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क्या श्रीलंका बुद्ध की अहिंसा की ओर लौटेगा

आज श्रीलंका के बहुसंख्यक सिंहली बौद्ध जनों के सामने नया अवसर है कि वे तमिलों, मुस्लिमों और ईसाइयों के प्रति घृणा का मार्ग छोड़कर अपने देश को नए सिरे से शांति और समृद्धि के रास्ते पर लेकर चलें।

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Patrika Desk

Jul 21, 2022

क्या श्रीलंका बुद्ध की अहिंसा की ओर लौटेगा

क्या श्रीलंका बुद्ध की अहिंसा की ओर लौटेगा

अरुण कुमार त्रिपाठी
लेखक और शिक्षक

जनता अर्गल्या (लोकसंघर्ष) के विरोध के बावजूद श्रीलंका की संसद ने कार्यवाहक राष्ट्रपति और पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को देश का राष्ट्रपति चुन लिया है। इस फैसले को कोलंबो के गाले फेस ग्रीन नाम के समुद्र तटीय पार्क पर जमा सभी जातीय समूहों के लोग स्वीकार कर लेंगे अभी यह देखा जाना है। फिलहाल भयानक आर्थिक संकट में फंसे इस बौद्ध बहुल देश में एक ही चीज शुभ है द्ग वह है जनता अर्गल्या का अहिंसक स्वरूप। पूर्व प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे के आवास को जलाए जाने के अलावा संघर्ष के लिए आगे आई सभी तबकों की जनता ने कोई और हिंसा नहीं की है। उसने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा करके यह संदेश तो दे दिया कि 'सिंहासन खाली करो जनता आती है' पर कोई तोडफ़ोड़ नहीं की तो सेना ने भी जनता से कठोर व हिंसक व्यवहार नहीं किया।
हालांकि अभी यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि तमिलों और मुस्लिमों के प्रति हिंसा और नफरत से भरी वहां की बहुसंख्यक सिंहली आबादी और उसका राष्ट्रवाद प्रेम और अहिंसा से लबरेज हो गया है और न ही यह मानना ठीक होगा कि बौद्ध धर्मगुरुओं से दीक्षा लेकर तमिलों का नरसंहार करने वाली वहां की सेना अब शांति सेना बन गई है। पर वहां हुआ शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन अपने आप में एशिया महाद्वीप में किसी चमत्कार से कम नहीं है। बौद्ध धर्म के ग्रंथ दिघ निकाय की पंक्तियां हैं द्ग चक्कवत्ती सिंहनाद सुत्त। यानी जब धम्म चक्र घूमता है तो सिंह दहाड़ते हैं। इसी आधार पर अहिंसक धर्म की मान्यता से प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के भीतर भी विद्वानों ने हिंसा और युद्ध के रास्ते निकाल लिए थे। जिस श्रीलंका में 26 साल तक सिंहली राष्ट्रवाद और तमिल मुक्ति अभियान के बीच गृह युद्ध चला, 2005 से 2009 तक चले सबसे सघन सैन्य अभियान के दौरान करीब एक लाख लोग मारे गए और तमिल आबादी को एकदम कुचल दिया गया, वहां आज इतना बड़ा बदलाव शांतिपूर्ण तरीके से हो जाएगा यह देखकर आश्चर्य होता है।
तेसा बार्थोलोम्यूज ने 'इन द डिफेंस ऑफ धर्म: जस्ट वार आइडियोलॉजी इन बुद्धिस्ट श्रीलंकाÓ में स्पष्ट किया है कि सिंहली बौद्धों ने न्यायोचित युद्ध का सिद्धांत गढ़कर तमिलों पर सैनिक आक्रमण किया और अलग देश की मांग कर रहे 'मुक्ति चीतों' को नष्ट कर दिया। उन्होंने इसे पवित्र युद्ध की संज्ञा दी। माइकल के. जेरीसन और मार्क जुएरगेन्समेयर ने 'बुद्धिस्ट वारफेयर' नाम की एक पुस्तक संपादित की है जिसमें बताया है कि किस प्रकार अनुराधापुरा में वर्ष 2005 में भिक्षु आनंदवामसा ने बड़े सैनिक अधिकारियों को युद्ध में सुरक्षित रहने का आशीर्वाद दिया। उस कार्यक्रम में श्रीलंका के सैनिक कमांडर शरत फोन्सेका, शांता कोटेगोडा और पराई कुलतुंगा जैसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी मौजूद थे। पर धर्म और हिंसा के बीच राष्ट्र और सेना के लिए रास्ता निकालते हुए आनंदवामसा ने कहा कि हम यह नहीं कह सकते कि तुम्हें शक्ति मिले और तुम दुश्मन को परास्त करो। आनंदवामसा ने आगे कहा कि हम यह भी नहीं कह सकते कि तुम किसी की हत्या करो क्योंकि यह मठ के अनुशासन के विरुद्ध होगा, पर हम सैनिकों के मनोबल के लिए यह आशीर्वाद जरूर दे सकते हैं कि तुम सुरक्षित रहो, तुम्हें कोई बीमारी न लगे और तुम्हारे साथ कोई दुर्घटना न हो।
वास्तव में पारंपरिक रूप से अहिंसक धर्म माना जाने वाला बौद्ध धर्म वैसा रहा नहीं है। 1500 सालों से बौद्ध नेताओं ने बुद्ध की शिक्षाओं से सूत्र लेकर ही हिंसा और युद्ध की अलग-अलग ढंग से अनुमति प्रदान की है। चीन में छठी सदी में बौद्ध सैनिकों को अपने दुश्मनों को मारने के बाद बोद्धिसत्व की उपाधि से विभूषित किया गया। सत्रहवीं सदी में पांचवें दलाई लामा ने एक मंगोल शासक द्वारा की गई अपने विरोधियों की हत्याओं को संस्तुति प्रदान की। थाईलैंड और म्यांमार में बौद्ध सैनिक भिक्षु का भेष बनाकर हथियार लेकर लड़ते हैं। वास्तविक स्थिति यह है कि यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म जैसे 'क्रूसेड' और धर्मयुद्ध के नाम पर हिंसा और युद्ध को संस्तुति देते रहे हैं वैसे ही बौद्ध धर्म का व्यवहार भी रहा है। विडंबना यह है कि बुद्ध को मानने वाला और दाइसू इकेदा के सोका गकाई सिद्धांतों की दुहाई देने वाला जापान भी हिंसा से ग्रसित हो रहा है। हाल में वहां के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की हत्या इसका प्रमाण है।
आज असली सवाल श्रीलंका का है। उसने बुद्ध की शिक्षाओं का कुपाठ करके मात्र दो करोड़ की आबादी को हिंसा, घृणा और आर्थिक तबाही के गर्त में ठेल कर नतीजा देख लिया। अब उसके बहुसंख्यक सिंहली बौद्ध जनों के सामने नया अवसर है कि वे तमिलों, मुस्लिमों और ईसाइयों के प्रति घृणा का मार्ग छोड़कर अपने देश को नए सिरे से शांति और समृद्धि के रास्ते पर लेकर चलें। जनता अर्गल्या में वैसी झलक दिख भी रही है। डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने पचास के दशक में दक्षिण एशिया में बौद्ध धर्म के अहिंसा के दर्शन को राजनीतिक सिद्धांत बनाने के लिए अभियान चलाया था। आज हिंसा, युद्ध और आर्थिक संकट से घिर रहे दक्षिण एशिया में नए सिरे से उस अभियान की बहुत आवश्यकता है।