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बिहार में मखाना खेती का विस्तार, 21 जिलों तक पहुंची फसल, मशीनों और नई योजनाओं से बढ़ीं संभावनाएं

Bihar Makhana Cultivation : जानिए कैसे बिहार के 21 जिलों में मखाना की खेती का विस्तार हो रहा है। आधुनिक मशीनों, साबौर मखाना-1 किस्म, ODOP और सरकारी योजनाओं से बढ़ी किसानों की कमाई।
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Bihar Makhana Farming Expansion

Bihar Makhana Farming Expansion : बिहार में तेजी से बढ़ रही मखाने की खेती, PC- Patrika

बिहार में मखाना की खेती तेजी से विस्तार कर रही है। कभी मुख्य रूप से मिथिलांचल और सीमांचल के कुछ जिलों तक सीमित रहने वाली यह फसल अब राज्य के 21 जिलों में पहुंच चुकी है। इसके साथ ही आधुनिक मशीनों, सरकारी योजनाओं, अनुसंधान और प्रसंस्करण सुविधाओं के विस्तार ने मखाना उत्पादन को नई दिशा दी है।

21 जिलों तक पहुंची मखाना की खेती

पिछले कुछ वर्षों में मखाना खेती का दायरा लगातार बढ़ा है। वर्तमान में दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया, सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, शिवहर, मुंगेर, भागलपुर, पश्चिम चंपारण, सारण, वैशाली, बक्सर और पटना सहित 21 जिलों में इसकी खेती की जा रही है।

इस विस्तार के पीछे किसानों को दिए गए प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और खेती से जुड़ी मशीनों की उपलब्धता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मशीनों से आसान हुई उत्पादन प्रक्रिया

पारंपरिक रूप से मखाना प्रसंस्करण श्रमसाध्य और समय लेने वाला काम माना जाता रहा है। अब सीड वॉशर, सीड ग्रेडर और पॉपिंग मशीन जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग से यह प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और तेज हुई है।

अनुदान आधारित योजनाओं के माध्यम से किसानों और उत्पादक समूहों तक इन मशीनों की पहुंच बढ़ाई जा रही है, जिससे प्रसंस्करण लागत कम करने और उत्पाद की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिल रही है।

राष्ट्रीय मखाना बोर्ड और नई केंद्रीय योजना

मखाना क्षेत्र को संगठित रूप से विकसित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर पहल की गई है। इसके तहत राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की गई, जिसका लक्ष्य उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, विपणन और निर्यात को प्रोत्साहन देना है।

इसके साथ ही मखाना विकास से जुड़ी केंद्रीय क्षेत्र योजना के लिए वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है, जिससे किसानों, प्रसंस्करण इकाइयों और उत्पादक संगठनों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

उत्पादन और उत्पादकता में बढ़ोतरी

बिहार देश में मखाना उत्पादन का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। हाल के कृषि अनुमानों के अनुसार राज्य में मखाना उत्पादन लगभग 60 हजार मीट्रिक टन के आसपास रहा है और औसत उत्पादकता करीब 2 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है।

कटिहार, पूर्णिया, मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, सुपौल, अररिया, मधेपुरा और सीतामढ़ी प्रमुख उत्पादक जिलों में शामिल हैं।

ODOP पहल से मिली नई पहचान

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकीकरण योजना (PMFME) के तहत वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) पहल में मखाना को कई जिलों का प्रमुख उत्पाद चुना गया है।

अररिया, कटिहार, मधुबनी, सुपौल, सहरसा और दरभंगा जैसे जिलों में इस पहल के माध्यम से प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और विपणन को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे स्थानीय उद्यमों और किसानों को नए अवसर मिल सकते हैं।

अनुसंधान और नई किस्मों पर जोर

दरभंगा स्थित ICAR-राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र मखाना उत्पादन, तकनीकी विकास, क्षमता निर्माण और विस्तार कार्यक्रमों पर काम कर रहा है।

वहीं बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर द्वारा विकसित ‘साबौर मखाना-1’ जैसी उन्नत किस्मों ने उत्पादकता सुधार की दिशा में नई संभावनाएं पैदा की हैं। इसके अलावा ‘मिथिला मखाना’ को मिला जीआई टैग इस उत्पाद की विशिष्ट पहचान को मजबूत करता है।

मखाना-कम-मत्स्य पालन मॉडल पर भी काम

कई क्षेत्रों में मखाना के साथ मत्स्य पालन को जोड़ने वाले मॉडल पर भी काम किया जा रहा है। इससे एक ही जल संसाधन से अतिरिक्त आय प्राप्त करने की संभावना बढ़ती है। कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों ने ऐसे मॉडल गांवों के विकास पर भी ध्यान दिया है।

दरभंगा को विकसित करने की पहल

दरभंगा में मखाना और बागवानी क्षेत्र के विकास को लेकर विभिन्न स्तरों पर योजनाएं बनाई जा रही हैं। इनमें हाईटेक नर्सरी, सूक्ष्म सिंचाई, किसान प्रशिक्षण, प्रसंस्करण सुविधाएं और निर्यात को बढ़ावा देने जैसे विषय शामिल हैं।

किसानों के लिए क्या हैं अवसर?

  • आधुनिक मशीनों से प्रसंस्करण प्रक्रिया आसान हो रही है।
  • प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता की पहुंच बढ़ रही है।
  • ODOP और GI टैग से ब्रांडिंग को मजबूती मिल रही है।
  • मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण के नए अवसर बन रहे हैं।
  • राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं से संस्थागत समर्थन मिलने की संभावना बढ़ी है।

आगे क्या करें किसान?

विशेषज्ञों की सलाह है कि किसान बागवानी विभाग, कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों से प्रशिक्षण प्राप्त करें। मशीन आधारित प्रसंस्करण, किसान उत्पादक संगठन (FPO) और मूल्य संवर्धन गतिविधियों से जुड़कर बेहतर बाजार तक पहुंच बनाई जा सकती है।

साथ ही, किसी भी निवेश से पहले स्थानीय कृषि अधिकारियों से सलाह लेना और बाजार की स्थिति की जानकारी लेना आवश्यक है।

बदलती तस्वीर का संकेत

मखाना अब केवल पारंपरिक फसल भर नहीं रह गया है। क्षेत्र विस्तार, आधुनिक तकनीक, अनुसंधान और सरकारी समर्थन के कारण यह बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान बना रहा है। आने वाले वर्षों में यदि प्रसंस्करण, विपणन और निर्यात ढांचे को और मजबूती मिलती है, तो मखाना किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।