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भारत में कितनी सरकारी योजनाएं ऐसी हैं जिनका बजट है लेकिन लाभार्थी नहीं? पैसा आवंटित होने के बाद भी खर्च नहीं?

Government Schemes Budget Underutilization : भारत में सरकारी योजनाओं के लिए बजट आवंटित होने के बावजूद पूरी राशि खर्च क्यों नहीं हो पाती? जानिए प्रशासनिक देरी, CAG रिपोर्ट के आंकड़े और फंड का समय पर उपयोग न होने के मुख्य कारण।
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Government Scheme Budget

Government Scheme Budget : देश में कितनी योजनाओं का लाभार्थी नहीं ले रहे लाभ।

हर साल केंद्र और राज्य सरकारें किसानों, छात्रों, महिलाओं, मजदूरों, मछुआरों और समाज के अन्य वर्गों के लिए सैकड़ों योजनाएं चलाती हैं। इन योजनाओं के लिए लाखों करोड़ रुपये का बजट भी तय किया जाता है। लेकिन क्या बजट में रखा गया हर रुपया वास्तव में लाभार्थियों तक पहुंच पाता है? जवाब है नहीं।

भारत में ऐसी कई योजनाएं और परियोजनाएं हैं जिनमें धन तो आवंटित कर दिया जाता है, लेकिन उसका पूरा उपयोग नहीं हो पाता। कई बार पैसा महीनों या वर्षों तक सरकारी खातों में पड़ा रहता है। इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि लाभार्थी नहीं थे, बल्कि अक्सर योजना के क्रियान्वयन में देरी, प्रशासनिक बाधाएं और राज्यों की तैयारी की कमी इसके पीछे जिम्मेदार होती हैं।

क्या सच में ऐसी योजनाएं हैं जिनमें पैसा रखा गया लेकिन खर्च नहीं हुआ?

हां। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टें लगातार यह दिखाती रही हैं कि कई योजनाओं में आवंटित राशि पूरी तरह खर्च नहीं हो पाती।

हिमाचल प्रदेश की 2023-24 की राज्य वित्त ऑडिट रिपोर्ट (Report No. 1 of 2025) इसका एक उदाहरण है। रिपोर्ट के अनुसार कई विभागों में बजट प्रावधान होने के बावजूद खर्च अपेक्षा से काफी कम रहा।

हिमाचल प्रदेश CAG रिपोर्ट की प्रमुख बातें

मुद्दास्थिति
अनावश्यक सप्लीमेंट्री बजट2023-24 में ₹711 करोड़ के अतिरिक्त बजटीय प्रावधान बाद में अनावश्यक साबित हुए, क्योंकि संबंधित मदों में मूल बजट तक खर्च नहीं हो पाया।
SNA खातों में अनखर्ची राशिकेंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत प्राप्त धन में से ₹1,024.08 करोड़ Single Nodal Agency (SNA) खातों में अनखर्चे पड़े रहे।
लंबित यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट (UC)31 मार्च 2024 तक ₹2,795.23 करोड़ के खर्च से जुड़े 2,990 यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट लंबित थे।
बिना बजटीय प्रावधान खर्चवन एवं वन्यजीव, उद्योग एवं खनिज, सूचना प्रौद्योगिकी तथा नगर नियोजन विभागों में ₹94.36 करोड़ बिना बजटीय प्रावधान के खर्च किए गए।

रिपोर्ट में यह भी संकेत मिलता है कि कई योजनाओं और अनुदानों में लगातार बचत (Savings) दर्ज की गई, यानी बजट आवंटित होने के बावजूद धन का उपयोग नहीं हो सका।

हालांकि यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि हर मामले में लाभार्थी मौजूद नहीं थे। कई बार लाभार्थी होते हैं, लेकिन पैसा उन तक पहुंचाने की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पाती।

पैसा खर्च क्यों नहीं हो पाता?

सरकारी योजनाओं में धन खर्च न होने के पीछे कई व्यावहारिक कारण होते हैं।

प्रमुख कारण

  • योजना के दिशा-निर्देश देर से जारी होना
  • राज्यों द्वारा समय पर प्रस्ताव न भेजना
  • प्रशासनिक मंजूरी में देरी
  • भूमि अधिग्रहण या पर्यावरणीय अनुमति की समस्या
  • टेंडर प्रक्रिया लंबी होना
  • लाभार्थियों की पहचान में कठिनाई
  • राज्यों की हिस्सेदारी समय पर न मिलना
  • परियोजनाओं का निर्धारित समय पर शुरू न होना
  • उपयोग प्रमाणपत्र (Utilisation Certificate) लंबित रहना

यानी कई बार पैसा उपलब्ध होता है, लेकिन व्यवस्था उसे जमीन पर उतारने में सफल नहीं हो पाती।

केंद्रीय योजनाओं में भी दिखती है यह समस्या

यह समस्या केवल राज्यों तक सीमित नहीं है। कई केंद्रीय योजनाओं में भी बजट और वास्तविक खर्च के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।

PM Matsya Sampada Yojana (PMMSY)

