17 अगस्त 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

कैंसर से बचना है तो बैठने की आदत भी बदलें… जानिए लंबी और लगातार सीटिंग से कितनी हाई रिस्क?

Cancer Risk and prolonged sitting: 2026 की नई रिसर्च का बड़ा इशारा, आधे घंटे से ज्यादा लगातार बैठे रहने की आदत पर देना होगा ध्यान, छोटी-सी हलचल भी हो सकती है अहम
4 min read
Google source verification

भारत

image

Sanjana Kumar

Aug 17, 2026

Cancer risk and prolonged sitting

Cancer risk and prolonged sitting: लगातार लंबे समय तक बैठने की आदत है तो हो जाएं सावधान, कैंसर का रिस्क बढ़ाती है ये आदत (photo: AI Creative)

Cancer Risk and prolonged sitting:सुबह काम पर बैठना, फिर बैठक, दोपहर का खाना, वापस कुर्सी, शाम को घर आकर सोफे पर मोबाइल और रात में टीवी। दिन खत्म होने तक कई लोगों को लगता है कि उन्होंने कोई मेहनत ही नहीं की, लेकिन असल में शरीर ने घंटों एक ही स्थिति में बिताए होते हैं। अब सवाल यह है कि क्या सिर्फ दिन में कुछ मिनट टहल लेना इस लंबे समय तक बैठे रहने की भरपाई कर देता है?

2026 में सामने आई एक बड़ी शोध ने कैंसर के संदर्भ में इसी सवाल पर ध्यान खींचा है। अध्ययन में पाया गया कि कुल कितनी देर बैठे रहे, इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण हो सकता है कि बैठने का समय लगातार कितने लंबे हिस्सों में बंटा हुआ है।

30 मिनट वाली बात क्यों महत्वपूर्ण है?

स्कॉटलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो के शोधकर्ताओं ने यूके बायोबैंक के 91,292 लोगों के आंकड़ों का अध्ययन किया। इन लोगों की शारीरिक गतिविधि को पहनने वाले गतिविधि मापक उपकरणों से रिकॉर्ड किया गया और उनका औसतन 12 साल से अधिक समय तक अनुसरण किया गया।

शोधकर्ताओं ने खास तौर पर यह देखा कि लोग कितनी देर तक बिना उठे बैठे या लेटे रहते हैं। नतीजा दिलचस्प था। हर दिन लगातार लंबे समय तक बैठे रहने का अधिक समय कैंसर से मृत्यु के अधिक जोखिम से जुड़ा मिला। लंबे समय तक बैठे रहने में रोजाना एक अतिरिक्त घंटा जुड़ने पर कैंसर से मृत्यु का जोखिम लगभग 10 प्रतिशत अधिक पाया गया। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात सिर्फ जोखिम बढ़ना नहीं है। शोध ने यह भी देखा कि अगर बैठे रहने के लंबे हिस्से की जगह हल्की शारीरिक गतिविधि की जाए, तो जोखिम कम हो सकता है।

जिम जाना जरूरी नहीं, शरीर को बीच-बीच में जगाना भी जरूरी

मान लीजिए कोई व्यक्ति आठ-दस घंटे कार्यालय में काम करता है। उसके लिए रोज एक घंटे जिम जाना संभव नहीं है। क्या इसका मतलब है कि वह कुछ नहीं कर सकता? इस शोध का संकेत इससे अलग है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, रोजाना बैठे रहने के एक घंटे की जगह हल्की शारीरिक गतिविधि लेने पर कैंसर से मृत्यु के जोखिम में लगभग 12 प्रतिशत कम जोखिम जुड़ा पाया गया। इसमें तेज दौड़ जरूरी नहीं थी।

धीरे चलना या घर के सामान्य काम जैसी गतिविधियां भी इसमें शामिल थीं। यानी काम के बीच कुछ मिनट चलना, पानी लेने के लिए उठना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना, घर में छोटे-मोटे काम करना, ये गतिविधियां भी उस लंबे समय तक बैठे रहने को तोड़ सकती हैं।

यह बात खासतौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो सोचते हैं कि 'मैं शाम को आधा घंटा व्यायाम कर लेता हूं, इसलिए दिनभर बैठे रहना कोई समस्या नहीं।' नई रिसर्च इसी सोच पर एक नया सवाल खड़ा करती है।

पांच मिनट की तेज गतिविधि भी चर्चा में क्यों आई?

