
नक्सलवाद के बाद का बस्तर (AI फोटो)
Bastar Development Journey: बस्तर को लंबे समय तक देश ने बंदूक, बारूद और नक्सल हिंसा की तस्वीरों में देखा। जंगलों के भीतर बसे गांवों में स्कूल इमारतें थीं, लेकिन पढ़ाई नहीं; बच्चे थे, लेकिन बचपन नहीं। अब उसी बस्तर में एक शांत लेकिन निर्णायक बदलाव आकार ले रहा है- जहां संघर्ष की जमीन पर शिक्षा की वापसी हो रही है। अबूझमाड़ के रेकावाया गांव का स्कूल इसका उदाहरण है- जहां कभी नक्सली गतिविधियों का प्रभाव था, वहीं आज 167 बच्चे नियमित पढ़ाई कर रहे हैं।
इसी बदलाव को एक अलग दृष्टिकोण से सामने लाती है फीचर-डॉक्यूमेंट्री ‘शिमरिंग ओडिसी’, जो हाल ही में केरल के त्रिशूर में आयोजित 9वें अंतरराष्ट्रीय लोककथा फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित हुई। यह फिल्म नक्सलवाद की हिंसा को केंद्र में रखने के बजाय उस सामाजिक परिवर्तन को दर्ज करती है, जो भीतर ही भीतर बस्तर को बदल रहा है।
बस्तर को लंबे समय तक देश ने बंदूक, बारूद और नक्सल हिंसा की तस्वीरों में देखा। जंगलों के भीतर बसे गांवों में स्कूल इमारतें थीं, लेकिन पढ़ाई नहीं; बच्चे थे, लेकिन बचपन नहीं। अब उसी बस्तर में एक शांत लेकिन निर्णायक बदलाव आकार ले रहा है—जहां संघर्ष की जमीन पर शिक्षा की वापसी हो रही है।
इसी बदलाव को एक अलग दृष्टिकोण से सामने लाती है फीचर-डॉक्यूमेंट्री ‘शिमरिंग ओडिसी’, जो हाल ही में केरल के त्रिशूर में आयोजित 9वें अंतरराष्ट्रीय लोककथा फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित हुई। यह फिल्म नक्सलवाद की हिंसा को केंद्र में रखने के बजाय उस सामाजिक परिवर्तन को दर्ज करती है, जो भीतर ही भीतर बस्तर को बदल रहा है।
फिल्म की सबसे सशक्त परत यह है कि वह नक्सल प्रभाव को केवल “समस्या” के रूप में नहीं, बल्कि उससे बाहर निकलने की सामूहिक कोशिश के रूप में देखती है। अबूझमाड़ के रेकावाया गांव का स्कूल इसका उदाहरण है—जहां कभी नक्सली गतिविधियों का प्रभाव था, वहीं आज 167 बच्चे नियमित पढ़ाई कर रहे हैं। यह बदलाव किसी सैन्य अभियान से नहीं, बल्कि आदिवासी समुदाय के दबाव, पंचायत की पहल और प्रशासनिक सहयोग से संभव हुआ।
स्थानीय ग्रामीण- “हमने अपने बच्चों को वर्षों तक हिंसा के साए में बड़ा होते देखा, लेकिन अब उन्हें स्कूल जाते देखकर लगता है कि बस्तर सच में बदल रहा है।”
‘शिमरिंग ओडिसी’ यह सवाल उठाती है कि नक्सलवाद से लड़ाई सिर्फ सुरक्षा बलों से ही क्यों जोड़ी जाती है? क्या शिक्षा, विश्वास और स्थानीय भागीदारी उससे ज्यादा स्थायी समाधान नहीं हो सकते? फिल्म दिखाती है कि जब स्कूल खुलते हैं, तो सिर्फ कक्षाएं नहीं चलतीं—भय टूटता है, भविष्य बनता है।
फिल्म के निर्देशक रौनक शिवहरे मानते हैं कि स्कूलों का खुलना शांति की अंतिम गारंटी नहीं है, लेकिन यह उस दिशा में पहला ठोस कदम जरूर है। जहां कभी सन्नाटा और डर था, वहां अब बच्चों की आवाजें और घंटियों की ध्वनि सुनाई देती है। यही वह बदलाव है, जिसे अक्सर हेडलाइनों में जगह नहीं मिलती।
स्थानीय शिक्षक ने कहा कि बस्तर में कभी बंदूक की आवाज़ ही बच्चों की दुनिया थी, लेकिन आज उन्हीं हाथों में किताबें हैं। यह सिर्फ स्कूल खुलने की कहानी नहीं, बल्कि एक पूरे समाज के डर से उम्मीद तक पहुंचने का सफर है।
नक्सलवाद से जुड़ी खबरें अक्सर मुठभेड़, गिरफ्तारी और हिंसा तक सीमित रहती हैं। ‘शिमरिंग ओडिसी’ उस दायरे को तोड़ती है और बस्तर को एक ऐसे समाज के रूप में प्रस्तुत करती है, जो अपने बच्चों के भविष्य के लिए जोखिम उठाने को तैयार है। यह फिल्म बताती है कि बस्तर की असली लड़ाई अब जंगलों में नहीं, कक्षाओं में लड़ी जा रही है।
यह कहानी नक्सलवाद के अंत की घोषणा नहीं करती, लेकिन यह जरूर संकेत देती है कि बस्तर अब सिर्फ संघर्ष का इलाका नहीं रहा—वह उम्मीद, शिक्षा और बदलाव की प्रयोगशाला बनता जा रहा है।
Published on:
24 Jan 2026 03:56 pm
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