
Government Scheme Budget : देश में कितनी योजनाओं का लाभार्थी नहीं ले रहे लाभ।
हर साल केंद्र और राज्य सरकारें किसानों, छात्रों, महिलाओं, मजदूरों, मछुआरों और समाज के अन्य वर्गों के लिए सैकड़ों योजनाएं चलाती हैं। इन योजनाओं के लिए लाखों करोड़ रुपये का बजट भी तय किया जाता है। लेकिन क्या बजट में रखा गया हर रुपया वास्तव में लाभार्थियों तक पहुंच पाता है? जवाब है नहीं।
भारत में ऐसी कई योजनाएं और परियोजनाएं हैं जिनमें धन तो आवंटित कर दिया जाता है, लेकिन उसका पूरा उपयोग नहीं हो पाता। कई बार पैसा महीनों या वर्षों तक सरकारी खातों में पड़ा रहता है। इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि लाभार्थी नहीं थे, बल्कि अक्सर योजना के क्रियान्वयन में देरी, प्रशासनिक बाधाएं और राज्यों की तैयारी की कमी इसके पीछे जिम्मेदार होती हैं।
हां। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टें लगातार यह दिखाती रही हैं कि कई योजनाओं में आवंटित राशि पूरी तरह खर्च नहीं हो पाती।
हिमाचल प्रदेश की 2023-24 की राज्य वित्त ऑडिट रिपोर्ट (Report No. 1 of 2025) इसका एक उदाहरण है। रिपोर्ट के अनुसार कई विभागों में बजट प्रावधान होने के बावजूद खर्च अपेक्षा से काफी कम रहा।
हिमाचल प्रदेश CAG रिपोर्ट की प्रमुख बातें
| मुद्दा | स्थिति |
|---|---|
| अनावश्यक सप्लीमेंट्री बजट | 2023-24 में ₹711 करोड़ के अतिरिक्त बजटीय प्रावधान बाद में अनावश्यक साबित हुए, क्योंकि संबंधित मदों में मूल बजट तक खर्च नहीं हो पाया। |
| SNA खातों में अनखर्ची राशि | केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत प्राप्त धन में से ₹1,024.08 करोड़ Single Nodal Agency (SNA) खातों में अनखर्चे पड़े रहे। |
| लंबित यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट (UC) | 31 मार्च 2024 तक ₹2,795.23 करोड़ के खर्च से जुड़े 2,990 यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट लंबित थे। |
| बिना बजटीय प्रावधान खर्च | वन एवं वन्यजीव, उद्योग एवं खनिज, सूचना प्रौद्योगिकी तथा नगर नियोजन विभागों में ₹94.36 करोड़ बिना बजटीय प्रावधान के खर्च किए गए। |
रिपोर्ट में यह भी संकेत मिलता है कि कई योजनाओं और अनुदानों में लगातार बचत (Savings) दर्ज की गई, यानी बजट आवंटित होने के बावजूद धन का उपयोग नहीं हो सका।
हालांकि यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि हर मामले में लाभार्थी मौजूद नहीं थे। कई बार लाभार्थी होते हैं, लेकिन पैसा उन तक पहुंचाने की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पाती।
सरकारी योजनाओं में धन खर्च न होने के पीछे कई व्यावहारिक कारण होते हैं।
प्रमुख कारण
यानी कई बार पैसा उपलब्ध होता है, लेकिन व्यवस्था उसे जमीन पर उतारने में सफल नहीं हो पाती।
यह समस्या केवल राज्यों तक सीमित नहीं है। कई केंद्रीय योजनाओं में भी बजट और वास्तविक खर्च के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
PM Matsya Sampada Yojana (PMMSY)
2024-25 में इस योजना के लिए ₹2,352 करोड़ का बजट रखा गया था, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 56 प्रतिशत अधिक था। हालांकि वर्ष समाप्त होने पर वास्तविक खर्च ₹977.28 करोड़ दर्ज हुआ। इसका मतलब है कि पूरे बजट का लगभग 41.6 प्रतिशत ही खर्च हो सका। यह दिखाता है कि बजट बढ़ाना और उसका प्रभावी उपयोग करना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं।
अन्य योजनाएं जहां धीमी प्रगति की चर्चा होती रही
इन योजनाओं में खर्च की गति समय, राज्य और परियोजना की स्थिति के अनुसार बदलती रहती है।
केंद्र सरकार अब अधिकांश केंद्र प्रायोजित योजनाओं का पैसा राज्यों की Single Nodal Agency (SNA) व्यवस्था के माध्यम से भेजती है। लेकिन कई बार यह राशि राज्यों के खातों में ही पड़ी रह जाती है।
दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत राज्यों के SNA खातों में लगभग ₹43,636 करोड़ की राशि अनखर्ची पड़ी हुई थी। इसके अलावा करीब ₹25,000 करोड़ की अतिरिक्त राशि राज्यों को स्थानांतरित होना बाकी थी।
| योजना | अनखर्ची राशि (₹ करोड़) |
|---|---|
| समग्र शिक्षा | 6,730 |
| सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 | 6,352 |
| जल जीवन मिशन | 5,371 |
| कुल | 18,453 |
दिलचस्प बात यह है कि इन योजनाओं का महत्व कम नहीं हुआ। इसके उलट, अगले बजट में इनके लिए आवंटन और बढ़ाया गया।
केंद्र सरकार ने SNA-SPARSH नामक नई निगरानी व्यवस्था लागू की है।
नवंबर 2025 से इसे सभी केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए अनिवार्य बनाया गया है।
नहीं। कई योजनाएं ऐसी हैं जिनमें आवंटित राशि का अधिकांश हिस्सा नियमित रूप से खर्च होता है। PM POSHAN इसका उदाहरण है। पूर्व में मिड-डे मील कहलाने वाली यह योजना देशभर के लगभग 11.20 लाख सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में संचालित होती है। इस योजना से करीब 11.8 करोड़ बच्चों को लाभ मिलता है। इसका कारण यह है कि:
यानी जिन योजनाओं का ढांचा मजबूत और लाभार्थी स्पष्ट होते हैं, उनमें धन के उपयोग की दर भी बेहतर रहती है।
कुछ राज्य योजनाओं को तेजी से लागू करते हैं, जबकि कुछ राज्यों में प्रशासनिक और प्रक्रियागत बाधाएं अधिक होती हैं।
इसी वजह से एक ही योजना अलग-अलग राज्यों में अलग परिणाम देती है।
आम तौर पर लोग मानते हैं कि सरकारी पैसा बच जाना अच्छी बात है। लेकिन योजनाओं के संदर्भ में यह हमेशा सही नहीं होता। अगर किसी योजना का पैसा खर्च नहीं हुआ तो इसका मतलब हो सकता है कि:
इसी कारण CAG और संसदीय समितियां बार-बार कम खर्च और अनखर्ची राशि पर चिंता जताती हैं।
Updated on:
17 Aug 2026 10:05 am
Published on:
17 Aug 2026 10:05 am
