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समाज को आईना दिखाने वाले कालजयी व्यंग्य शिल्पकार हरिशंकर परसाई: आलोचकों की नज़र में कैसे हैं जानिए

Harishankar Parsai:हरिशंकर परसाई ने अपने व्यंग्य से समाज, राजनीति और पाखंड पर करारा प्रहार किया। उनकी लेखनी आज भी हिंदी साहित्य की सबसे प्रभावशाली आवाज़ों में गिनी जाती है।
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भारत

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MI Zahir

Aug 25, 2026

Hindi Satirist Harishankar Parsai

शब्दों के बाण से समाज को दर्पण दिखाने वाले हिंदी के मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई। ( फोटो: AI.)

हिंदी साहित्य में हरिशंकर परसाई का नाम उस व्यंग्यकार के रूप में दर्ज है, जिसने हंसी के माध्यम से समाज की गंभीर सच्चाइयों को सामने रखा। उन्होंने राजनीति, सामाजिक पाखंड, भ्रष्टाचार, नौकरशाही, धार्मिक रूढ़ियों, अवसरवाद और मध्यवर्गीय मानसिकता पर ऐसी तीखी चोट की कि उनका व्यंग्य केवल हास्य तक सीमित नहीं रहा। उनकी रचनाएं पाठक को पहले मुस्कुराती हैं और फिर अपने आसपास की व्यवस्था पर सवाल करने के लिए मजबूर करती हैं।

उन्होंने व्यंग्य को मनोरंजन की हल्की विधा नहीं माना

परसाई की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने व्यंग्य को मनोरंजन की हल्की विधा नहीं माना। उनके लिए व्यंग्य सामाजिक विसंगतियों को पहचानने, उन पर सवाल उठाने और पाठक में आलोचनात्मक चेतना पैदा करने का माध्यम था। यही वजह है कि साहित्य आलोचकों की दृष्टि में उनका महत्व हिंदी के प्रमुख व्यंग्यकार के साथ-साथ एक गंभीर सामाजिक चिंतक के रूप में भी है।

व्यंग्य को नई धार देने वाले साहित्यकार

हिंदी में परसाई से पहले भी व्यंग्य की परंपरा मौजूद थी, लेकिन उन्होंने इसे व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों से जोड़ा। उनके लेखन में हास्य है, मगर उसका उद्देश्य केवल हँसाना नहीं है।

वे ऐसी स्थितियाँ सामने रखते हैं जिनमें पाठक को व्यवस्था का विरोधाभास दिखाई देता है। उनकी रचनाओं में भ्रष्टाचार, दिखावटी नैतिकता, अंधविश्वास, धार्मिक पाखंड, राजनीतिक अवसरवाद और नौकरशाही पर लगातार प्रहार मिलता है।

उनका व्यंग्य इसलिए प्रभावी बनता है क्योंकि वे समस्या की केवल ऊपरी तस्वीर नहीं दिखाते। वे उसके पीछे काम कर रही मानसिकता को भी पकड़ते हैं।

आलोचकों की नज़र में परसाई की सबसे बड़ी उपलब्धि

आलोचनात्मक दृष्टि से परसाई की सबसे बड़ी उपलब्धि यह मानी जाती है कि उन्होंने व्यंग्य को गंभीर साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित किया।

उनकी रचनाओं में तर्कशीलता और सामाजिक प्रतिबद्धता दिखाई देती है। वे अंधविश्वास और रूढ़ियों को स्वीकार करने के बजाय सवाल करते हैं। उनके व्यंग्य में व्यवस्था के प्रति असहमति है, लेकिन यह असहमति केवल विरोध के लिए नहीं है। उसके पीछे बेहतर समाज की इच्छा दिखाई देती है।

यही कारण है कि परसाई को केवल हास्य लेखक के रूप में देखना उनके साहित्य को सीमित करना होगा। उनका व्यंग्य सामाजिक आलोचना का प्रभावशाली रूप है।

