
(पटना): एनडीए में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला लोकजन शक्ति पार्टी के अल्टीमेटम के बहाने आखिरकार फाइनल हो गया और भाजपा को इसके लिए अपनी जीती हुई सीटों की कुर्बानी देने के लिए कलेजे पर पत्थर रखने की नियति झेलनी पड़ गई। सबसे दीगर बात यह कि 2014 के हिसाब से नहीं बल्कि जदयू की जिद के चलते भाजपा को 2009 के फॉर्मूले पर बात बनानी पड़ी। तब भाजपा मात्र पंद्रह और जदयू पच्चीस सीटों पर चुनाव में उतरा था।
भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने सीट शेयरिंग फॉर्मूले की जो घोषणा की है उसके मुताबिक स्पष्ट रूप से पार्टी को जीती हुई पांच सीटों की कुर्बानी देनी पड़ रही है। भाजपा ने 2014 में बाइस,लोजपा ने छह और रालोसपा ने तीन सीटें जीतीं थीं। जदयू ने तब अलग चुनाव लड़ा और उसे मात्र दो सीटों पर जीत हासिल हुई थी। प्रत्यक्ष रूप से जदयू सीट शेयरिंग में फायदे में है। उसे गठबंधन में रहते हुए अपनी जीती हुई दो सीटों के साथ ही अन्य पंद्रह सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फायदा हो रहा है। यह और बात है कि जदयू चुनाव के बाद वास्तव में भाजपा गठबंधन का हिस्सा बना रह पाएगा या नीतीश फिर डोल जाएंगे। ऐसा इसलिए कि नीतीश कुमार की छवि आज पलटूराम की बन गई है और भाजपा के साथ बने रहते हुए भी उनके संदेशवाहक कांग्रेस नेताओं के संपर्क में हैं।
लोजपा की जिद पूरी
लोजपा ने भी अपनी जिद मनवा ली। उपेंद्र कुशवाहा के महागठबंधन में शामिल हो जाने के बाद जब पासवान की ओर से तल्खी दिखाई जाने लगी तो भाजपा सचेत हुई और उसे अहसास हुआ कि समय रहते यदि सीट शेयरिंग तय नहीं की गई तो बिहार उसके हाथ से निकल जाएगा। बताने की ज़रूरत नहीं है कि कुशवाहा ने प्रधानमंत्री से भी मिलने की चेष्टा भरपूर की ताकि गठबंधन में हो रही उनकी उपेक्षा का सच सामने लाकर कोई सम्यक फैसला हो सके। हालांकि उपेंद्र कुशवाहा को नीतीश कुमार से एलर्जी थी और नीतीश को भाजपा फिलहाल नहीं छोड़ने के मूड में है।
17-17-6 का फैसला
काफी जद्दोजहद के बाद सीट शेयरिंग तय हुई जिसमें प्रत्यक्षतः भाजपा को कमतर सीटों पर समझौते के लिए विवश होना पड़ा है। यह घोषणा की गई कि सीटों को लेकर मंथन अभी चल रहा है और इसकी अंतिम घोषणा बाद में सब तय हो जाने के बाद की जाएगी। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक जदयू और लोजपा की सीटें कमोबेश तय हो चुकी हैं। दो एक सीटों पर तय होना ही शेष रह गया है। इसलिए ही अभी घोषणा नहीं की गई।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक जदयू को दी जा रही सीटें इस प्रकार हैं-
नालंदा, पूर्णिया, मधेपुरा, बाल्मिकीनगर,झंझारपुर, काराकाट, जहानाबाद, किशनगंज, कटिहार, गोपालगंज या सासाराम, सीतामढ़ी, दरभंगा, महाराजगंज, मुंगेर, सुपौल,औरंगाबाद या आरा और बांका।
इसी तरह लोजपा को हाजीपुर,समस्तीपुर, जमुई,वैशाली, नवादा या बेगूसराय। इसके अलावा खगड़िया या कोई और सीट पर कवायद अभी जारी है। इसके अलावा भाजपा अपने हिस्से की खाली हो रही एक सीट से रामविलास पासवान को राज्यसभा में भेजेगी क्योंकि वह चुनाव नहीं लड़ना चाहते।
भाजपा को हो रहा सीटों का नुकसान
तय फॉर्मूले के अनुसार 17-17-6 सीटों के तय हुए फॉर्मूले के हिसाब से भाजपा को अपनी जीती हुई कम से कम पांच सीटों का घाटा सहना पड़ रहा है। पिछले चुनाव में रालोसपा की जीती हुई तीनों सीटें काराकाट, जहानाबाद और सीतामढ़ी जदयू के खाते में डाल दी गई। इसके अलावा आरजेडी कांग्रेस की जीती हुई कटिहार, किशनगंज,मधेपुरा और बांका सीटें भी जदयू को दे दी गई। पूर्णिया और नालंदा सीटें जदयू की जीती हुई हैं। शेष झंझारपुर, बाल्मिकीनगर, गोपालगंज, सासाराम, दरभंगा, महाराजगंज, सुपौल,औरंगाबाद, आरा जैसी सीटें भाजपा की जीती हुई हैं जबकि मुंगेर से लोजपा की वीणा सिंह जीतीं हैं। अब सवाल यह है कि इन जीती हुई सीटों को भाजपा कैसे समायोजित करेगी। यह बड़ा सवाल है।
सूत्रों की मानें तो पाटलिपुत्र या पटना साहिब में से एक सीट भी जदयू मांग रहा जिसके बदले कोई एक सीट वह छोड़ेगा। भाजपा पटना साहिब से शत्रुघ्न सिन्हा को टिकट नहीं देगी। बहुत संभव है कि यह सीट उसे मिल जाए। इसी तरह दरभंगा से कीर्ति आजाद को भी भाजपा फिर उम्मीदवार नहीं बना रही।लिहाजा यह सीट उसे दे देना लाजिमी है। इसी तरह मुंगेर से लोजपा ने दावेदारी छोड़ दी है तो यह जदयू के ललन सिंह के लिए दे दी गई। बाकी औरंगाबाद, आरा,गोपालगंज, सुपौल,बाल्मिकीनगर, सासाराम, सुपौल,झंझारपुर आदि जीतीं हुई सीटों पर भाजपा क्या करेगी यह उसके लिए बड़ी समस्या है।
सूत्रों की सुनें तो केंद्रीय मंत्री आरके सिंह की सीट आरा यदि जदयू को देनी पड़ गई तो उन्हें राजपूत बहुल दूसरी सीट देना आसान नहीं होगा। वैशाली सीट लोजपा के कोटे में जा रही है और सांसद ररामा सिंह उसके उम्मीदवार नहीं होने जा रहे। संभवतः रामा सिंह. और खगड़िया के सांसद महमूद अली कैसर कांग्रेस के उम्मीदवार बनेंगे। ऐसे में तय है कि सीट बंटवारे के अंतिम निर्णय के बावजूद भाजपा को अभी अपने सांसदों की उम्मीदवारी सुनिश्चित करने में भारी सिरदर्दी झेलनी पड़ जाएगी।
इसमें यह कहा जा सकता है कि सामाजिक समीकरणों के लिहाज से कई सीटों की अदलाबदली अभी होगी जिसमें बहुत संभव है कि उम्मीदवार भी एक दल दूसरे की सीट पर तय करें। जो भी हो पर यह तय है कि इस पूरी कवायद में सबसे अधिक नुकसान भाजपा को ही सहना पड़ेगा।
Published on:
24 Dec 2018 04:25 pm
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