
क्या पुरानी बीमारियां जड़ से खत्म होंगी ?(AI)
मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गठिया और हृदय रोग जैसी क्रॉनिक (दीर्घकालिक) बीमारियों से जूझ रहे लोगों का रुझान अक्सर पारंपरिक व हर्बल चिकित्सा की ओर बढ़ता है। सामान्य धारणा यह बन चुकी है कि 'हर्बल है तो पूरी तरह सुरक्षित और प्राकृतिक होगा।' हालांकि, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और वैश्विक स्वास्थ्य संगठन इस विषय पर एक संतुलित और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह देते हैं। जड़ी-बूटियों में चिकित्सीय गुण होते हैं, लेकिन उनका सही असर वैज्ञानिक प्रमाण, सही खुराक और उचित सावधानियों पर निर्भर करता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, विकासशील देशों की लगभग 80% आबादी प्राथमिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं के लिए पारंपरिक और हर्बल उपचारों पर निर्भर है। भारत में भी एक बड़ा वर्ग नियमित स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए आयुर्वेद और घरेलू औषधियों का सहारा लेता है।
पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2025–2034: WHO ने पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं के साथ जोड़ने के लिए एक वैश्विक रणनीति बनाई है। इसका उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान को साक्ष्य-आधारित (evidence-based) बनाकर उसकी सुरक्षा, प्रभावशीलता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना है।
सपोर्टिव केयर: WHO के अनुसार, प्रमाणित हर्बल दवाएं मुख्य रूप से सहायक चिकित्सा (Adjuvant Therapy) के रूप में दर्द प्रबंधन, जीवन की गुणवत्ता में सुधार और आधुनिक दवाओं के दुष्प्रभावों को कम करने में मदद कर सकती हैं।
जड़ी-बूटियों की प्रभावकारिता को प्रमाणित करने में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और उसका नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रेडिशनल मेडिसिन (ICMR-NITM, बेलगावी) निरंतर सक्रिय हैं। शोधकर्ताओं ने 'रिवर्स फार्माकोलॉजी' और आधुनिक क्लीनिकल ट्रायल के माध्यम से कई पारंपरिक दवाओं की प्रभावशीलता साबित की है:
मधुमेह (Diabetes): 'विजयसार' (Pterocarpus marsupium) की छाल के अर्क पर किए गए परीक्षणों में रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने और इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार के प्रमाण मिले हैं।
लिवर विकार: कुटकी (Picrorhiza kurroa) से विकसित 'पिक्रोलिव' (Picroliv) को वायरल हेपेटाइटिस और लिवर सुरक्षा में प्रभावी पाया गया है।
भगंदर (Anal Fistula): 'क्षारसूत्र' तकनीक को आधुनिक शल्य चिकित्सा के मुकाबले कम पुनरावृत्ति दर और सुरक्षित उपचार के रूप में वैश्विक मान्यता मिली है।
संक्रमण और प्लेटलेट्स: डेंगू और वायरल संक्रमण के दौरान कुछ मानकीकृत हर्बल योगों ने बीमारी की अवधि घटाने और प्लेटलेट्स सुधारने में क्लीनिकल रूप से सकारात्मक परिणाम दिए हैं।
इसके अतिरिक्त, ICMR ने 75 से अधिक औषधीय पौधों की टॉक्सिसिटी (विषाक्तता), अंगों पर प्रभाव और सुरक्षित खुराक से जुड़े आंकड़े मानकीकृत किए हैं।
वैज्ञानिक रूप से किसी भी जड़ी-बूटी में बायो-एक्टिव रासायनिक यौगिक होते हैं। जिस तरह वे शरीर को लाभ पहुंचा सकते हैं, उसी तरह गलत उपयोग से नुकसान भी हो सकता है।
| जोखिम का प्रकार | संभावित प्रभाव |
| ड्रग-हर्ब इंटरैक्शन | हर्बल तत्व एलोपैथिक दवाओं के असर को बदल सकते हैं (उदा. खून पतला करने वाली दवाओं के साथ गिलोय या लहसुन का अत्यधिक सेवन रक्तस्राव का जोखिम बढ़ा सकता है)। |
| अशुद्धता और मिलावट | बिना प्रमाणन वाले उत्पादों में हेवी मेटल्स (सीसा, पारा, आर्सेनिक) या स्टेरॉयड की मिलावट लिवर और किडनी को नुकसान पहुंचा सकती है। |
| गलत खुराक (Dosage) | अनियंत्रित मात्रा में काढ़े या चूर्ण का सेवन एसिडिटी, अल्सर या आंतों में जलन पैदा कर सकता है। |
| ऑर्गन टॉक्सिसिटी | पहले से किडनी या लिवर की बीमारी से ग्रस्त मरीजों में कुछ जड़ी-बूटियां अंगों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं। |
दीर्घकालिक बीमारियों के प्रबंधन में जड़ी-बूटियों का उपयोग करते समय इन नियमों का कड़ाई से पालन करें।
जड़ी-बूटियां दीर्घकालिक बीमारियों के प्रबंधन में अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती हैं, बशर्ते उन्हें 'जादुई इलाज' मानने के बजाय वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित सहायक पद्धति के रूप में अपनाया जाए। सही मार्गदर्शन, मानकीकृत गुणवत्ता और नियमित निगरानी ही हर्बल चिकित्सा को प्रभावी और सुरक्षित बनाती है।
Updated on:
27 Aug 2026 06:25 pm
Published on:
27 Aug 2026 06:25 pm
