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Bihar Politics: नीतीश की विदाई की इनसाइड स्टोरी! कैसे लिखी गई 20 साल के सुशासन के अंत की पटकथा

नीतीश कुमार के परिवार के लोगों को 3 मार्च तक उनके राज्यसभा जाने की योजना की कोई भनक नहीं थी। जब तक उन्हें इसकी जानकारी मिली, तब तक काफी देर हो चुकी थी।
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पटना

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Rajesh Kumar Ojha

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Updated: 6 Mar 2026, 12:19 PM IST

CM नीतीश कुमार (ANI)

Bihar Politicsनीतीश कुमार का राज्यसभा जाना लगभग तय हो गया है और उन्होंने इसके लिए नामांकन भी दाखिल कर दिया है। पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान नारा दिया गया था '2025 से 2030, फिर से नीतीश कुमार।' लेकिन 2030 से पहले ही नीतीश कुमार के बिहार की राजनीति छोड़कर दिल्ली की राजनीति में जाने को लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि इसकी तैयारी पिछले करीब 15 दिनों से चल रही थी। उनके मुताबिक,चर्चा की शुरुआत नीतीश कुमार के बेटे निशांत को राज्यसभा में भेजने के विकल्प से हुई थी। जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ी, यह बात जोर पकड़ने लगी कि यह समय नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए एक उपयुक्त मौका बन सकती है। सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी अपने कुछ सहयोगियों के साथ बातचीत में इसके संकेत देते हुए कहा कि नीतीश कुमार की सेहत वाकई चिंता का विषय है और राज्यसभा की सीट बिहार के सबसे बड़े नेता के लिए एक सम्मानजनक विदाई हो सकती है। इसके बाद इस दिशा में तैयारियां शुरू हुई।

नीतीश को इन तीनों ने तैयार किया

सूत्रों के मुताबिक, इस मुद्दे पर नीतीश कुमार से बातचीत करने से पहले अमित शाह ने जदयू के तीन वरिष्ठ नेताओं केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन ‘ललन’ सिंह, राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा और बिहार सरकार के मंत्री विजय कुमार चौधरी के साथ कई दौर की चर्चा की। बातचीत की शुरुआत निशांत को लेकर की गई थी। बीजेपी नेतृत्व ने सुझाव दिया कि निशांत को राज्य की राजनीति में शामिल किया जा सकता है। इसके बाद निशांत की मुलाकात अमित शाह से कराई गई। सूत्रों का कहना है कि विजय कुमार चौधरी ने इस मुद्दे पर नीतीश कुमार से बातचीत शुरू की, जबकि जदयू के बाकी दो नेताओं ने भी इस प्रक्रिया में उनका साथ दिया। बीजेपी के सूत्रों के अनुसार,फरवरी के आखिरी सप्ताह से इन तीनों नेताओं ने नीतीश कुमार के साथ इस मुद्दे पर नियमित बैठकें भी कीं।

निशांत से शुरू हुई चर्चा नीतीश तक पहुंचा

इसके बाद जदयू के राष्ट्रीय महासचिव मनीष वर्मा की संभावित उम्मीदवारी को खत्म कर दिया गया और निशांत को राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में नाम आगे बढ़ाया गया। इससे पहले योजना यह थी कि निशांत को राज्य की राजनीति में चुपचाप एंट्री दिलाई जाए। सूत्रों का कहना है कि निशांत के नाम का प्रस्ताव मनीष वर्मा को रोकने की रणनीति के तहत आगे बढ़ाया गया, क्योंकि उनकी नीतीश कुमार तक सीधी पहुंच मानी जाती थी। बताया जाता है कि इसी बातचीत के दौरान बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने नीतीश कुमार को राज्यसभा जाने की उनकी पुरानी इच्छा की भी याद दिलाई। साथ ही यह भी कहा गया कि अप्रैल में खाली होने वाली सीटों के बाद राज्यसभा की अगली सीटें करीब दो साल बाद ही उपलब्ध होगी। इस तरह से नीतीश कुमार को राज्य सभा के लिए तैयार किया गया। इसके बाद 1 मार्च तक इसकी चर्चा अंदरखाने से निकलकर राजनीतिक गलियारों में फैलने लगी।

परिवर के लोगों को भी नहीं लगी भनक

कहा जाता है कि 3 मार्च को नीतीश कुमार के परिवार को भी इस मामले की भनक लगी, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। 4 मार्च को परिवार के सदस्य और जदयू के सबसे वरिष्ठ मंत्रियों में से एक बिजेंद्र प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार से मुलाकात कर उनको राज्य सभा जाने से रोकने की आखिरी कोशिश की। उन्होंने पार्टी के बड़े हित का हवाला देते हुए नीतीश से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने का आग्रह भी किया। लेकिन, तब तक देर हो चुकी थी। नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए नामांकन पत्र पर हस्ताक्षर कर चुके थे।

बीजेपी क्यों थी जल्दी में

बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार के पूरे पांच साल तक मुख्यमंत्री बने रहने की उम्मीद नहीं थी। बिहार के एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने बताया कि एनडीए ने विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार को चेहरा बनाकर जीता था, लेकिन अंदरखाने यह समझौता था कि अस्वस्थ चल रहे नीतीश नई एनडीए सरकार की पहली सालगिरह, यानी सितंबर से पहले ही पद छोड़ देंगे। सूत्रों का कहना है कि हालांकि बीजेपी को तब तक इंतजार करना “रिस्की” लगा। एक नेता के मुताबिक, ऐसा करने से जदयू को और मजबूत होने तथा जमीन पर अपनी पकड़ बढ़ाने का समय मिल जाता। तब तक जदयू के पास सरकार में और मंत्री भी हो सकते थे। इसको लेकर सितंबर से पहले ही उनको राज्य सभा भेजने का प्लान तैयार किया गया।