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने अलग-अलग स्तर की गतिविधियों की तुलना भी की। उनके विश्लेषण में रोजाना पांच मिनट की निष्क्रियता को पांच मिनट की जोरदार गतिविधि से बदलने पर कैंसर से मृत्यु के जोखिम में लगभग 22 प्रतिशत कम जोखिम जुड़ा पाया गया।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति को रोज पांच मिनट जोरदार व्यायाम करके कैंसर से बचने की गारंटी मिल जाएगी। यह एक पर्यवेक्षणात्मक अध्ययन था, इसलिए इससे कारण और परिणाम का सीधा प्रमाण नहीं मिलता।

शोधकर्ताओं ने भी आगे नैदानिक परीक्षणों की जरूरत बताई है। फिर भी इसकी खासियत यह है कि इसने कैंसर के जोखिम को देखने का एक अलग तरीका सामने रखा है, सिर्फ व्यायाम की मात्रा नहीं, निष्क्रियता का पैटर्न भी बताया गया है।

शरीर में ऐसा क्यों हो सकता है?

वैज्ञानिक अभी इस अध्ययन से कोई निश्चित जैविक कारण घोषित नहीं कर रहे हैं। लेकिन लंबे समय तक निष्क्रिय रहने का संबंध शरीर के कई दूसरे स्वास्थ्य कारकों से पहले से देखा गया है। शारीरिक निष्क्रियता मोटापे और चयापचय संबंधी गड़बड़ियों से जुड़ी हो सकती है।

दूसरी ओर, अधिक वजन और लगातार बनी रहने वाली सूजन कुछ कैंसर के जोखिम से संबंधित हैं। राष्ट्रीय कैंसर संस्थान भी मोटापा और दीर्घकालिक सूजन को कैंसर के ज्ञात या संभावित जोखिम कारकों में शामिल करता है।

इसलिए संभव है कि लंबे समय तक बैठे रहने का असर केवल मांसपेशियों तक सीमित न हो, बल्कि शरीर के चयापचय और दूसरे जैविक तंत्रों से भी जुड़ा हो। लेकिन इस संबंध को समझने के लिए और शोध की जरूरत है।

कैंसर की पूरी तस्वीर इससे कहीं बड़ी है

यहां एक बात बिल्कुल साफ समझना जरूरी है कि, कैंसर का कारण केवल बैठना नहीं है। तंबाकू, शराब, अधिक वजन, शारीरिक निष्क्रियता, कुछ संक्रमण, वायु प्रदूषण, पराबैंगनी विकिरण और कई अन्य कारक कैंसर के जोखिम को प्रभावित करते हैं।

फरवरी 2026 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) के वैश्विक विश्लेषण में अनुमान लगाया गया कि 2022 में दुनिया में हुए लगभग 37 प्रतिशत नए कैंसर मामले यानी करीब 71 लाख मामले ऐसे कारणों से जुड़े थे जिन्हें रोका जा सकता है। तंबाकू सबसे बड़ा रोकथाम योग्य कारण रहा।

इसका मतलब यह नहीं कि हर कैंसर रोका जा सकता है। उम्र, आनुवंशिकता और कई अन्य कारण भी भूमिका निभाते हैं। लेकिन रोजमर्रा की कुछ आदतों को बदलना जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

ये लक्षण दिखें तो हो जाएं अलर्ट

  • बिना वजह वजन कम होना
  • लगातार रहने वाली थकान या कमजोरी
  • शरीर में कहीं नई गांठ या सूजन
  • ऐसा घाव जो ठीक नहीं हो रहा हो
  • लगातार रहने वाली खांसी या आवाज में बदलाव
  • लंबे समय तक पेट की गड़बड़ी, निगलने में परेशानी या पेट दर्द
  • मल या पेशाब में खून आना
  • बिना स्पष्ट कारण के तेज बुखार या रात में पसीना
  • त्वचा या आंखों का पीला पड़ना
  • बिना कारण असामान्य रक्तस्राव या आसानी से चोट लगना

हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह आम लक्षण हैं, लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि आपमें ये लक्षण दिखें तो कैंसर ही होगा, हां लेकिन वह आगाह करते हैं कि कई बार इनके पीछे के कारण सामान्य स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं, लेकिन लक्षण अगर लगातार बने रहें तो जांच में देरी बिल्कुल नहीं करनी चाहिए

तो आम आदमी को आज से क्या बदलने की जरूरत?

इस रिसर्च का सबसे व्यावहारिक संदेश शायद यही है कि व्यायाम को सिर्फ एक घंटे की गतिविधि मत समझिए। अगर आपका काम बैठकर होता है तो लगातार बैठे रहने के लंबे दौर को बीच-बीच में तोड़ना एक आसान आदत हो सकती है।

काम के दौरान उठकर कुछ देर चलना, फोन पर बात करते समय खड़े होना, पानी लेने खुद जाना, घर के काम करना या थोड़ी दूरी के लिए पैदल जाना। इन छोटी गतिविधियों को दिनचर्या का हिस्सा बनाया जा सकता है।