
सांकेतिक इमेज (सोर्स-ChatGpt)
भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। अब इसके नतीजे भी आंकड़ों में दिखने लगे हैं। हेल्थ-टेक कंपनी फिलिप्स की फ्यूचर हेल्थ इंडेक्स 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 71% हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स का कहना है कि AI की मदद से उनकी मरीज देखने की क्षमता बढ़ी है। AI की मदद से डॉक्टर औसतन हर हफ्ते 10 मरीज ज्यादा देख पा रहे हैं। खास बात यह है कि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा सिर्फ 50% है, जहां डॉक्टर औसतन 8 मरीज ज्यादा देख पा रहे हैं। यानी कि भारत में AI का असर वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा दिख रहा है।
फ्यूचर हेल्थ इंडेक्स 2026 रिपोर्ट फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच भारत, ब्राजील, चीन, फ्रांस, जर्मनी, इंडोनेशिया, नीदरलैंड्स, सऊदी अरब, ब्रिटेन और अमेरिका में किए गए सर्वे पर आधारित है। इसमें कुल 2,000 से ज्यादा हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स और 20,000 से ज्यादा मरीज शामिल किए गए। जिनमें भारत से 200 हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स और 2,004 मरीज थे। फिलिप्स ने भारत के नतीजे 11 अगस्त 2026 को जारी किए हैं।
हेल्थ-टेक कंपनी फिलिप्स की फ्यूचर हेल्थ इंडेक्स 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, AI बेहतर इलाज और गलतियां पकड़ने में माहिर है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 85% हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स मानते हैं कि AI मरीजों के इलाज के नतीजों को बेहतर कर सकता है, जो 2025 की रिपोर्ट के 76% से बढ़कर है। यानी एक साल में AI को लेकर स्वास्थ्यकर्मियों का भरोसा काफी बढ़ा है। इसके अलावा 48% हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स ने बताया कि पिछले 3 महीनों में एआइ ने कम से कम तीन बार किसी संभावित मेडिकल गलती को पहचानने या रोकने में मदद की।
AI, स्वास्थ्यकर्मियों का समय भी बचा रहा है। 58% हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स ने बताया कि एआइ की वजह से उन्हें हर साल औसतन कम से कम 132 घंटे का समय बच रहा है, जो 3 से ज्यादा पूरे कामकाजी हफ्तों के बराबर है। इस बचे हुए समय का असर मरीजों से बातचीत की गुणवत्ता पर भी दिख रहा है। समय बचाने वाले 75% स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि अब वे मरीजों के साथ ज्यादा विस्तार और गंभीरता से बातचीत कर पा रहे हैं। वहीं, मरीजों की तरफ से भी इस बदलाव को स्वीकार किया जा रहा है। 68% मरीजों ने कहा कि जेनरेटिव AI ने उन्हें डॉक्टर के साथ मिलने वाले सीमित समय का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद की है।
इसके अलावा 82% हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स ने बताया कि एआइ से उनके वर्कफ्लो की दक्षता बेहतर हुई है, जबकि 80% ने कहा कि केयर टीमों के बीच मरीज की समेकित जानकारी तक पहुंच आसान हुई है। AI का असर स्वास्थ्यकर्मियों के निजी जीवन पर भी दिख रहा है। 71% कर्मचारियों ने वर्क-लाइफ बैलेंस बेहतर होने, 69% ने तनाव घटने और 69% ने कम ओवरटाइम या घर काम ले जाने की बात कही। वहीं 77% को उम्मीद है कि एआइ के गहराई से जुड़ने के साथ नई तरह की भूमिकाएं भी सामने आएंगी।
रिपोर्ट का एक अहम पहलू यह भी है कि एआइ को भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की असमानता कम करने के औजार के तौर पर भी देखा जा रहा है। 80% हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स मानते हैं कि एआइ ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की पहुंच बेहतर करने में मदद कर सकता है, जबकि 83% का मानना है कि यह अलग-अलग स्वास्थ्य केंद्रों के बीच सेवा गुणवत्ता के फासले को कम कर सकता है। सर्वे रिपोर्ट से स्पष्ट है कि भारत स्वास्थ्य सेवा में एआइ-सक्षम भविष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इसके साथ ही 71% स्वास्थ्यकर्मियों तथा 68% मरीजों की यह राय दिखाती है कि भरोसा अब AI की संभावना से आगे बढ़कर उसके असर को व्यवस्थित तरीके से बढ़ाने की दिशा में जा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 86% हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स का कहना है कि AI से मिलने वाले हर आउटपुट पर इंसानी निगरानी जरूरी है। वहीं 78% स्वास्थ्यकर्मियों को एआइ से तैयार हुई गलत जानकारी को खुद ठीक करना पड़ा है। इसके अलावा 45% हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स का कहना है कि उनके संस्थानों में एआइ को लेकर प्रशिक्षण सीमित या असंगत है। यही वजह है कि रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि जिम्मेदार तरीके से AI को अपनाने के लिए बेहतर प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और गवर्नेंस ढांचे की जरूरत है। फिलिप्स की यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में AI अब सिर्फ एक संभावना नहीं, बल्कि रोजमर्रा की क्लिनिकल प्रैक्टिस का हिस्सा बनता जा रहा है। लेकिन इसका पूरा फायदा तभी मिलेगा, जब तकनीक के साथ-साथ प्रशिक्षण, निगरानी और नियामकीय ढांचे को भी उतनी ही तेजी से मजबूत किया जाए।
Updated on:
20 Aug 2026 09:58 pm
Published on:
20 Aug 2026 09:58 pm
