
ग्लोबल एनर्जी मार्केट के बड़े बदलावों के बीच रिन्यूएबल पावर सेक्टर में भारत की ऐतिहासिक उड़ान। (फोटो: ANi)
मौजूदा दौर में वैश्विक पावर सेक्टर एक अभूतपूर्व बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। एक तरफ़ दुनिया की सबसे बड़ी यूटिलिटी कंपनियों का महा-विलय (मेगा-मर्जर) हो रहा है, तो दूसरी तरफ़ ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने पर अरबों डॉलर ख़र्च किए जा रहे हैं। भू-राजनीतिक (जियोपॉलिटिकल) उथल-पुथल और क्लीन एनर्जी की बढ़ती मांग ने कॉरपोरेट रणनीतियों की पूरी दिशा बदल कर रख दी है। इस बदलाव में भारत भी मज़बूती से अपने क़दम आगे बढ़ा रहा है, जहां बड़े औद्योगिक घराने रिन्यूएबल पावर में भारी निवेश कर रहे हैं।
दुनिया के ऊर्जा बाज़ार में इस वक़्त सबसे बड़ी हलचल नेक्स्टएरा और डोमिनियन के बीच होने वाले महा-विलय की है। इस रणनीतिक क़दम से वैश्विक ऊर्जा सेक्टर में एक ऐसा पावरहाउस अस्तित्व में आएगा, जिसकी क्षमता और पहुंच ऐतिहासिक होगी।
इसके समानांतर, यूरोपीय देश अपने पुराने पड़ चुके ग्रिड को सुधारने की भारी क़ीमत चुका रहे हैं। यूके के नेशनल एनर्जी सिस्टम ऑपरेटर (एनईएसओ) ने ताज़ा रिपोर्ट में ज़ाहिर किया है कि देश के बहुचर्चित 'ग्रेट ग्रिड अपग्रेड' की लागत 119 बिलियन डॉलर के चिंताजनक स्तर तक पहुंच सकती है। इस प्रोजेक्ट की लागत में हाल ही में 50% का भारी उछाल दर्ज किया गया है। स्पेन जैसे देशों ने कड़े क़दम उठाते हुए एक नया सरकारी डिक्री लागू किया है। इसके तहत मोबाइल नेटवर्क प्रदाताओं को यह सख़्त ताकीद की गई है कि ब्लैकआउट या पावर आउटेज की स्थिति में कम से कम चार घंटे का अनवरत नेटवर्क कवरेज सुनिश्चित किया जाए।
| ग्लोबल ग्रिड और विलय | प्रामाणिक तथ्य |
| महा-विलय (मेगा-मर्जर) | नेक्स्टएरा और डोमिनियन का एकीकरण, दुनिया की सबसे बड़ी यूटिलिटी बनेगी। |
| यूके ग्रिड अपग्रेड लागत | $119 बिलियन डॉलर (हालिया 50% वृद्धि)। |
| स्पेन का नया क़ानून | ब्लैकआउट के दौरान 4 घंटे का अनिवार्य मोबाइल नेटवर्क बैकअप। |
ईरान युद्ध के बाद से वैश्विक आपूर्ति शृंखला और ऊर्जा की क़ीमतों में भारी अस्थिरता देखी गई है। इस जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों ने अपनी निर्भरता पारंपरिक ईंधनों से हटाकर पूर्ण विद्युतीकरण (टोटल इलेक्ट्रिफिकेशन) की ओर कर दी है। इसी बीच, बाज़ार के समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं। कभी अमेरिकी सोलर मार्केट की सिरमौर रही 'सनपावर' कंपनी ने दिवालियापन (बैंकरप्सी) की अर्ज़ी दाख़िल कर दी है। पवन ऊर्जा (विंड पावर) की बढ़ती मांग और बेहतर रिटर्न के कारण सोलर सेक्टर में निवेशकों का रुझान कम हुआ है, जिससे यह नौबत आई।
ग़ौरतलब है कि अमेरिकी नीतियों में भी बड़ा बदलाव आ रहा है। प्रस्तावित 2026 के संघीय बजट में क्लीन एनर्जी और पर्यावरण से जुड़ी कई अहम परियोजनाओं की फ़ंडिंग में भारी कटौती का प्रावधान किया गया है। दूसरी ओर, खाड़ी देश सऊदी अरब ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए एसीडब्ल्यूए और एंजी कंसोर्टियम को 1.16 बिलियन डॉलर के चार बड़े बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बीईएसएस) प्रोजेक्ट सौंपे हैं।
| भू-राजनीति व बाज़ार | प्रामाणिक तथ्य |
|---|---|
| सनपावर (SunPower) | दिवालियापन दाख़िल; सोलर के मुक़ाबले विंड पावर की मांग में इज़ाफ़ा। |
| बैटरी स्टोरेज निवेश | सऊदी अरब में $1.16 बिलियन के BESS प्रोजेक्ट्स। |
| विद्युतीकरण (Electrification) | कॉरपोरेट जगत युद्ध और अस्थिरता के कारण पूरी तरह से इलेक्ट्रिक ग्रिड पर निर्भर हो रहा है। |
वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत का पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर और डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। उत्तराखंड सरकार ने हाल ही में अडानी पावर से 1,320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली की 25 साल की दीर्घकालिक ख़रीद को मंज़ूरी दी है। इसके साथ ही, अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस (एईएसएल) ने 4.5 गीगावाट रिन्यूएबल पावर के ट्रांसमिशन के लिए 'सतारा ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट' का अहम टेंडर हासिल किया है। यह प्रोजेक्ट कर्नाटक से महाराष्ट्र तक हरित ऊर्जा की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित करेगा।
हरित क्रांति की इस दौड़ में अवाडा ग्रुप ने भी बड़ा दांव खेला है। ग्रुप ने हरियाणा के हिसार में 300 एकड़ का भव्य ग्रीन इंडस्ट्रियल कैंपस विकसित करने के लिए 100 अरब रुपये के निवेश का ऐतिहासिक एमओयू साइन किया है। वहीं, टीएंडडी (ट्रांसमिशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन) सेक्टर की दिग्गज कंपनी 'स्किपर लिमिटेड' ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में 13.05 अरब रुपये के नए ऑर्डर अपने नाम कर लिए हैं। यह साफ़ तौर पर ज़ाहिर करता है कि भारत का ऊर्जा बाज़ार अब केवल आत्मनिर्भरता की ओर नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व की ओर क़दम बढ़ा रहा है।
| भू-राजनीति व बाज़ार | प्रामाणिक तथ्य |
|---|---|
| सनपावर (SunPower) | दिवालियापन दाख़िल; सोलर के मुक़ाबले विंड पावर की मांग में इज़ाफ़ा। |
| बैटरी स्टोरेज निवेश | सऊदी अरब में $1.16 बिलियन के BESS प्रोजेक्ट्स। |
| विद्युतीकरण (Electrification) | कॉरपोरेट जगत युद्ध और अस्थिरता के कारण पूरी तरह से इलेक्ट्रिक ग्रिड पर निर्भर हो रहा है। |
Updated on:
30 Aug 2026 04:00 pm
Published on:
30 Aug 2026 04:00 pm
