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Herbal Facts : क्या हर्बल दवाओं से ठीक हो सकती हैं क्रॉनिक बीमारियां? ICMR और WHO के हिसाब से समझिए

क्या जड़ी-बूटियां सच में पुरानी बीमारियों में असरदार हैं? जानिए WHO और ICMR की रिसर्च, सही उपयोग और वो जरूरी सावधानियां जो आपकी सेहत बचा सकती हैं।
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भारत

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Chitra Badoliya

Aug 27, 2026

Herbal

क्या पुरानी बीमारियां जड़ से खत्म होंगी ?(AI)

मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गठिया और हृदय रोग जैसी क्रॉनिक (दीर्घकालिक) बीमारियों से जूझ रहे लोगों का रुझान अक्सर पारंपरिक व हर्बल चिकित्सा की ओर बढ़ता है। सामान्य धारणा यह बन चुकी है कि 'हर्बल है तो पूरी तरह सुरक्षित और प्राकृतिक होगा।' हालांकि, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और वैश्विक स्वास्थ्य संगठन इस विषय पर एक संतुलित और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह देते हैं। जड़ी-बूटियों में चिकित्सीय गुण होते हैं, लेकिन उनका सही असर वैज्ञानिक प्रमाण, सही खुराक और उचित सावधानियों पर निर्भर करता है।

वैश्विक दृष्टिकोण: WHO और पारंपरिक चिकित्सा की भूमिका

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, विकासशील देशों की लगभग 80% आबादी प्राथमिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं के लिए पारंपरिक और हर्बल उपचारों पर निर्भर है। भारत में भी एक बड़ा वर्ग नियमित स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए आयुर्वेद और घरेलू औषधियों का सहारा लेता है।

पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2025–2034: WHO ने पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं के साथ जोड़ने के लिए एक वैश्विक रणनीति बनाई है। इसका उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान को साक्ष्य-आधारित (evidence-based) बनाकर उसकी सुरक्षा, प्रभावशीलता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना है।

सपोर्टिव केयर: WHO के अनुसार, प्रमाणित हर्बल दवाएं मुख्य रूप से सहायक चिकित्सा (Adjuvant Therapy) के रूप में दर्द प्रबंधन, जीवन की गुणवत्ता में सुधार और आधुनिक दवाओं के दुष्प्रभावों को कम करने में मदद कर सकती हैं।

भारतीय शोध और ICMR की भूमिका

जड़ी-बूटियों की प्रभावकारिता को प्रमाणित करने में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और उसका नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रेडिशनल मेडिसिन (ICMR-NITM, बेलगावी) निरंतर सक्रिय हैं। शोधकर्ताओं ने 'रिवर्स फार्माकोलॉजी' और आधुनिक क्लीनिकल ट्रायल के माध्यम से कई पारंपरिक दवाओं की प्रभावशीलता साबित की है:

मधुमेह (Diabetes): 'विजयसार' (Pterocarpus marsupium) की छाल के अर्क पर किए गए परीक्षणों में रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने और इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार के प्रमाण मिले हैं।

लिवर विकार: कुटकी (Picrorhiza kurroa) से विकसित 'पिक्रोलिव' (Picroliv) को वायरल हेपेटाइटिस और लिवर सुरक्षा में प्रभावी पाया गया है।

भगंदर (Anal Fistula): 'क्षारसूत्र' तकनीक को आधुनिक शल्य चिकित्सा के मुकाबले कम पुनरावृत्ति दर और सुरक्षित उपचार के रूप में वैश्विक मान्यता मिली है।

संक्रमण और प्लेटलेट्स: डेंगू और वायरल संक्रमण के दौरान कुछ मानकीकृत हर्बल योगों ने बीमारी की अवधि घटाने और प्लेटलेट्स सुधारने में क्लीनिकल रूप से सकारात्मक परिणाम दिए हैं।

इसके अतिरिक्त, ICMR ने 75 से अधिक औषधीय पौधों की टॉक्सिसिटी (विषाक्तता), अंगों पर प्रभाव और सुरक्षित खुराक से जुड़े आंकड़े मानकीकृत किए हैं।

'प्राकृतिक' का मतलब हमेशा 'सुरक्षित' नहीं

वैज्ञानिक रूप से किसी भी जड़ी-बूटी में बायो-एक्टिव रासायनिक यौगिक होते हैं। जिस तरह वे शरीर को लाभ पहुंचा सकते हैं, उसी तरह गलत उपयोग से नुकसान भी हो सकता है।

जोखिम का प्रकारसंभावित प्रभाव
ड्रग-हर्ब इंटरैक्शनहर्बल तत्व एलोपैथिक दवाओं के असर को बदल सकते हैं (उदा. खून पतला करने वाली दवाओं के साथ गिलोय या लहसुन का अत्यधिक सेवन रक्तस्राव का जोखिम बढ़ा सकता है)।
अशुद्धता और मिलावटबिना प्रमाणन वाले उत्पादों में हेवी मेटल्स (सीसा, पारा, आर्सेनिक) या स्टेरॉयड की मिलावट लिवर और किडनी को नुकसान पहुंचा सकती है।
गलत खुराक (Dosage)अनियंत्रित मात्रा में काढ़े या चूर्ण का सेवन एसिडिटी, अल्सर या आंतों में जलन पैदा कर सकता है।
ऑर्गन टॉक्सिसिटीपहले से किडनी या लिवर की बीमारी से ग्रस्त मरीजों में कुछ जड़ी-बूटियां अंगों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं।

क्रॉनिक बीमारियों में जड़ी-बूटियों के उपयोग के लिए जरूरी सावधानियां

दीर्घकालिक बीमारियों के प्रबंधन में जड़ी-बूटियों का उपयोग करते समय इन नियमों का कड़ाई से पालन करें।

  • चिकित्सक से परामर्श: बिना डॉक्टर या पंजीकृत आयुष विशेषज्ञ की सलाह के कोई भी हर्बल सप्लीमेंट शुरू न करें। अपने एलोपैथिक डॉक्टर को सभी हर्बल दवाओं की जानकारी अवश्य दें।
  • चालू दवाएं बंद न करें: हर्बल उपचार शुरू करने का अर्थ यह कतई नहीं है कि इंसुलिन, बीपी या थायरॉइड की नियमित दवाएं रोक दी जाएं। ऐसा करने से स्थिति गंभीर हो सकती है।
  • मानकीकृत और प्रमाणित उत्पाद चुनें: केवल GMP (Good Manufacturing Practices) और आयुष मंत्रालय द्वारा प्रमाणित मानकीकृत अर्क (Standardized Extracts) का ही चयन करें। खुले या बिना लेबल वाले चूर्ण-काढ़े से बचें।
  • शारीरिक संकेतों की निगरानी: हर्बल सप्लीमेंट शुरू करने के बाद यदि त्वचा पर चकत्ते, उल्टी, पेट दर्द, पीलिया के लक्षण या अत्यधिक थकान महसूस हो, तो तुरंत उपयोग रोकें।
  • नियमित लैब टेस्ट: लंबे समय तक किसी हर्बल औषधि का सेवन करते समय लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT) और किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT) की समय-समय पर जांच कराएं।

जड़ी-बूटियां दीर्घकालिक बीमारियों के प्रबंधन में अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती हैं, बशर्ते उन्हें 'जादुई इलाज' मानने के बजाय वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित सहायक पद्धति के रूप में अपनाया जाए। सही मार्गदर्शन, मानकीकृत गुणवत्ता और नियमित निगरानी ही हर्बल चिकित्सा को प्रभावी और सुरक्षित बनाती है।