2024-25 में इस योजना के लिए ₹2,352 करोड़ का बजट रखा गया था, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 56 प्रतिशत अधिक था। हालांकि वर्ष समाप्त होने पर वास्तविक खर्च ₹977.28 करोड़ दर्ज हुआ। इसका मतलब है कि पूरे बजट का लगभग 41.6 प्रतिशत ही खर्च हो सका। यह दिखाता है कि बजट बढ़ाना और उसका प्रभावी उपयोग करना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं।

अन्य योजनाएं जहां धीमी प्रगति की चर्चा होती रही

  • PM-USHA
  • PM SHRI
  • STARS परियोजना
  • विभिन्न अवसंरचना आधारित योजनाएं

इन योजनाओं में खर्च की गति समय, राज्य और परियोजना की स्थिति के अनुसार बदलती रहती है।

राज्यों के खातों में कितना पैसा पड़ा रहता है?

केंद्र सरकार अब अधिकांश केंद्र प्रायोजित योजनाओं का पैसा राज्यों की Single Nodal Agency (SNA) व्यवस्था के माध्यम से भेजती है। लेकिन कई बार यह राशि राज्यों के खातों में ही पड़ी रह जाती है।

दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत राज्यों के SNA खातों में लगभग ₹43,636 करोड़ की राशि अनखर्ची पड़ी हुई थी। इसके अलावा करीब ₹25,000 करोड़ की अतिरिक्त राशि राज्यों को स्थानांतरित होना बाकी थी।

योजनाअनखर्ची राशि (₹ करोड़)
समग्र शिक्षा6,730
सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.06,352
जल जीवन मिशन5,371
कुल18,453

दिलचस्प बात यह है कि इन योजनाओं का महत्व कम नहीं हुआ। इसके उलट, अगले बजट में इनके लिए आवंटन और बढ़ाया गया।

सरकार इस समस्या को कम करने के लिए क्या कर रही है?

केंद्र सरकार ने SNA-SPARSH नामक नई निगरानी व्यवस्था लागू की है।

  • फंड के प्रवाह की रियल-टाइम निगरानी
  • राज्यों में पड़े धन का बेहतर ट्रैकिंग
  • समय पर उपयोग सुनिश्चित करना
  • अनखर्ची राशि कम करना
  • जवाबदेही बढ़ाना

नवंबर 2025 से इसे सभी केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए अनिवार्य बनाया गया है।

क्या सभी योजनाओं में यही समस्या है?

नहीं। कई योजनाएं ऐसी हैं जिनमें आवंटित राशि का अधिकांश हिस्सा नियमित रूप से खर्च होता है। PM POSHAN इसका उदाहरण है। पूर्व में मिड-डे मील कहलाने वाली यह योजना देशभर के लगभग 11.20 लाख सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में संचालित होती है। इस योजना से करीब 11.8 करोड़ बच्चों को लाभ मिलता है। इसका कारण यह है कि:

  • लाभार्थी पहले से चिन्हित हैं
  • वितरण तंत्र स्थापित है
  • राज्यों का अनुभव लंबा है
  • खर्च की प्रक्रिया नियमित है

यानी जिन योजनाओं का ढांचा मजबूत और लाभार्थी स्पष्ट होते हैं, उनमें धन के उपयोग की दर भी बेहतर रहती है।

राज्यों के प्रदर्शन में अंतर क्यों है?

कुछ राज्य योजनाओं को तेजी से लागू करते हैं, जबकि कुछ राज्यों में प्रशासनिक और प्रक्रियागत बाधाएं अधिक होती हैं।

  • बेहतर प्रदर्शन वाले राज्यों की विशेषताएं
  • समय पर परियोजना स्वीकृति
  • डिजिटल मॉनिटरिंग
  • लाभार्थियों का स्पष्ट डेटाबेस
  • राज्यों की हिस्सेदारी का समय पर भुगतान
  • मजबूत स्थानीय प्रशासन
  • कमजोर प्रदर्शन के कारण
  • भूमि और अनुमतियों की समस्या
  • प्रशासनिक देरी
  • कर्मचारियों की कमी
  • तकनीकी क्षमता का अभाव
  • लाभार्थियों की पहचान में कठिनाई

इसी वजह से एक ही योजना अलग-अलग राज्यों में अलग परिणाम देती है।

सबसे बड़ा सवाल: पैसा बचना अच्छी बात है या बुरी?

आम तौर पर लोग मानते हैं कि सरकारी पैसा बच जाना अच्छी बात है। लेकिन योजनाओं के संदर्भ में यह हमेशा सही नहीं होता। अगर किसी योजना का पैसा खर्च नहीं हुआ तो इसका मतलब हो सकता है कि:

  • लाभार्थियों को समय पर सहायता नहीं मिली
  • सड़क, स्कूल या अस्पताल जैसी परियोजनाएं अधूरी रह गईं
  • विकास कार्यों में देरी हुई
  • योजना का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका

इसी कारण CAG और संसदीय समितियां बार-बार कम खर्च और अनखर्ची राशि पर चिंता जताती हैं।