
neerja chaudhary
- नीरजा चौधरी, तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय, कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के साथ जुड़ी रही हैं।
महिला आरक्षण विधेयक के लटकने को लेकर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे हैं। लम्बे समय से अटके इस विधेयक को पारित कराने की बातें तो खूब होती रही हैं लेकिन अभी तक यह बहस और राजनीतिक मुद्दे से आगे नहीं बढ़ पाया है। भाजपा सरकार ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में कई योजनाएं बनाई है और कई निर्णय लिये हैं। अहम सवाल यह है कि क्या केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा महिला आरक्षण को भी अमलीजामा पहना पाएगी?
प्रधानमंत्री दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति हैं और लोकसभा के साथ कुछ राज्यों के चुनाव भी नजदीक हैं। भाजपा कुछ क्षेत्रों में कम होते जनाधार की भरपाई महिला मतदाताओं से करना चाहेगी।
महिला आरक्षण विधेयक पर एक बार फिर देश की राजनीति गरमाई हुई है। लगता है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष २०१९ के चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है। पहले महिलाओं के लिए उज्ज्वला योजना, फिर तीन तलाक मामला और अब महिला आरक्षण विधेयक। भाजपा सरकार महिलाओं को लुभाने में कोई कसर नहीं छोडऩा चाहती। वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस भी इस मामले में पीछे नहीं रहना चाहती। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तो सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर महिला आरक्षण पर श्रेय लेने में सबसे आगे निकल गई। पूर्व में भी वर्ष २०१० में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार में कांग्रेस ने महिला आरक्षण विधेयक को कानून बनाने का विफल प्रयास किया था।
कांग्रेस इस विधेयक को राज्यसभा में तो पारित कराने में सफल रही लेकिन लोकसभा में बहुमत न होने के चलते और प्रमुख सहयोगियों लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव की पार्टियों के विरोध में होने से लोकसभा से पारित नहीं करवा पाई। उस समय भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस की मदद की होती तो शायद यह विधेयक तब ही पारित हो जाता। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण का प्रावधान किया था। लेकिन वे इसे संसद से पारित करवाने में विफल रहे थे। तत्पश्चात वर्ष १९९२ में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने इसे संसद से पारित करवाकर पूरे देश में लागू किया।
शुरुआत में पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण को काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। महिला उम्मीदवारों की योग्यता पर भी सवाल उठे। लेकिन यह भी सच है कि पंचायतों और स्थानीय निकायों की ये महिला प्रतिनिधि अब राजनीति की परिपक्व खिलाड़ी बन चुकी हैं और अब ये राजनीतिक पटल पर बड़ी भूमिका के लिए तैयार हैं। हालांकि इससे स्थापित राजनेताओं में हडक़म्प मचना स्वाभाविक है। कोई भी राजनेता महिला आरक्षण के नाम पर अपने क्षेत्र को नहीं छोडऩा चाहेगा। पुरुष सांसद, सत्ता और ताकत के बंटवारे के लिए तैयार नहीं है। लेकिन वर्तमान में हालात बदल चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति हैं और लोकसभा में भाजपा को पूर्ण बहुमत हासिल है। दूसरी ओर २०१९ में लोकसभा के चुनाव से पहले गुजरात समेत कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। राज्यों के ये चुनाव ही २०१९ के लोकसभा चुनावों की दशा और दिशा तय करेंगे। भाजपा कुछ क्षेत्रों में कम होते जनाधार की भरपाई महिला मतदाताओं से करना चाहती है। उम्मीद की जानी चािहए कि अगली संसद में एक तिहाई महिला सांसद होंगी।

Published on:
23 Sept 2017 03:09 pm
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