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बरबादी का पैगाम है वालमार्ट

आज वालमार्ट मुख्यत: चीनी सामान का अमरीकी विक्रेता है। नतीजा : मुनाफा अमरीकियों को, रोजगार चीनियों को। जाहिर है, भारत को नुकसान ही नुकसान है।

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Sunil Sharma

May 09, 2018

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- मोहन गुरुस्वामी, नीति विश्लेषक

यूपीए-1 के दौरान एक तीखी बहस यह थी कि वालमार्ट-कैरेफोर जैसी विशालकाय खुदरा व्यापार कंपनियों को भारत में आने दिया जाए या नहीं। मनमोहन सिंह इसके पक्ष में थे और वालमार्ट के अंतरराष्ट्रीय बॉस जो मेंजर इस सिलसिले में उनसे मिल भी चुके थे। तब कई लोगों ने विदेशी निवेश के पक्ष में होते हुए भी खुदरा व्यापार में एफडीआइ का कड़ा विरोध किया था। कारण था, देश के खुदरा व्यापारियों (इस क्षेत्र से पांच करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है) और लघु तथा मध्यम उद्योगों के (जिनकी संख्या 4.25 करोड़ है और जिनसे लगभग 10.5 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है और जो भारतीय निर्यात का मेरुदंड हैं) बरबाद होने की आशंका।

इकॉनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली और सेमिनार जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख के साथ-साथ मैंने उन दिनों विपक्ष के नेता एल.के. आडवाणी के सामने प्रजेंटेशन भी दिया। उन्होंने पार्टी को यह मामला उठाने के निर्देश दिए। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने मेरे परचे को सांसदों और मुख्यमंत्रियों को भेजा और खुद भी विरोध किया। व्यापक विरोध के बाद खुदरा व्यापार में एफडीआइ पर रोक लगा दी गई। फिक्की की एक बैठक में, जिसकी प्रेरणा यूएस के ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन ने दी थी, मैंने अपने विरोध का आधार बताया। साथ ही ब्रुकिंग्स के तत्कालीन प्रमुख स्टोब टालबॉट से पूछा कि वह मुख्यत: चीनी सामान बेचने वाली कंपनी के लिए लॉबीइंग क्यों कर रहे हैं।

राजीव कुमार (जो अब नीति आयोग के उपाध्यक्ष हैं), टालबॉट और भारती इंटरप्राइजेज के राजन भारती जैसे लोगों ने वालमार्ट के आने से मिलने वाले फायदों पर जोर दिया। मेरा जवाब था कि फायदे अपनी जगह हैं, पर मेरे जैसे लोगों की चिंता कई करोड़ लोगों को रोजगार देने वाले लघु तथा मध्यम उद्योगों को लेकर है जो बरबाद हो जाएंगे। हालांकि सहमति इस पर बन गई थी कि वालमार्ट का आयात और निर्यात बराबर होगा, पर वालमार्ट को इसमें दिलचस्पी नहीं थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पार्टी के विरोध के कारण खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश की अनुमति नहीं दे पाए, पर अमरीका की कोशिशों से उन्होंने खुदरा ई-कॉमर्स में विदेशी निवेश की अनुमति दे दी। वालमार्ट अमरीका का सबसे बड़ा कॉरपोरेशन है। 2017 में इसकी विश्व स्तर पर कुल बिक्री 495 अरब डॉलर थी। इसमें से 317 अरब की बिक्री अकेले अमरीका में थी। बताते हैं कि अमरीका में वालमार्ट 70 से 80 प्रतिशत चीन में बना सामान ही बेचता है।
विकसित और विकासशील देशों में हुए अनेक अध्ययन बतलाते हैं कि खुदरा व्यापार की बड़ी कंपनियां रोजगार पैदा नहीं करतीं, बल्कि नष्ट करती हैं। शास्त्रीय अर्थशास्त्र एकाधिकारी निर्माता के खतरों से सावधान था जो अकेला उत्पादक होता है और ऊंची कीमत पर बेचता है। इसी से एक पूर्ण बाजार में पूर्ण स्पर्धा की वकालत की गई, जिसमें कई निर्माता उत्पादन करते हैं और ऐसे उपभोक्ताओं को बेचते हैं जिन्हें पता होता है कि कौन, क्या और कितने पर बेच रहा है। एडम स्मिथ ने कल्पना भी नहीं की होगी ऐसी फर्म की जो किसी निर्माता का सारा माल खरीद लेगी।

थोक खरीद से उत्पादक को मिलने वाली कीमत कम होती जाती है और लाभ उपभोक्ताओं को मिलता है। सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को होता है। एफएओ और ऑक्सफैम के अध्ययनों से पता चलता है कि 30 अरब डॉलर से ज्यादा के विश्व बाजार से कॉफी उत्पादकों को पहले 10 अरब डॉलर की कमाई होती थी, अब विश्व बाजार का आकार 60 अरब डॉलर का है, पर उनकी कमाई घट कर 6 अरब डॉलर से कम हो गई है। घाना के कोको किसानों को एक औसत मिल्क चॉकलेट की कीमत का सिर्फ 3.9 प्रतिशत मिलता है, जबकि मुनाफे का मार्जिन 34.1 प्रतिशत बढ़ गया है। दक्षिण अमरीका में केले की खुदरा कीमत का सिर्फ 5 प्रतिशत किसानों को मिलता है। बीस साल पहले अमरीका की जमी-जमाई कपड़ा कंपनी लेवी स्त्रॉस के 66 संयंत्र थे, पर जब से वह अपना अधिकांश माल एक एकाधिकारी क्रेता को बेचने लगा है, सभी संयंत्र बंद है।

चीन मजदूरी कम देता है और वहां मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए श्रमिक संगठन भी नहीं हैं। इसलिए चीनी सामान सस्ता पड़ता है। वालमार्ट के जरिए चीन से सीधे भारत आने वाला सामान भारत की कंपनियों, खासकर लघु एवं मध्यम उद्योगों को कितनी क्षति पहुंचाएगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। वालमार्ट के बिना ही चीन से होने वाले सस्ते निर्यात से इन उद्योगों की हालत कमजोर है। लाइट फिटिंग और खिलौना उद्योग खत्म हो चुका है। वालमार्ट आएगा, तो लुधियाना और तिरुपुर के कपड़ा निर्माता तबाह हो जाएंगे। राजकोट का समृद्ध घड़ी उद्योग तो पूरा का पूरा चीन चला ही गया है।

1985 में वालमार्ट के संस्थापक सैम वाल्टन ने कहा था कि जहां तक संभव है, अमरीका में बने माल को खरीदने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। लेकिन आज वह मुख्यत: चीनी सामान का अमरीकी विक्रेता है। नतीजा : मुनाफा अमरीकियों को, रोजगार चीनियों को। जाहिर है, भारत को नुकसान ही नुकसान है।