
सांकेतिक इमेज (सोर्स- gemini)
चीनी की मात्रा पहचानने के लिए पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के पैकेट पर जल्द ही 'लाल-पीला-हरा' निशान देखने को मिल सकता। यह निशान खाद्य पदार्थ में मौजूद चीनी की मात्रा बताएंगे। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण संबंधी संसद की स्थायी समिति ने चीनी का स्तर आसान तरीके से बताने वाली फ्रंट-ऑफ-पैक (पैकेट के सामने की तरफ) लेबलिंग की सिफारिश की है।
DMK सांसद कनिमोझी करुणानिधि की अध्यक्षता वाली इस समिति ने 'शिशु उत्पादों व अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की मात्रा के विशेष संदर्भ में पैकेज्ड कमोडिटी विनियमन' शीर्षक से यह रिपोर्ट 23 जुलाई 2026 को संसद में पेश की। समिति ने कहा है कि आगे चलकर इसके लिए लाल-पीला-हरा जैसे कलर इंडिकेटर वाली व्यवस्था अपनाई जा सकती है। जिससे उपभोक्ता आसानी से कम, मध्यम और ज्यादा चीनी वाले उत्पाद की पहचान कर सकें। हालांकि, समिति ने फिलहाल किसी खास रंग-कोड को अंतिम रूप नहीं दिया है। अभी यह सिर्फ सिफारिश है, नए नियम अभी लागू नहीं हुए हैं।
=खाद्य पदार्थों पर लेबलिंग व्यवस्था का मकसद उपभोक्ता को खरीदारी के वक्त ही उत्पाद की पोषण गुणवत्ता के बारे में जानकारी देना है, लेकिन इसके नियम 4 साल से अटके हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने 13 सितंबर 2022 को फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग के ड्राफ्ट नियम अधिसूचित किए थे। इन पर 14 हजार से ज्यादा टिप्पणियां और सुझाव मिले, लेकिन दो साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद ये अब तक जांच और व्यापक परामर्श के दायरे में ही हैं। इन सुझावों को भी तक अंतिम रूप नहीं मिला है। समिति ने इस देरी पर निराशा जताते हुए कहा कि सरल व्याख्यात्मक उपकरणों, जैसे- चेतावनी लेबल या रंग-कोडेड इंडिकेटर, के अभाव में मौजूदा खुलासे उपभोक्ता के व्यवहार को प्रभावी ढंग से निर्देशित नहीं कर पा रहे।
फिलहाल, पैकेट के पीछे पोषण संबंधी तालिका में चीनी की मात्रा ग्राम और अनुशंसित दैनिक भत्ते के प्रतिशत के रूप में दी जाती है। समिति का मानना है कि तकनीकी रूप से सही होने के बावजूद, खरीदारी के दौरान त्वरित निर्णय के वक्त हर उपभोक्ता इन आंकड़ों को आसानी से नहीं समझ पाता। समिति ने यह भी सिफारिश की है कि सभी पैकेज्ड खाद्य श्रेणियों में बिना किसी छूट के एकसमान रूप से चीनी खुलासा और व्याख्यात्मक लेबलिंग मानदंड लागू किए जाएं। इसके साथ ही 'नो एडेड शुगर' व 'नेचुरल स्वीटनर' जैसे दावों की वैज्ञानिक जांच व प्रमाणन व्यवस्था को भी मजबूत किया जाए।
समिति ने शिशुओं के दूध के फॉर्मूला में इस्तेमाल होने वाली चीनी से जुड़े नियमों की समय-समय पर समीक्षा की जरूरत भी बताई है। मौजूदा नियमों के तहत 0-6 महीने के बच्चों के फॉर्मूला में सुक्रोज या फ्रक्टोज तभी मिलाया जा सकता है। जब इसकी जरूरत कार्बोहाइड्रेट के स्रोत के रूप में हो और इसकी मात्रा फॉर्मूला में मौजूद कुल कार्बोहाइड्रेट के 20 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकती है।