बड़े साहित्यकारों, आलोचकों और व्यंग्यकारों की नज़र में हरिशंकर परसाई

क्रमसाहित्यकार/आलोचकपरसाई पर दृष्टि(स्रोत संदर्भ:)
1नामवर सिंहपरसाई को अपने समय के प्रतिरोध और सामाजिक विसंगतियों के बड़े रचनाकार के रूप में देखा। उनके लेखन में राजनीति, साहित्य और सामान्य आचरण की विकृतियों का प्रभावी चित्रण मिलता है।‘व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य’, संपा. प्रेम जनमेजय, पृ. 275
2रामविलास शर्मापरसाई की सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि को महत्वपूर्ण माना गया। उनके लेखन को प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी परंपरा से जोड़कर देखा गया।‘निबंधकार हरिशंकर परसाई : एक परिचय’, MANUU
3ज्ञानरंजनपरसाई को स्वतंत्र भारत और मध्यवर्ग का सशक्त दर्पण माना। उनके लेखन में जीवन की तीखी आलोचना और जोखिम उठाने वाली रचनात्मकता दिखाई देती है।‘आजकल’, अगस्त 2023, प्रकाशन विभाग
4कमला प्रसादपरसाई को आम आदमी का लेखक माना। उनके व्यक्तित्व और साहित्य में वैज्ञानिक दृष्टि तथा व्यापक सामाजिक सरोकारों को रेखांकित किया।‘हरिशंकर परसाई : आम आदमी का लेखक’, संस्मरण
5शरद जोशीपरसाई उनके समकालीन और प्रभावशाली व्यंग्यकार थे। दोनों के बीच गहरा साहित्यिक संबंध रहा और शरद जोशी ने आरंभिक दौर में उन्हें अपना गुरु माना।कमला प्रसाद का संस्मरण/साक्षात्कार
6ज्ञान चतुर्वेदीपरसाई और शरद जोशी को हिंदी व्यंग्य की समृद्ध परंपरा के प्रमुख रचनाकार माना। परसाई के लेखन को अपनी रचनात्मक प्रेरणा से भी जोड़ा।‘आजकल’, दिसंबर 2023, प्रकाशन विभाग
7विश्वनाथ उपाध्यायपरसाई के व्यंग्य की धार को तीखा और प्रभावशाली माना। उनकी व्यंग्य-दृष्टि सामाजिक विसंगतियों और जनविरोधी प्रवृत्तियों पर सीधा प्रहार करती है।‘व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य’, संपा. प्रेम जनमेजय, पृ. 275
8प्रेम जनमेजयपरसाई के साहित्य को समकालीन हिंदी व्यंग्य की समझ के लिए महत्वपूर्ण माना। उनके संपादन में परसाई और व्यंग्य पर महत्वपूर्ण आलोचनात्मक सामग्री सामने आई।‘व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य’, संपा. प्रेम जनमेजय
9रवींद्रनाथ त्यागीपरसाई को आधुनिक हिंदी व्यंग्य की प्रमुख परंपरा के केंद्रीय रचनाकारों में माना जाता है। उनके लेखन ने व्यंग्य को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान किया।‘आजकल’, दिसंबर 2023, प्रकाशन विभाग
10श्रीलाल शुक्लपरसाई हिंदी व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर थे। उनकी रचनात्मक परंपरा ने सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों को साहित्य का महत्वपूर्ण विषय बनाया।हिंदी व्यंग्य पर अकादमिक संदर्भ, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय

‘भोलाराम का जीव’ और व्यवस्था पर कटाक्ष

परसाई की चर्चित व्यंग्य-कथा ‘भोलाराम का जीव’ सरकारी तंत्र और नौकरशाही की विसंगतियों पर करारा प्रहार करती है। इसमें एक साधारण व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी सरकारी व्यवस्था से उसका संबंध समाप्त नहीं होता। रचना का व्यंग्य इस बात को उजागर करता है कि कागजी प्रक्रिया और लालफीताशाही किस तरह मनुष्य की वास्तविक जरूरतों पर भारी पड़ सकती है।

यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘भोलाराम का जीव’ हरिशंकर परसाई की रचना है, प्रेमचंद की नहीं।

परसाई की रचनात्मक शक्ति यही है कि वे किसी जटिल व्यवस्था की आलोचना को भी ऐसी कथा में बदल देते हैं, जिसे सामान्य पाठक आसानी से समझ सकता है।

‘सदाचार का तावीज़’ में दिखावे की नैतिकता

‘सदाचार का तावीज़’ में परसाई ने नैतिकता के नाम पर होने वाले दिखावे और सामाजिक भ्रष्टाचार के बीच के विरोधाभास को उजागर किया। वे सवाल उठाते हैं कि केवल भाषणों, उपदेशों और नैतिक नारों से समाज में ईमानदारी नहीं लाई जा सकती।

उनका व्यंग्य व्यवस्था के साथ-साथ उस मानसिकता को भी निशाने पर लेता है जो भ्रष्टाचार की आलोचना तो करती है, लेकिन सुविधा मिलने पर उससे समझौता भी कर लेती है।

भाषा सरल, प्रहार गहरा

परसाई की भाषा उनकी लोकप्रियता का बड़ा कारण है। उन्होंने जटिल और भारी-भरकम शब्दों के बजाय बोलचाल की सहज हिंदी को अपनाया। उनका लेखन सीधे पाठक से संवाद करता है।

लेकिन भाषा की सरलता उनके विचारों की सरलता नहीं है। छोटे वाक्य, सामान्य घटनाएँ और रोजमर्रा के उदाहरण उनके हाथ में सामाजिक आलोचना के मजबूत औजार बन जाते हैं।

यही उनकी शैली की खासियत है-भाषा सहज, विचार गंभीर और प्रहार तीखा।

व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति निशाने पर

परसाई के व्यंग्य का लक्ष्य किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से अपमानित करना नहीं था। वे उस प्रवृत्ति पर चोट करते थे, जो समाज या व्यवस्था को कमजोर बनाती है।

राजनीतिक अवसरवाद, धार्मिक पाखंड, अंधविश्वास, सत्ता का दुरुपयोग और मध्यवर्गीय दोहरापन उनके प्रमुख विषय रहे। इसलिए उनकी रचनाएँ किसी एक व्यक्ति या घटना तक सीमित नहीं रहतीं।

वे अपने समय की घटना से व्यापक सामाजिक अर्थ निकालते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ दशकों बाद भी पढ़ने पर नई लगती हैं।

मध्यवर्ग की मानसिकता पर पैनी नजर

परसाई ने भारतीय मध्यवर्ग के विरोधाभासों को भी बेहद बारीकी से पकड़ा। आदर्शों की बातें करना, लेकिन व्यवहार में सुविधा के अनुसार उनसे समझौता करना उनकी रचनाओं में बार-बार दिखाई देता है।

उनका व्यंग्य आम आदमी को भी कटघरे में खड़ा करता है। वे केवल सत्ता या प्रशासन की आलोचना नहीं करते, बल्कि यह भी पूछते हैं कि समाज स्वयं उन प्रवृत्तियों को बढ़ावा क्यों देता है जिनकी वह शिकायत करता है।

इस आत्मालोचन ने उनके व्यंग्य को अधिक प्रभावशाली बनाया।

हास्य के पीछे छिपी करुणा

परसाई के व्यंग्य में हँसी के साथ करुणा भी है। वे समाज की कमजोरियों पर कटाक्ष करते हैं, लेकिन उनके केंद्र में आम मनुष्य की चिंता रहती है।

उनका आक्रोश उस व्यवस्था के खिलाफ है जो व्यक्ति को कमजोर और असहाय बनाती है। इसलिए उनके व्यंग्य में केवल उपहास नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना भी दिखाई देती है।

