
सांकेतिक इमेज (सोर्स-Chatgpt)
आज के दिन यानी 2 सितंबर 2026 को भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि पर देशभर में माताओं ने हलषष्ठी व्रत का आयोजन किया। यह पर्व भगवान बलराम से जुड़ा हुआ है और इसे संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाता है। आइए जानते हैं हलषष्ठी व्रत का महत्व और इसके मनाने की शुरूआत कहां से हुई?
हलषष्ठी व्रत एक पावन अवसर है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों के मंगलमय जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। इस दिन विशेष रूप से महिलाएं हलषष्ठी की कथा सुनती हैं, जिसमें मां के एक झूठ से बच्चे पर आए संकट और पश्चाताप के बाद हुए चमत्कार का वर्णन है। यह कथा माताओं को प्रेरित करती है कि वे अपने बच्चों के लिए सच्चाई और भलाई की कामना करें।
इस व्रत के दौरान माताएं विशेष ध्यान रखती हैं। पूजा के समय हल से जोते अन्न का सेवन वर्जित होता है। इसके बजाय, भैंस के दूध और दही का उपयोग किया जाता है। महिलाएं अपने घरों में कुश परास और महुआ के पत्ते के साथ पूजा करती हैं। पूजा विधि में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी की पूजा का विशेष महत्व है।
आज देश के अलग-अलग स्थानों पर महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा की। घाटों, तालाबों और घरों में एकत्र होकर माताओं ने संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए प्रार्थना की। इस अवसर पर महिलाएं एक-दूसरे के साथ मिलकर पूजा करती हैं और अपने बच्चों के लिए आशीर्वाद मांगती हैं।
हलषष्ठी व्रत भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि माताओं की संतान के प्रति असीम प्रेम और चिंता को भी उजागर करता है। इस दिन माताएं अपने बच्चों के लिए विशेष पकवान बनाती हैं और उन्हें प्रेमपूर्वक खिलाती हैं।
Updated on:
02 Sept 2026 03:37 pm
Published on:
02 Sept 2026 03:37 pm
