
आपकी बात, नेता धार्मिक और जातीय उन्माद क्यों पैदा करते हैं?
वोट के लिए फैलाते हैं उन्माद
असली नेता वह है जो बिना स्वार्थ के समाज की सेवा करे। सुख और दुख में सबका सहभागी बने। आजकल नेता अपने निजी स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकता है। जूते की तरह पार्टी बदल दे देता है। स्वार्थ साधना ही लक्ष्य है, भले ही देश जाए भाड़ में। ऐसे नेता वोट के लिए समाज में जातीयता के नाम पर उन्माद फैलाते हैं और धर्म की आड़ में लोगों में वैमनस्यता का जहर घोलते हैं ।
-अरुण भट्ट, रावतभाटा
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फूट डालो और राज करो
आजकल के नेता केवल राजनीतिक गोटियां सेंकने में ही लगे रहते हैं। उन्हें न तो जनता से मतलब है और न ही समाज सेवा से। वे तो येनकेन प्रकारेण सत्ता हासिल करना चाहते हैं। जनता आपस में लड़-झगड़ के मरती है, तो मरती रहे, देश में अराजकता फैलती है तो फैले, उनको कुछ लेना-देना नहीं है। आज भी नेता अंग्रेजी साम्राज्य की नीति फूट डालो और राज करो की नीति का अनुसरण करते नजर आते है। यह नीति भारत की संस्कृति के अनुरूप नहीं है।
-आशुतोष मोदी, सादुलपुर, चूरू
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वोटों का ध्रुवीकरण ही लक्ष्य
चुनावों में अपने निजी हित पूरे करने के लिए तथा वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए नेता धार्मिक और जातीय उन्माद पैदा करते हैं। वे इस बात को जानते हैं कि लोगों में धर्म और जाति का नशा सबसे ज्यादा होता है। इसलिए इसी पर चोट की जाए, ताकि लोग बहकावे में आ जाएं।
-बिहारी लाल बालान, लक्ष्मणगढ, सीकर
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सत्ता पाना ही लक्ष्य
नेता सत्ता पाने के लिए जनता में धार्मिक और जातीय उन्माद पैदा करते हैं। उन्हें पता है कि जनता को धार्मिक और जातीयता के नाम पर विभाजित किया जा सकता है। नेता जनता को वास्तविक व बुनियादी मुद्दों से भटकाते हैं। जनता अपने विवेक से विचार करे और किसी भी प्रलोभन व जातीय-धार्मिक उन्माद में ना आए। जनता अपने हक और लड़े।
-हुलास साहू, सेरीखेड़ी, नवा रायपुर
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वोट बैंक की खातिर
नेताओं को कुर्सी पाने के लिए वोट चाहिए। इसके लिए वे साम, दाम, दंड, भेद यानी किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसके लिए वे धर्म व जाति के नाम पर उन्माद भी फैला सकते हैं। अब तो नेताओं का लक्ष्य कुर्सी पाकर अपना स्वार्थ पूरा करना ही रह गया है।
-शकुंतला महेश नेनावा, इंदौर, मध्यप्रदेश
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स्वार्थ की पूर्ति बना लक्ष्य
नेता अक्सर अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए धार्मिक और जातीय उन्माद पैदा करते हैं। वे जानते हैं कि वे वोटों के माध्यम से ही सत्ता पा सकते हैं। इसलिए नेता विकास के मुद्दे की बजाय धार्मिक और जातीय मुद्दों के जरिए जनता को अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं। इसके लिए वे विभिन्न हथकंडे अपनाते हैं। धर्म और जातिवाद के सहारे भावनाओं को भड़काकर दंगे करवाते हैं। फिर पीड़ितों के प्रति सहानुभूति जताकर अपना वोट बैंक मजबूत करते हैं।
-सरिता प्रसाद, पटना, बिहार
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विवेक का इस्तेमाल करें
अपना वोट बैंक बढ़ाने व अपना स्वार्थ साधने के चक्कर मे राजनीति में जातिवाद और सांप्रदायिकता का उपयोग किया जाता है। ध्यान रहे जाति व धर्म से पहले हम इंसान हैं। इसलिए अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
-सुजानसिंह गुड़ानाल,बाड़मेर
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जनता के साथ धोखा
जब नेता आमजन की समस्याएं नहीं सुलझा पाते या विकास कार्यों में विफल रहे जाते हैं तो फिर वे राजनीति में अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए या चुनाव जीतने के लिए धार्मिक और जातीय आधार पर जनता को गुमराह करने लगते हैं। धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करना जनता के साथ धोखा है और जनता को इसे समझ कर ऐसी राजनीति को नकार देना चाहिए।
-जितेश माथुर, उदयपुर
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अंग्रेजों की नीति अपनाई
जाति और धर्म के नाम पर देश में उन्माद पैदा करना तथा देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने का कार्य अंग्रेजों की फूट डालने की नीति से शुरू हुआ, जो आज भी जारी है। शीर्ष नेताओं को पता है कि लोगों को भड़काना आसान है। इससे जनता विभाजित हो जाएगाी। अगर जनता एकजुट हो गई, तो फिर राज करना मुश्किल हो जाएगा।
-राजेंद्र कुमावत, कोटा
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वोट बैंक की राजनीति
नेता अपना वर्चस्व कायम रखने और वोट पाने के लिए धार्मिक या जातीय उन्माद पैदा करते हंै। भारत में अब धार्मिक और जातिगत मामलों को ही चुनावी मुद्दा बनाया जाता है।
-टिकेश साहू, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़
Published on:
08 Oct 2021 07:32 pm
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