17 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

आधी आबादी: क्या है देह मुक्ति की अवधारणा का वास्तविक अर्थ

देह मुक्ति का अर्थ दरअसल एक स्त्री को सिर्फ देह से ही नहीं, मानसिक रूप से भी मुक्त करने में है। जब कोई स्त्री अपनी देह के हित से जुड़े निर्णय लेने में सक्षम है, इसका अर्थ है वह मानसिक रूप से भी मुक्त हो चुकी है ।स्त्री को यह देखना चाहिए कि देह मुक्ति के नारे के पीछे का उद्देश्य क्या है?

2 min read
Google source verification
आधी आबादी: क्या है देह मुक्ति की अवधारणा का वास्तविक अर्थ

आधी आबादी: क्या है देह मुक्ति की अवधारणा का वास्तविक अर्थ

रश्मि भारद्वाज, (लेखिका, अनुवादक, स्त्री विमर्शकार)

ब्रिटिश लेखिका एवं पत्रकार रेबेका वेस्ट ने लिखा था, 'मुझे लोग स्त्रीवादी बुलाते हैं, जब भी मैं अपने कुछ ऐसे विचार प्रकट करती हूं, जो मुझे एक पांवपोश या गणिका से अलग करते हैं।' दरअसल, सदियों से स्त्री को इन्हीं दो खांचों में कैद किया गया है। वह या तो एक मूक समर्पिता है, जिसका कत्र्तव्य समाज की तय भूमिका निभाना है। या वह एक गणिका है, जो समाज के मनोरंजन के लिए आसानी से उपलब्ध है। दूसरे शब्दों में कहें तो त्यागमयी देवी या स्वच्छंद खलनायिका। इससे इतर उसकी कोई अन्य छवि आसानी से स्वीकार्य नहीं है। यही वजह है कि स्त्रीवाद के संघर्ष को अक्सर देह मुक्ति के संकीर्ण दायरे में बांधकर देखने की कोशिश की जाती है। विशेषकर मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग में, आम लोग ही नहीं ख़ुद को स्त्रीवादी बुलाने वाले भी यह गलती करते नजर आते हैं। हालांकि संकीर्ण देह मुक्ति की अवधारणा नहीं, बल्कि उसका अर्थ सीमित कर दिया गया है। स्त्रीवाद बेशक देह पर स्त्री के अपने अधिकार की बात करता है लेकिन इसके अर्थ कहीं व्यापक हैं। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि यह आजादी के नाम पर किसी तरह की यौनिक उच्छृंखलता को बढ़ावा देना चाहता है। एक स्त्री का अपने शरीर पर अधिकार हो, इसका मतलब वह अपने जीवनसाथी से लेकर मां बनने तक के सभी निर्णय खुद ले सके। उसे किसी भी उस व्यवस्था या समझौते का हिस्सा न बनना पड़े, जहां उसकी रजामंदी नहीं हो। उसे अपने स्वास्थ्य एवं गर्भ संबंधी निर्णय लेने का पूरा अधिकार हो।

रेबेका वेस्ट द्वारा इस्तेमाल किए गए गणिका शब्द पर भी आपत्ति हो सकती है, लेकिन वास्तविकता यही है कि देह व्यापार से जुड़ी अधिकांश स्त्रियां भी यह पेशा शायद ही अपनी मर्जी से अपनाती हैं। यह भी समाज द्वारा उनकी देह पर थोपा गया एक निर्णय है, जो स्त्रियों से सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार छीनता है और उन्हें एक वस्तु में तब्दील कर देता है।

देह मुक्ति का वास्तविक अर्थ दरअसल एक स्त्री को सिर्फ देह से ही नहीं, मानसिक रूप से मुक्त करने में है। जब कोई स्त्री अपनी देह के हित से जुड़े निर्णय लेने में सक्षम है, इसका अर्थ है वह मानसिक रूप से भी मुक्त हो चुकी है। अपने तन और मन से जुड़े उचित निर्णय ले सकती है। ऐसी स्त्री यह भी समझती है कि स्वतंत्रता और उच्छृंखलता में एक महीन फर्क है। वह जानती है कि यह समाज दरअसल उसे एक देह में ही सीमित कर देने के लिए लालायित है। उसे यौनिक मुक्ति का सड़ा-गला पाठ पढ़ाकर वह सिर्फ अपनी अय्याशी का इंतजाम करना चाहता है और कुछ नहीं। उसे देह सौंदर्य के दायरे में कैद करने के पीछे भी उसकी यही मानसिकता रहती है। यही वजह है कि समाज ने स्त्री देह के लिए भी मापक तय किए हुए हैं। देह मुक्ति का विचार स्त्री को उन मापकों को भी कचरे के डिब्बे में फेंकने की आजादी देता है, जो उसे बदसूरत, मोटा या भद्दा ठहरा कर उसकी व्यक्ति-गरिमा को घटाते हैं।

स्त्री विमर्श बताता है कि स्त्री यौनिकता के प्रश्न उसके अपने हित के लिए हों। उसका उद्देश्य एक स्त्री की वास्तविक स्वतंत्रता हो, यह नहीं कि वह किसी के मनोरंजन और विलास का साधन बनकर रह जाए। स्त्री को यह देखना चाहिए कि देह मुक्ति के नारे के पीछे का उद्देश्य क्या है? वह समाज की लाखों स्त्रियों को सम्मान और गरिमा से जीने का अधिकार दिलाने में सक्षम है या उसे 'प्लेजर' का सामान बनाकर अपने लक्ष्य से भटक तो नहीं रहा।