यह सीमा वैश्विक स्तर पर भी (जैसे- UK व यूरोपीय संघ के शिशु फॉर्मूला नियमों में) मान्य मानक के करीब है। यह सीमा करीब 13.25 ग्राम या 53 कैलोरी के बराबर बैठती है, जो 0-6 महीने के शिशु की करीब 530 कैलोरी की कुल दैनिक ऊर्जा जरूरत का लगभग 10 प्रतिशत है। साथ ही, समिति ने फॉर्मूला और शिशु आहार के लिए विशेष रूप से ग्राम प्रति सर्विंग और दैनिक ऊर्जा में योगदान के प्रतिशत के साथ अनिवार्य फ्रंट-लेबल घोषणा की सिफारिश की है, ताकि अभिभावक सूचित फैसला ले सकें।
तेजी से बढ़ती ऑनलाइन खाद्य बिक्री को देखते हुए समिति ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले उत्पादों की लेबलिंग पर निगरानी मजबूत करने की जरूरत बताई है। गलत लेबलिंग वाले उत्पादों की पहचान कर उन्हें ऑनलाइन लिस्टिंग से रियल टाइम में हटाने और मिसलीडिंग दावों पर ग्रेडेड दंड की व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया गया है।
समिति ने माना कि ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य लेबल को समझना उपभोक्ताओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों, पंचायतों और मातृत्व केंद्रों के जरिए पोषण लेबल समझाने के लिए विशेष जागरूकता अभियान चलाने की सिफारिश की गई है।
यह सिर्फ संसदीय समिति की सिफारिश तक सीमित मामला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर FSSAI को निर्देश दे चुका है। संसद की अधीनस्थ विधान समिति के अध्यक्ष व सांसद मिलिंद देवड़ा ने बताया था कि शीर्ष अदालत ने FSSAI को पैकेटबंद खाद्य पर सरल फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबल लागू करने का निर्देश दिया है। इस सिलसिले में उन्होंने सिंगापुर की ए-से-डी तक की 'न्यूट्री-ग्रेड' व्यवस्था का अध्ययन करने का सुझाव भी दिया था। इससे पहले मार्च 2026 में FSSAI ने अदालत को बताया था कि ज्यादा वसा, चीनी व नमक वाले खाद्य पदार्थों के लिए लेबल फॉर्मेट पर अंतिम निर्णय से पहले और परामर्श व वैज्ञानिक समीक्षा की जरूरत है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद की गाइडलाइंस के मुताबिक चीनी का सेवन प्रतिदिन 25 ग्राम तक सीमित रखना बेहतर है। समिति ने इसे भी उपभोक्ताओं तक सरल तरीके से पहुंचाने की सिफारिश की है। वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वयस्कों और बच्चों दोनों को अपने दैनिक कुल ऊर्जा (कैलोरी) उपयोग का 10 प्रतिशत से कम हिस्सा फ्री शुगर से लेना चाहिए। इसे घटाकर 5 प्रतिशत तक लाने पर स्वास्थ्य को और ज्यादा लाभ मिलते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बचपन में ज्यादा चीनी का सेवन आगे चलकर दांतों की सड़न, मोटापा, मेटाबॉलिक गड़बड़ियों, टाइप-2 डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर का जोखिम बढ़ाता है। यही वजह है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत के बीच सरल व स्पष्ट लेबलिंग को सार्वजनिक स्वास्थ्य के नजरिए से अहम माना जा रहा है। समिति ने FSSAI से कहा है कि लंबित FOPNL नियमों को तय समयसीमा के भीतर अंतिम रूप दिया जाए। अब देखना यह होगा कि नियामक इस सिफारिश पर कितनी तेजी से अमल करता है, क्योंकि उपभोक्ता संगठन और स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से इस बदलाव की मांग करते रहे हैं।
Updated on:
28 Aug 2026 06:36 pm
Published on:
28 Aug 2026 06:36 pm
