
विदेशी निवेश की ताकत: मजबूत होती भारतीय अर्थव्यवस्था और दुनिया भर में बढ़ता भारत का मान। (फोटो: AI )
भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम पिछले कुछ वर्षों में तेजी से विकसित हुआ है। विदेशी निवेश ने इस विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विदेशी निवेशकों से मिलने वाली पूंजी के साथ स्टार्टअप्स को अंतरराष्ट्रीय बाजारों, कारोबारी नेटवर्क, तकनीकी विशेषज्ञता और प्रबंधन के अनुभव तक पहुंच मिल सकती है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि भारत में आने वाला कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) केवल स्टार्टअप्स में नहीं जाता। इसमें विनिर्माण, सेवा, वित्तीय क्षेत्र, तकनीक और अन्य क्षेत्रों में होने वाला निवेश भी शामिल होता है। इसलिए कुल FDI के आंकड़ों को सीधे स्टार्टअप निवेश के रूप में देखना सही नहीं होगा।
मार्च 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश से जुड़े FDI नियमों में बदलाव को मंजूरी दी। संशोधित व्यवस्था के तहत कुछ शर्तों के साथ गैर-नियंत्रक लाभकारी स्वामित्व 10 प्रतिशत तक होने पर ऑटोमैटिक रूट की अनुमति दी गई है।
इसके अलावा, कुछ निर्दिष्ट विनिर्माण क्षेत्रों से जुड़े निवेश प्रस्तावों के निपटारे के लिए 60 दिन की समय-सीमा तय की गई है। यह समय-सीमा सभी विदेशी निवेश प्रस्तावों पर लागू नहीं होती।
इस बदलाव का उद्देश्य निवेश प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और आसान बनाना तथा भारत में वैश्विक पूंजी और तकनीकी सहयोग के अवसर बढ़ाना है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 20 अगस्त 2026 तक संशोधित व्यवस्था के तहत 29 निवेश प्रस्ताव सामने आए थे, जिनमें करीब ₹4,895.65 करोड़ के प्रस्तावित FDI की जानकारी दी गई थी।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में सकल FDI प्रवाह करीब 94.5 अरब डॉलर रहा। यह आंकड़ा पिछले वित्त वर्ष की तुलना में बढ़ा है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह भारत में आने वाला कुल सकल FDI है, न कि केवल स्टार्टअप्स में आया विदेशी निवेश।
वहीं, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का नेट FDI करीब 6.9 अरब डॉलर रहा। इसलिए सकल FDI और नेट FDI को एक ही आंकड़ा मानना सही नहीं है।
सकल FDI में भारत में आने वाला कुल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश शामिल होता है, जबकि नेट FDI में भारत से बाहर जाने वाले प्रत्यक्ष निवेश और अन्य संबंधित प्रवाहों को समायोजित किया जाता है। इसलिए दोनों आंकड़े अलग-अलग होते हैं।
विदेशी निवेश का फायदा केवल कंपनी के बैंक खाते में आने वाली पूंजी तक सीमित नहीं रहता। सही रणनीतिक निवेशक स्टार्टअप को कारोबार बढ़ाने के दूसरे रास्ते भी उपलब्ध करा सकता है।
स्टार्टअप के शुरुआती दौर में उत्पाद विकसित करने, कर्मचारियों की भर्ती, तकनीक तैयार करने, मार्केटिंग और नए बाजारों में विस्तार के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत होती है। विदेशी निवेश इस जरूरत को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
बड़ी पूंजी मिलने से कंपनी अपने कारोबार को तेजी से बढ़ाने और लंबी अवधि की योजनाओं पर काम करने की स्थिति में आ सकती है।
विदेशी निवेशकों के पास अपने देशों और दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कारोबारी संपर्क हो सकते हैं। ऐसे निवेशकों के नेटवर्क का इस्तेमाल करके भारतीय स्टार्टअप नए ग्राहकों, साझेदारों और बाजारों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकते हैं।
इससे भारतीय कंपनियों के लिए भारत के बाहर कारोबार विस्तार के अवसर बढ़ सकते हैं।
कई विदेशी निवेशक केवल पैसा लगाने तक सीमित नहीं रहते। वे तकनीक, उत्पाद विकास, डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा और अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञता तथा कारोबारी अनुभव भी उपलब्ध करा सकते हैं।
खासकर डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए तकनीकी सहयोग महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि ऐसे कारोबार में उत्पाद विकसित करने और बाजार तक पहुंचने में अधिक समय और पूंजी की जरूरत पड़ती है।
अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के पास अलग-अलग देशों में कारोबार चलाने का अनुभव होता है। इससे भारतीय स्टार्टअप्स को कॉरपोरेट गवर्नेंस, वित्तीय योजना, जोखिम प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय बाजार की रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है।
किसी स्थापित विदेशी निवेशक का समर्थन स्टार्टअप की विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद कर सकता है। इसके बाद कंपनी को दूसरे निवेशकों, ग्राहकों और कारोबारी साझेदारों तक पहुंच बनाने में भी सुविधा हो सकती है।
विदेशी निवेश के अलावा सरकार की नीतियां भी भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं।
