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Bandar OTT Release: ‘मर्द को भी दर्द होता है’, जब अनुराग कश्यप और बॉबी देओल ने छुआ पुरुषों के उत्पीड़न का अनकहा सच

बॉबी देओल और अनुराग कश्यप की फिल्म 'बंदर' #MeTooForMen मुद्दे को लेकर चर्चा में है। जानें कब और किस ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होगी यह विवादित फिल्म।
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भारत

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Chitra Badoliya

Aug 21, 2026

Bander

बॉबी का नया रूप (AI)

सिनेमा हमेशा से समाज का आईना रहा है, लेकिन कभी-कभी यह आईना उन कोनों की तरफ घूम जाता है जहां रोशनी डालने से अक्सर बचा जाता है। निर्देशक अनुराग कश्यप और अभिनेता बॉबी देओल का आगामी प्रोजेक्ट ‘बंदर’ (Bandar) इसी दिशा में एक ऐसा कदम माना जा रहा है, जिसने रिलीज से पहले ही सोशल मीडिया और बौद्धिक मंचों पर तीखी बहस छेड़ दी है। फिल्म का केंद्रीय विषय #MeTooForMen यानी पुरुषों के खिलाफ होने वाले मानसिक, शारीरिक और कानूनी शोषण के इर्द-गिर्द बुना गया है।

OTT रिलीज: 28 अगस्त को ZEE5 पर प्रीमियर

फिल्म ‘बंदर’ के डिजिटल प्रीमियर को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ हो चुकी है।

प्लेटफॉर्म: ZEE5

रिलीज डेट: 28 अगस्त

स्टार कास्ट: बॉबी देओल (मुख्य भूमिका), सान्या मल्होत्रा, सपना पब्बी और सबा आजाद

निर्देशक: अनुराग कश्यप

जी5 (Zee5) के आधिकारिक बयान के अनुसार, फिल्म 28 अगस्त से प्लेटफॉर्म पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध होगी।

नया नैरेटिव: #MeToo से लेकर #MeTooForMen तक का सफर

साल 2018 में जब भारत में #MeToo आंदोलन की लहर आई थी, तब इसने सत्ता, पद और प्रभाव के दुरुपयोग की कई परतों को खोला था। महिलाओं को अपनी आपबीती साझा करने का मंच मिला और इसे बड़े पैमाने पर सामाजिक समर्थन हासिल हुआ।

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में एक दूसरा पहलू भी सामने आया है जेंडर-न्यूट्रल जस्टिस (Gender-Neutral Justice)। समाज के एक बड़े तबके का मानना है कि शोषण का कोई एक जेंडर नहीं होता। अनुराग कश्यप की फिल्म ‘बंदर’ इसी संवेदनशील बिंदु को छूती है:

  • सहानुभूति का असंतुलन: समाज में आज भी यह धारणा मजबूत है कि पुरुष केवल उत्पीड़क हो सकता है, पीड़ित नहीं। फिल्म इसी सामाजिक रूढ़िवादिता को चुनौती देती है।
  • कानून और समाज का दोहरा रवैया: जब कोई पुरुष मानसिक उत्पीड़न या झूठे आरोपों का शिकार होता है, तो उसके पास अपनी बात साबित करने और सहानुभूति पाने के विकल्प बेहद सीमित होते हैं।
  • सिनेमाई साहस: अनुराग कश्यप की पहचान डार्क, रॉ और अनफिल्टर्ड विषयों को उठाने की रही है। वहीं, बॉबी देओल अपने करियर के उस मोड़ पर हैं जहां वे ग्रे और जटिल किरदारों को सहजता से निभा रहे हैं।

फिल्म के केंद्र में क्या है?

‘बंदर’ की कहानी एक ऐसे व्यक्ति के संघर्ष को दर्शाती है जो एक बंद कमरे के विवाद और उसके बाद सोशल मीडिया व कानूनी शिकंजे में फंस जाता है। यह कहानी सिर्फ किसी एक घटना की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जहां 'धारणा' (Perception) तथ्यों से ज्यादा तेजी से फैसले सुना देती है।

फिल्म में मुख्य रूप से तीन पहलू देखने को मिलेंगे:

  • सोशल मीडिया ट्रायल्स: अदालत के फैसले से पहले ही डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर किसी व्यक्ति का चरित्र हनन कैसे हो जाता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य का संकट: पुरुष अक्सर अपनी कमजोरी या आघात को खुलकर जाहिर नहीं कर पाते। इसे 'टॉक्सिक मस्कुलिनिटी' का दूसरा पहलू भी कहा जा सकता है, जहां चुप रहना मजबूरी बन जाता है।
  • सच्चाई बनाम नैरेटिव: जब न्याय पाने की लड़ाई सिर्फ सबूतों की न रहकर पीआर (PR) और नैरेटिव वॉर बन जाए।

डिजिटल युग में क्यों जरूरी है यह बहस?

डिजिटल मीडिया के इस दौर में हर मुद्दा तुरंत ब्लैक-एंड-व्हाइट कर दिया जाता है। या तो कोई पूरी तरह सही होता है या पूरी तरह गलत। ‘बंदर’ उस ‘ग्रे जोन’ में कदम रखती है जिसे छूने से मेनस्ट्रीम सिनेमा कतराता रहा है।

दर्शकों और आलोचकों की प्रतिक्रिया का संभावित रुख

इस तरह के प्रोजेक्ट्स के साथ सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि कहीं इसे वास्तविक महिला अधिकारों और #MeToo जैसे ऐतिहासिक आंदोलनों को कमजोर करने के प्रयास के रूप में न देख लिया जाए। मेकर्स के लिए संतुलन साधना सबसे कठिन काम होगा।

यदि फिल्म केवल सनसनीखेज बनने के बजाय निष्पक्षता और मानवीय संवेदना के साथ पुरुष उत्पीड़न के वास्तविक मामलों को सामने लाती है, तो यह भारतीय सिनेमा में जेंडर डिस्कोर्स को एक नई दिशा दे सकती है।

बॉबी देओल और अनुराग कश्यप की ‘बंदर’ सिर्फ एक सस्पेंस ड्रामा नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के उस अनकहे सच से सामना कराने की कोशिश है जिस पर अमूमन चुप्पी साध ली जाती है। ओटीटी पर इसकी रिलीज के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय दर्शक इस जटिल और संवेदनशील विषय को किस रूप में स्वीकार करते हैं।