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जागीरदारी का किया त्याग और बने स्वावलंबी

  - ट्रिब्यूट- गुलाब सिंह धीरावत(चाय वाले) को याद कर रहे हैं जयपुराइट्स

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जागीरदारी का किया त्याग और बने स्वावलंबी

जागीरदारी का किया त्याग और बने स्वावलंबी

जयपुर. अपनी चाय के दम पर हजारों-लाखों लोगों को अपना मुरीद बनाने वाले गुलाब सिंह धीरावत आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन लोग उन्हें सोशल मीडिया पर अपनी यादों के रूप में जाहिर कर रहे हैं। गुलाबजी चायवाले ने यह साबित किया कि समृद्ध परिवार में पैदा हुआ एक शख्स जिसने सुख सुविधाओं का त्याग किया, वे सादगी के उस रास्ते पर चल पड़े जो मुश्किलों भरा था। चकाचौंध की इस दुनिया में परोपकार की अनोखी मिसाल कायम की। गुलाब जी के हाथों में ऐसा जादू था कि जो भी उनके हाथ की बनी चाय का स्वाद चख लेता है, वह दोबारा जयपुर ज़रूर आता है। आज़ादी से पहले सन 1946 में गुलाब सिंह ने चाय का एक ठेला लगाया और उसके बाद एक छोटी सी दुकान ली, उस वक्त के गुलाब अब गुलाब जी बन चुके हैं। समृद्ध परिवार में पैदा हुए गुलाब जी का जीवन बड़ा ही सादगी भरा है। गुरुकुल में अपने पारिवारिक जोशी से पांच वर्ष तक शिक्षा ग्रहण कर गुलाबजी ने अपनी जागीरी का त्याग कर दिया। उन्होंने निश्चय किया कि वे एक स्वावलंबी बनेंगे और सात्विक कमाई कर उसी से समाज सेवा करेंगे। चाय की दुकान खोलने के बाद ही गुलाबजी सुबह-सुबह निशक्त जनों को मुफ्त में चाय पिलाने लगे।

पूर्व उपराष्ट्रपति भी थे कायल
गुलाबजी की तरह उनकी चाय का स्वाद भी लाजवाब रहा। उनकी दुकान पर दूर-दूर से लोग उनकी चाय पीने आते हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति भौरोंसिंह शेखावत तो अक्सर चाय पीने आया करते थे। संतूर वादक शिवकुमार शर्मा को किसी संगीत प्रेमी ने जब गुलाबजी के कार्यों की जानकारी दी तो वे भी खुद को उनसे मिलने औऱ चाय पीने से नहीं रोक पाए। गणपति प्लाजा स्थित यंत्रेश्वर महादेव मंदिर में 40 सालों से उनके दम पर संगीत के दो बड़े समारोह होते रहे हैं।