
विनोद अनुपम, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक
फिल्मकार आंद्रेय तारकोवस्की ने कहा था, कला मनुष्य के श्रेष्ठ गुणों- आस्था, प्रेम, सौंदर्य और प्रार्थना- की अभिव्यक्ति है; यह उसके सपनों को स्वर देती है और उसकी आशाओं को संजोती है। कला वास्तव में मानवीय संवेदना को समृद्ध करती है, यह हम जो हैं, उससे बेहतर के लिए तैयार करती है। पत्थर तो पत्थर होता है, लेकिन जब एक सौंदर्यबोध के साथ उसे एक दूसरे पर जमा कर संयोजित कर देते हैं तो वह कला बन जाती है। सुबोध गुप्ता घरेलू उपयोग में आने वाले सामान्य बर्तनों को एक साथ कर विश्व को चकित कर देते हैं। एक फोटो हमारे पड़ोस के स्टूडियो में खींचे जाते हैं, लेकिन वही जब रघु राय खींचते हैं तो कला बन जाती है। कला कोई एक भौतिक वस्तु भर नहीं है जिसे बनाया जा सकता है, यह कलाकार की संवेदना उसकी रचनात्मक समझ की अभिव्यक्ति है, जो कलाकार को जितनी खुशी प्रदान करते हैं, उतनी ही उसे देखने और उसके सौंदर्य का रस ग्रहण करने वाले को भी। राजा रवि वर्मा अपनी पेंटिंग पूरी कर एक बार खुश हुए होंगे, हम आज भी उनकी पेंटिंग देख भावविह्वल होते हैं, यह है कला। खजुराहो के मंदिर या अजंता एलोरा के बगैर हम जीवन की कल्पना करें, लता और आशा के सुरों के बगैर हम सोच कर देखें जीवन कितना विरान होगा। यह है कला,जो हमें मनुष्य होने का अहसास देती है।
मानव विकास में कला की इसी अहमियत को देखते हुए 15 अप्रैल, 2012 को इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ आर्ट (आईएए) ने ग्वाडालाजारा, मैक्सिको में आयोजित महासभा में कला और कलाकारों के सतत विकास के प्रति जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से विश्व कला दिवस के रूप में स्वीकार किया। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ आर्ट (आईएए) की स्थापना 1948 में बेरूत में हुई थी और 1954 में यह यूनेस्को के साथ साझेदारी कर कलाकारों की वैश्विक संस्था के रूप में स्वीकार की गई। यह संयोग ही है कि यह दिन प्रसिद्ध कलाकार लियोनार्डो दा विंची के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, जिनकी कला भाईचारा, शांति, सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए जानी जाती है। हर वर्ष विश्व कला दिवस के लिए एक थीम का निर्धारण किया जाता है, इस वर्ष विश्व कला दिवस की थीम है- ‘अभिव्यक्ति का उद्यान: कला के माध्यम से समुदाय की समझ समृद्ध करना’। स्वाभाविक है जब दुनियाभर में अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने की कोशिशें चल रही हों, वहां कला की दुनिया अपनी जवाबदेही का अहसास कर अभिव्यक्ति की खूबसूरती को रेखांकित करने आगे बढ़े।
कला के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यह रही कि इसे समझने की चीज समझा ही नहीं गया। प्रकृति ने कला की इतनी समृद्ध विरासत हमें सौंपी कि हमने उसकी अहमियत ही नजरअंदाज कर दी। पेड़, फूल, पत्ते, पक्षी, आकाश, नदी हमारे आस पास दिखते, लेकिन उनके सौंदर्य को, उनकी कलात्मकता को स्वीकार करना हमने सीखा ही नहीं। जो फूल हमारे स्वभाव को बदलने का सामथ्र्य रखते थे, उसमें किसी उपचार का लेप हम देखने लगे। जाहिर है समय के साथ कला की भागीदारी हमारे जीवन से कम होती चली गई। एक बार रेखाचित्रों की एक प्रदर्शनी में एक दर्शक ने एक विश्वप्रसिद्ध कलाकार से पूछा, आप ये क्या बनाते हैं, आड़ी तिरछी लकीरें, ये कोई कला है, ये तो मैं भी खींच सकता। कलाकार ने पूछा, आप क ख ग जानते हो, उसने कहा, हां, कलाकार ने फिर पूछा- और चाइनीज? उसने कहा, चाइनिज तो मैंने पढ़ा ही नहीं, कैसे जानूंगा? कलाकार ने कहा, जैसे आपने चाइनीज नहीं पढ़ी, उसी तरह कला भी नहीं पढ़ी, इसीलिए आपको ये पेंटिंग,लकीरें मात्र दिख रही। वास्तव में कला के महत्व को औपचारिक रूप से तो स्वीकार करते हैं, लेकिन लोग उसकी संवेदना से जुड़ सकें, इसके लिए कोई प्रयास नहीं करते। आज तो स्कूलों में सबसे हाशिए पर चित्रकला और संगीत की शिक्षा रहती।
आज के एआइ के दौर में जहां मौलिकता और रचनात्मकता हमारे सोचने समझने की क्षमता को लील रही है, मोबाइल हमारी समझ और संवेदना को शून्य बना रही है, एक कला ही है जो हमें हमारा जीवन वापस लौटा सकती है। आश्चर्य नहीं कि इस वर्ष की थीम कला के माध्यम से मानव समुदाय की समझ समृद्ध करना रखा गया है। हम समझने को तैयार नहीं, या फिर समझना नहीं चाहते कि मानव स्वभाव में बढ़ती उग्रता का सबसे अहम कारण कला से विमुख होना भी है। प्राइमरी स्कूलों तक में जानलेवा झगड़े आखिर क्यों बढ़ रहे, क्योंकि ब्रश और पेंट, हारमोनियम और तबले की जगह मोबाइल थमा दिए, कोर्स के बैग इतने भारी कर दिए कि रंगीन पत्थरों और पक्षियों के रंग बिरंगे पंखों के लिए जगह ही नहीं बची, कहां से और कैसे उम्मीद रखें हम संवेदना की, जब कला के बारे में बताना हम समय का अपव्यय मान लेते हैं।
विश्व कला दिवस हमें याद दिलाता है जीवन के रुखेपन को कला की तरलता ही कम कर सकती है। और यह आज के आज नहीं हो सकता, बच्चों को हम चलना सिखाते हैं, साइकिल चलाना सिखाते हैं, कला भी सिखानी पड़ेगी, यदि हम चाहते कि हमारी आने वाली पीढिय़ां मानव सभ्यता का हिस्सा बनी रहें।
Updated on:
14 Apr 2026 06:22 pm
Published on:
14 Apr 2026 05:25 pm