DPIIT से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स को पात्रता के आधार पर विभिन्न सरकारी सुविधाएं मिल सकती हैं। इनमें कुछ कर संबंधी लाभ, बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़ी सुविधाएं और सरकारी सहायता कार्यक्रम शामिल हैं।
हालांकि, इन सुविधाओं का लाभ सभी स्टार्टअप्स को स्वतः नहीं मिलता। इसके लिए संबंधित योजना की पात्रता और निर्धारित शर्तों को पूरा करना जरूरी होता है।
सरकार ने Research, Development and Innovation (RDI) Fund के लिए कुल ₹1 लाख करोड़ की व्यवस्था की है। वित्त वर्ष 2025-26 में इसके लिए ₹20,000 करोड़ का प्रारंभिक आवंटन किया गया था।
इस फंड का व्यापक उद्देश्य निजी क्षेत्र में अनुसंधान, विकास और नवाचार को बढ़ावा देना है। इसका फायदा डीप-टेक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी और अन्य उन्नत तकनीक पर काम करने वाली कंपनियों को मिल सकता है। इसे सीधे तौर पर केवल स्टार्टअप्स के लिए बनाया गया फंड कहना सही नहीं होगा।
भारत की नवाचार क्षमता में भी पिछले वर्षों में सुधार हुआ है। Global Innovation Index 2025 में भारत 139 अर्थव्यवस्थाओं में 38वें स्थान पर रहा। 2024 में भारत 39वें स्थान पर था।
लंबी अवधि में भारत की रैंकिंग में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इससे देश के अनुसंधान, तकनीक और नवाचार से जुड़े इकोसिस्टम में हुए विकास का संकेत मिलता है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय टेक स्टार्टअप्स ने करीब 11.7 अरब डॉलर की फंडिंग जुटाई। इस दौरान करीब 1,632 फंडिंग राउंड हुए और भारत दुनिया का चौथा सबसे अधिक फंड प्राप्त करने वाला स्टार्टअप इकोसिस्टम रहा।
यहां भी आंकड़े सही संदर्भ में देखना जरूरी है। FY25 में भारतीय टेक स्टार्टअप्स ने करीब 14.3 अरब डॉलर जुटाए थे। यानी FY26 की फंडिंग पिछले वित्त वर्ष की तुलना में करीब 18 प्रतिशत कम रही।
इसलिए इसे केवल 'फंडिंग में तेजी' कहना सही नहीं होगा। हालांकि, वैश्विक स्तर पर भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम मजबूत स्थिति में बना हुआ है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में 6 नए यूनिकॉर्न बने, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह संख्या 4 थी। इस तरह नए यूनिकॉर्न की संख्या में करीब 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
इसी अवधि में टेक्नोलॉजी क्षेत्र में 47 IPO हुए, जबकि पिछले वित्त वर्ष में इनकी संख्या 31 थी। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय तकनीकी कंपनियों के लिए सार्वजनिक बाजार तक पहुंच का महत्व भी बढ़ रहा है।
विदेशी निवेश का प्रभाव स्टार्टअप्स तक सीमित नहीं रहता। जब किसी कंपनी में निवेश बढ़ता है तो उसके कारोबार के विस्तार के साथ रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। तकनीकी कंपनियों के विस्तार से नए उत्पाद और सेवाएं विकसित हो सकती हैं।
विदेशी निवेशकों के साथ साझेदारी से भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों, तकनीक और कारोबारी प्रक्रियाओं की जानकारी मिल सकती है। इससे घरेलू कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता मजबूत हो सकती है।
हालांकि, विदेशी पूंजी पर अत्यधिक निर्भरता से बचना भी जरूरी है। स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए घरेलू निवेश, बैंकिंग व्यवस्था और भारतीय पूंजी बाजार को मजबूत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
नीति में और सुधार: निवेश प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाने से विदेशी निवेश के अवसर बढ़ सकते हैं।
डीप-टेक पर जोर: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, जैव-प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर और अन्य उन्नत तकनीकों में लंबी अवधि के निवेश की जरूरत है।
टियर-2 और टियर-3 शहर: स्टार्टअप निवेश को बड़े शहरों तक सीमित रखने के बजाय छोटे शहरों और उभरते कारोबारी केंद्रों तक पहुंचाना जरूरी है।
वैश्विक साझेदारी: विदेशी निवेशकों के साथ पूंजी के अलावा तकनीक, बाजार और विशेषज्ञता से जुड़े सहयोग पर भी ध्यान देना होगा।
घरेलू पूंजी का संतुलन: विदेशी निवेश के साथ घरेलू निवेश के स्रोतों को मजबूत करना जरूरी है, ताकि स्टार्टअप इकोसिस्टम ज्यादा टिकाऊ बन सके।
विदेशी निवेश भारतीय स्टार्टअप्स के लिए पूंजी जुटाने का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन इसका फायदा केवल वित्तीय निवेश तक सीमित नहीं है। सही रणनीतिक साझेदार के साथ स्टार्टअप्स को वैश्विक बाजार, तकनीकी विशेषज्ञता, कारोबारी नेटवर्क और प्रबंधन अनुभव तक पहुंच मिल सकती है।
हालांकि, भारत में आने वाला कुल FDI सीधे स्टार्टअप्स में नहीं जाता और स्टार्टअप फंडिंग के आंकड़ों में भी उतार-चढ़ाव बना रहता है। इसलिए विदेशी निवेश को अवसर के साथ-साथ व्यापक स्टार्टअप इकोसिस्टम के एक हिस्से के रूप में देखना ज्यादा सही होगा। भारत के लिए चुनौती अब केवल विदेशी पूंजी आकर्षित करने की नहीं, बल्कि ऐसी पूंजी को नवाचार, रोजगार, तकनीकी विकास और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंपनियां बनाने में बदलने की है।
Updated on:
26 Aug 2026 02:33 pm
Published on:
26 Aug 2026 02:33 pm
