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अक्षय ठाकुर के गांव में फांसी पर आक्रोश व्याप्त है

निर्भया गैंगरेप के अक्षय ठाकुर के गांव में आक्रोश की (Villagers of Akshay is annoyed ) चिंगारी फूटने लगी है। गांव में हर गली दरवाजे पर अक्षय के फांसी की ही चर्चा ( Discussion of Akshay Death penalty ) होती रही। अक्षय की पत्नी की याचिका पर सुनवाई टलने से भी लोग गुस्से में नजऱ आए।

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पटना

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Yogendra Yogi

Mar 20, 2020

अक्षय ठाकुर के गांव में फांसी पर आक्रोश व्याप्त है

अक्षय ठाकुर के गांव में फांसी पर आक्रोश व्याप्त है

पटना(प्रियरंजन भारती): औरंगाबाद के नवीनगर से टंडवा होते हरिहरगंज तक जाने वाली मुख्य पक्की सड़क के किनारे झारखंड की सीमा से सटे अक्षय का गांव करमा लहंग अभी अद्भुत सन्नाटे और गुस्से का गवाह बना हुआ है। निर्भया गैंगरेप के दोषियों को फांसी तो दे दी गई पर उनमें से एक अक्षय ठाकुर के गांव में आक्रोश की (Villagers of Akshay is annoyed ) चिंगारी फूटने लगी है। गांव के हर शख्स की आंखों में आक्रोश झलक रहा है। गांव में हर गली दरवाजे पर अक्षय के फांसी की ही चर्चा ( Discussion of Akshay death penalty) होती रही। अक्षय की पत्नी की याचिका पर सुनवाई टलने से भी लोग गुस्से में नजऱ आए।

गांव में पसरा रहा सन्नाटा
अक्षय को फांसी से गांव में बड़ा ( Deep silence of Akshay village ) सन्नाटा पसरा रहा। गलियों में वीरानगी छाई रही। गांव से बाहर मुख्य सड़क पर मध्य विद्यालय के पास के घरों के दरवाजे पर बैठे पुरुष और महिलाओं में सिर्फ यही चर्चा होती रही। अस्सी से ऊपर की उम्र पार कर चुकी लक्ष्मी देवी मगही में कहती है, 'फांसी के सजाए गलत होइत हई। हमनी ओकरा अच्छा से जान ही। ऊ ओइसन लइका हइए न हलई जेकरा लागी फांसी देल गलई।' (फांसी की सजा गलत है, हम उसे अक्षय को अच्छी तरह जानते हैं, वो ऐसा लड़का नहीं था, जिसे फांसी दी गई है) अक्षय के दरवाजे पर बैठे युवक तो इतने आक्रोशित दिखे।

फांसी के लिए मीडिया दोषी
गांव के युवक फांसी के लिए मीडिया को भी दोषी ठहराते रहे। उनका मानना था कि घटना के बाद दोषियों को सजा दिलाने के मामले में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। मीडिया वाले इसे खूब तूल देते रहे। पर मीडिया ने यह कभी नहीं बताया कि अक्षय निर्दोष है। अक्षय के घर के आसपास के घरों की महिलाएं खामोश और गमज़दा दिखीं।
गांव की गली में लाठी के सहारे चलते एक बुजुर्ग रामायण सिंह कह रहे थे, 'फांसी के बदले आउ कोई सजाए हो सक हलई। फांसीसीए एगो सजाए न हलई (फांसी के बदले कोई ओर सजा हो सकती थी, फांसी लायक सजा नहीं थी)।

नाराज रहे ग्रामीण
घर में मातम और सन्नाटा पसरा था। हर कोई दरवाजे पर आकर उदास हो जाता पर गुस्से का इज़हार भी कर जाता। गांववाले एकस्वर से कहते रहे कि अक्षय बिल्कुल निर्दोष था। उसके शील स्वभाव की हर कोई तारीफ ही करता दिखा। किसी ने भी नहीं कहा कि वह ऐसा कुकृत्य कभी कर सकता है। गांव में अक्षय की पत्नी द्वारा परिवार न्यायालय में दायर तलाक के मुकदमे की सुनवाई टलने से भी लोग गुस्से में नजऱ आए। चर्चा थी कि फांसी टल सकती है। उसकी पत्नी और मां दिल्ली में बेटे से आखिरी बार मिलने गई थी।