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कथक की कथा में प्रकृति का सम्मोहित करने वाले दृश्य ने जीता दिल

स्पिक मैके की ओर से आयोजित कार्यक्रम में गौरी दिवाकर ने दी कथक प्रस्तुतियां

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कथक की कथा में प्रकृति का सम्मोहित करने वाले दृश्य ने जीता दिल

कथक की कथा में प्रकृति का सम्मोहित करने वाले दृश्य ने जीता दिल


अनुराग त्रिवेदी
जयपुर. स्पिक मैके की ओर से सोमवार को लखनऊ घराने की नृत्यांगना गौरी दिवाकर ने जयपुर में दा जगहों पर कथक प्रस्तुतियां दीं। पहली प्रस्तुति महाराजा सवाई भवानी सिंह स्कूल जगतपुरा और दूसरी स्वेज फार्म स्थित महात्मा ज्योतिराव फुले यूनिवर्सिटी कैंपस में हुई। गौरी की दोनों प्रस्तुतियों में तबले पर योगेश गंगानी, हारमोनियम पर समियुल्लाह खान एवं सारंगी पर मोहम्मद अयूब ने संगत की।इस मौके पर यूनिवर्सिटी के चेयरमैन निर्मल पंवार ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों के जरिए स्टूडेंट्स में हमारी संस्कृति का प्रवाह हमारे गायन, वादन और नृत्य के माध्यम से करा रहा है। स्कूल की प्राचार्या वैदेही सिंह ने कलाकार को सम्मानित किया।

गणेश वंदना से शुरुआत

गणेश वंदना से शुरू हुए नृत्य का कथानक पूरी तरह प्रकृति के सुंदर वर्णन से प्रेरित था। स्टूडेंट्स की जिज्ञासा और गौरी के फुटवर्क से उनके उत्तर बेहद सम्मोहित कर रहे थे। नृत्य के साथ कथा कहना यानी इसी भाव की मुद्राओं में मयूर का नृत्य करना तो पेड़ों से फूलों का गिरना, उन्हें पूजा के लिए चुनना, फूल पर पानी की बूंद का गिरना, उस पर भंवरे का मंडराना और फिर एकाएक श्रीकृष्ण की बांसुरी का बज उठना, ये दृश्य किसी सम्मोहन से कम प्रतीत नहीं हो रहे थे।

बच्चों की जिज्ञासा और कलाकार के उत्तर

एक कलाकार डेढ़ से दो घंटे की प्रस्तुति के बाद बच्चों के जेहन में कुछ ऐसे प्रश्न थे जो बार-बार उठ रहे थे। क्या कलाकार थकते नहीं हैं? इतने चक्कर खाने के बाद तो कोई भी चित हो सकता है? याद कैसे होता है कि अब क्या करना है? गौरी दिवाकर ने बताया कि यह साधना है, पूजा है, जो प्रत्येक व्यक्ति के अंदर होती है, बस खुद में आत्मबल लाने की जरूरत है। सुबह जल्दी उठने से रात को विश्राम तक की प्रक्रिया जैसे एक तंत्र से चलता है, वैसे ही व्यक्ति का मन साधना के वश में है। जैसे आप किताबों में मन लगाते हैं, परीक्षा में प्रश्न का सटीक उत्तर देते हैं, वैसे ही एक कलाकार अपने भारत की संस्कृति में रमता है, कला को जीता है और उसी साधना में लीन हो जाता है।

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