यही तत्व उन्हें कई अन्य व्यंग्यकारों से अलग करता है।

हरिशंकर परसाई की प्रमुख रचनाएं

हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य, निबंध, कहानी, संस्मरण और अन्य साहित्यिक विधाओं में लेखन किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘भोलाराम का जीव’, ‘सदाचार का तावीज़’, ‘प्रेमचंद के फटे जूते’, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’, ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’, ‘तब की बात और थी’, ‘बेईमानी की परत’ और ‘टार्च बेचने वाले’ जैसी रचनाएं शामिल हैं। इन रचनाओं में समाज, राजनीति और मानवीय व्यवहार के अलग-अलग रूपों को व्यंग्य के माध्यम से सामने रखा गया है।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित

हरिशंकर परसाई को उनकी कृति ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के लिए 1982 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। यह सम्मान हिंदी व्यंग्य को साहित्य की गंभीर और प्रभावशाली विधा के रूप में स्थापित करने में उनके योगदान की महत्वपूर्ण स्वीकृति माना जाता है।

जन्म, शिक्षा और स्वतंत्र लेखन

हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ था। उनका जीवन संघर्षों के बीच बीता। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए किया और कुछ समय अध्यापन किया। बाद में उन्होंने स्वतंत्र लेखन को अपना मुख्य कर्म बनाया।

उन्होंने जबलपुर से साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ का संपादन और प्रकाशन भी किया। यह पत्रिका साहित्य और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखन के लिए महत्वपूर्ण मंच बनी। परसाई का जीवन इस बात का उदाहरण है कि साहित्यकार अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों से अलग रहकर प्रभावशाली लेखन नहीं कर सकता।

आज भी क्यों प्रासंगिक हैं परसाई?

परसाई के समय और आज के समय में तकनीक, राजनीति और सामाजिक जीवन में बड़ा बदलाव आया है, लेकिन मनुष्य और व्यवस्था की कई कमजोरियाँ अब भी मौजूद हैं। भ्रष्टाचार, अवसरवाद, दिखावा, अंधविश्वास और सत्ता के प्रति अंधसमर्थन जैसे सवाल आज भी सार्वजनिक जीवन में दिखाई देते हैं।

यही वजह है कि परसाई की रचनाएँ आज भी पाठकों को अपने समय को समझने का नजरिया देती हैं। उनके व्यंग्य को पढ़ते हुए पाठक केवल अतीत नहीं देखता, बल्कि वर्तमान की तस्वीर भी पहचान लेता है।

हरिशंकर परसाई : आलोचनात्मक मूल्यांकन

आलोचकों की दृष्टि से हरिशंकर परसाई की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ उनकी तर्कशील दृष्टि, सामाजिक प्रतिबद्धता, सहज भाषा, गहरा यथार्थबोध और तीखा व्यंग्य-बोध हैं।

उन्होंने साहित्य को समाज से जोड़ा और व्यंग्य को गंभीर विचार-विमर्श का माध्यम बनाया। उनका लेखन सत्ता से सवाल करता है, सामाजिक पाखंड को उजागर करता है और आम आदमी की कमजोरियों को भी सामने लाता है।
10 अगस्त 1995 को परसाई का निधन हुआ, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी जीवित हैं। उनकी साहित्यिक विरासत यह बताती है कि सच्चा व्यंग्य केवल हँसाता नहीं, बल्कि समाज को भीतर तक झकझोरता है।

अपने दौर की विसंगतियों पर लिखा, दृष्टि किसी एक दौर में कैद नहीं रही

बहरहाल,हरिशंकर परसाई की प्रासंगिकता इसी में है कि उन्होंने अपने दौर की विसंगतियों पर लिखा, लेकिन उनकी दृष्टि किसी एक दौर में कैद नहीं रही। उनकी कलम ने जिस मानसिकता पर प्रहार किया, वह अलग-अलग रूपों में आज भी हमारे सामने मौजूद है। इसलिए परसाई केवल हिंदी के अमर व्यंग्यकार नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली कालजयी साहित्यिक आवाज़ हैं।