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क्याबात है। आनंद आ गया। हम वहीं टिके हैं। जस के तस। अंगद के पांव की तरह देश में भ्रष्टाचार कायम है। लोकतंत्र के चार स्तम्भ माने जाते हैं- कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका। कहने वाले कहते हैं कि 'प्रेसÓ चौथा स्तम्भ हैं। 

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afjal khan

Jan 30, 2016

क्याबात है। आनंद आ गया। हम वहीं टिके हैं। जस के तस। अंगद के पांव की तरह देश में भ्रष्टाचार कायम है। लोकतंत्र के चार स्तम्भ माने जाते हैं- कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका। कहने वाले कहते हैं कि 'प्रेसÓ चौथा स्तम्भ हैं।

हमने एक और स्तम्भ का निर्माण कर लिया है- वह है भ्रष्टाचार। इस तरह हम भ्रष्टाचार को डेमोके्रसी का पांचवां स्तम्भ मान सकते हैं। यह बात हम नहीं वरन् ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल कह रही है कि भारत में भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आई है।

भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें कैसे जमाईं? निश्चित रूप से भ्रष्टाचार को जमाने में सबसे बड़ा हाथ हमारेकर्णधारों का है। सत्य तो यह है कि आज कोई भी सरकारी काम बगैर कमीशन दिए पूरा हो ही नहीं सकता। आप साधारण ठेकेदार से लेकर बड़े कॉन्ट्रेक्टर से बात कर लीजिए।

सब यही कहेंगे कि चाहे सरकारी ठेके हों या खरीद। उन्हें एक निश्चित रकम 'ईमानदारीÓ से दक्षिणा में देनी ही पड़ती है। इस 'पवित्र भेंटÓ को कोई भ्रष्टाचार नहीं मानता। देने वाला इसे प्रेम से देता है और लेने वाला मजे से लेता है। यह राशि लागत की कम से कम 'दस प्रतिशतÓ होती है। मान लीजिए अपनी सरकार दस लाख करोड़ का खर्चा करती है तो इसका दस टका यानी एक लाख करोड़ तो ' कमीशनÓ के रूप में से बंट जाता है।

यानी जो धन देश के गरीब-गुरबों पर खर्च होना चाहिए वह कालेधन के रूप में नेताओं और अफसरों के पेट में समा जाता है। तभी तो इनकी तोंद फैल जाती है। जो भी सरकार आती है वह भोली भाली जनता को बरगलाने के लिए गला फाड़-फाड़ कर कहती है कि वह भ्रष्टाचार का खात्मा कर देगी लेकिन शनै:-शनै: वह भी भ्रष्टाचार के गंदे नाले में डुबकी लगाने लगती है। उदाहरण के लिए अपने मोदी भाई को ही लीजिए।

पौने दो बरस पहले चुनावों से पहले उन्होंने गला फाड़ कर नारा लगाया था- न खाऊंगा न खाने दूंगा। यह नारा जनता को इतना पसन्द आया कि उन्होंने मोदी को सिर आंखों पर बिठा लिया। लेकिन हुआ क्या? वही ढाक के तीन पात।

देखते-देखते बीस महीने गुजर गए। मोदी आधी दुनिया घूम आए। लाहौर में मियां शरीफ के जन्म दिन का केक खा आए लेकिन भ्रष्टाचार में कमी नहीं आई। हम मानते हैं कि उन्होंने नहीं खाया पर खाने वालों को रोक भी नहीं पाये। नमो की ईमानदारी पर किसी को शक नहीं।

ईमानदार तो मौनमोहन भी थे लेकिन भ्रष्टो को वे भी नहीं रोक पाए। सीधा-सा अर्थ है कि भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार बन गया है। हम मिट जाएंगे लेकिन भ्रष्टाचार को नहीं मिटा पाएंगे। अब तो यह हालत है कि इस देश की आम जनता भ्रष्टाचार और बेईमानी के लिए यह गीत गाने लगी है- तेरे संग जीना, तेरे संग मरना। इस देश में जब इंसान पैदा होता है तब से भ्रष्टाचार उसका साथ पकड़ता है और जब मरता है उसके बाद भी साथ नहीं छोड़ता। भ्रष्टाचार न हुआ मानो शैतान हो गया हो। - राही

चुनावों से पहले उन्होंने गला फाड़ कर नारा लगाया था- न खाऊंगा न खाने दूंगा। लोगों ने उन्हें सिर आंखों पर बिठा लिया।