केंद्रीय भू-जल बोर्ड के आंकड़ों ने पेयजल को लेकर भविष्य की अंधेरी तस्वीर सामने रख दी है। स्थिति वाकई काफी गंभीर है। यदि अब भी सरकारें और नागरिक नहीं चेते तो भविष्य में पानी के लिए भी हमें विदेशों पर आश्रित होना पड़ सकता है। यानि विश्व के सबसे ज्यादा ग्लेशियरों वाली पर्वत शृंखला हिमालय तथा गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, नर्बदा, कृष्णा, कावेरी जैसी नदियों वाले देश भारत को पानी का आयात करना पड़ेगा।
इससे भयावह और शर्मनाक स्थिति क्या हो सकती है। भू-जल बोर्ड की ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश में वर्ष 2050 तक प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 3120 लीटर ही रह जाएगी। 2001 में यह 5020 लीटर तथा 1951 में 14180 लीटर थी। यानि 65 वर्षों में 35 प्रतिशत ही रह गया जो कि 2050 तक 22 फीसदी रहने की आशंका है। इसके लिए जिम्मेदार कौन? निश्चित रूप से सरकारें तो हैं ही जिनकी अदूरदर्शितापूर्ण नीतियों के कारण भूमिगत जल का दोहन तो लगातार बढ़ता गया लेकिन इसके पुनर्भरण पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।
विकास की अंधी दौड़ और वोटों के लालच में सदासरिल नदियों को जगह-जगह बांध दिया गया। इससे भूगर्भ जल स्रोत रीत गए। पुराने समय की झीलों, कुओं, बावडि़यों, तालाबों का रखरखाव तो दूर धन के लालच में उनका अस्तित्व ही मिटाने में राजनेता, अफसर और रसूखदार लग गए। तालाबों, झीलों पर कॉलोनियां ही नहीं, नगर खड़े हो गए। झील, तालाब, कुंए सूखे तो किसानों ने खेतों से अंधाधुंध जल दोहन शुरू कर दिया। नतीजा हर साल सैकड़ों फीट पानी नीचे उतरता गया। हमने खेती की नई-नई किस्में विकसित कीं लेकिन सिंचाई पद्धति पर ध्यान नहीं दिया।
नतीजा फसलें तो साल में चार से छह मिलने लगी लेकिन भू-जल की भारी कीमत चुकाकर। जबकि इजराइल का उदाहरण हमारे सामने है कि कैसे न्यूनतम जल उपयोग से अधिकतम उपज प्राप्त की जा सकती है। लेकिन हमारे 'माननीयों' को तो हर चीज में कमीशन चाहिए। देश में नदियों को जोड़ने की योजना पिछले 30 साल से राजनीति में उलझी है। यदि नदियों को जोड़कर, बांध बनाकर, नहरों का जाल बिछाकर वनों को बढ़ाकर, वर्षाजल का अधिकतम उपयोग कर लिया जाए तो देश में पानी की कभी कमी रह ही नहीं सकती।
जरूरत राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। इसके लिए सरकार को नया जल कानून बनाना होगा। जल पुनर्भरण भवन के साथ हर उस स्थान पर अनिवार्य करना होगा जहां वर्षाजल बेकार चला जाता है। भू-जल दोहन के स्पष्ट नियम बनें। इनका उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माने के साथ सजा का प्रावधान हो। देश में जल की कमी नहीं बस इसके उपयोग के नियम और आदतों को बदलने की दरकार है। फिर देखिए कैसे लहलहाएगा भारत।