्रतिष्ठा शक्ति है। इन तीनों की समुचित अवस्था का नाम है-हृदय। व्यवहार में प्राण ‘द’ है, अपान ‘हृ’ है, व्यान ‘यम्’ है।
इन सबका अर्थ है-गति। गति जीवन का पर्याय है, स्थिति मृत्यु है। प्राण-अपान-व्यान भी एक ही प्राण की विभिन्न स्थितियां हैं। लेने का नाम है-‘हृ’ और देने का नाम है-‘द’। इन्हीं का नाम है आगति और गति। केन्द्र से बाहर की ओर जाना गति, बाहर से केन्द्र की ओर आना-आगति। प्रत्येक क्रिया के लिए एक निष्क्रिय धरातल भी चाहिए। इसके अभाव में क्रिया का स ́चार ठहर जाता है। आदान-विसर्ग रूप क्रिया भाव जिस प्रतिष्ठा तव के आधार पर नियंत्रित-व्यवस्थित बने रहते हैं, उस क्रिया को नियमन कहते हैं। इसका अर्थ है नियंत्रणात्मक स्तंभन। यही तीसरा तत्व ‘यम्’ कहलाता है। जो गति रूप क्रियाओं का नियमन करता है-‘नियमयति यत् सर्वान् गत्यागति भावान्।’ इस यम् के केन्द्र को व्यवहार में ‘स्थिति’ कहते हैं।
गति-आगति-स्थिति को वैदिक परिभाषा में क्रमश: इन्द्र-विष्णु-ब्रह्मा माना गया है। गति-आगति-स्थिति एक ही तव के तीन विकास रूप ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र त्रय कहलाते हैं। ‘एकामूर्तिस्ंत्रयो देवा ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वरा:।’ स्थिति है गति समष्टि। दो अथवा अधिक विरुद्ध दिशा में बहने वाली गतियों की समन्वित अवस्था ही स्थिति है। जब गति और आगति एक ही केन्द्र बिन्दु पर मिलते हैं-समभाव में -तब यही गति स्थिति कहलाती है। विरुद्ध गतियों का केन्द्र बिन्दु पर निपात ही स्थिति है। एक ही गति बाहर जाती हुई-गति, केन्द्र की ओर आती हुई-आगति तथा समष्टि गति रूप स्थिति कहलाती है। इसी गति तत्व से हृदय रूपी तीन गतियों का विकास होता है। जब आगति भाव केन्द्र की स्थिति में समाविष्ट होता है, तो संकोचगति का विकास होता है। जब गति भाव स्थिति में समाविष्ट होता है तो विकास गति का स्वरूप निर्मित होता है। इन्हीं का अन्य नाम स्नेह गति-तेजगति (सोम-अग्नि रूप) है। इस प्रकार एक ही प्राण गति-अक्षर या मूल प्रकृति-पांच भावों में परिणत हो जाती है। गति-आगति-स्थिति रूप में ये तीनों अन्तर्यामी-तव कहे जाते हैं। शेष दोनों गतियों (संकोच-विकास) को बाह्य या सूत्रात्मा कहते हैं। ये अक्षर प्राण की पंचाक्षर कलाएं होती हैं।
Updated on:
21 Nov 2020 09:40 am
Published on:
21 Nov 2020 09:13 am
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