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राजस्थानी भाषा की वो 5 फ़िल्में, जिनमें दिखते हैं रिश्ते, लोक कथाएं और गांव के सपने

Rajasthani language Cinema: राजस्थानी सिनेमा की दुनिया रंग, लोकभाषा और ज़मीनी कहानियों से भरी है। बाई चाली सासरिये से लेकर बत्ती तक, 'मायड़ भासा' की इन फ़िल्मों में परिवार, लोकपरंपरा, गाँव और बदलाव के सपने अलग-अलग अंदाज़ में दिखाई देते हैं। आइए जानते हैं पाँच ऐसी फ़िल्मों के बारे में, जो राजस्थानी सिनेमा के अलग रंग दिखाती हैं।
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भारत

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MI Zahir

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एम आई ज़ाहिर

Aug 27, 2026

Rajasthani language Cinema News.

माटी की खुशबू, लोक कथाओं का रंग और बदलते दौर के सपनों को समेटे राजस्थानी सिनेमा का खूबसूरत सफर। ( फोटो: AI)

'सिनेमा में राजस्थान' कॉलम में आज हम राजस्थानी भाषा केंद्रित कुछ चुनिंदा फ़िल्मों की बात कर रहे हैं। आपको एक बात याद दिला दूं कि राजस्थानी सिनेमा की कहानी सिर्फ़ पर्दे पर चलती फ़िल्मों की नहीं, बल्कि मिट्टी की सौंधी खुशब, मधुर रिश्तों,दिल को छू लेने वाली लोक कथाओं और सपनों की भी है। इन फ़िल्मों में कहीं रिश्तों की गर्माहट है, कहीं लोककथा का रंग, तो कहीं बदलाव और उम्मीद का सपना।

कभी 'बाई चाली सासरिये' में परिवार और संस्कृति की झलक मिलती है, तो कभी 'चूंदड़ी ओढ़ासी म्हारो वीर' लोककथा के भावनात्मक संसार में ले जाती है। 'फ़ौजी की फ़ैमिली' गांव की चुनौतियां दिखाती है, बत्ती रोशनी के एक बच्चे के सपने को आवाज़ देती है और 'आटा साटा' रिश्तों पर सामाजिक दबाव की परतें खोलती है।

जी हां! इसे यूं कह सकते हैं कि ये पांच फ़िल्में मिल कर राजस्थानी 'मायड़'भाषा के सिनेमा के अलग-अलग रंगों की एक दिलचस्प और मनोरंजक तस्वीर पेश करती हैं। यानी रेगिस्तान की रेत से लेकर गांव की गलियों तक, राजस्थानी सिनेमा अपनी मिट्टी की कहानियां कहता है।

राजस्थानी सिनेमा के दो अहम नाम: भरत नाहटा और मोहन सिंह राठौड़

राजस्थानी सिनेमा की चर्चा बाई चाली सासरिये के बिना अधूरी लगती है। 1988 में आई इस फ़िल्म के निर्माता भरत नाहटा और निर्देशक मोहन सिंह राठौड़ थे। फ़िल्म ने राजस्थानी भाषा के सिनेमा को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई।

भरत नाहटा फ़िल्म निर्माण से जुड़े रहे और बाई चाली सासरिये के निर्माण से उनका नाम राजस्थानी सिनेमा के साथ प्रमुखता से जुड़ा। वहीं मोहन सिंह राठौड़ ने फ़िल्म का निर्देशन किया और राजस्थानी परिवेश, भाषा और पारिवारिक भावनाओं को पर्दे पर प्रभावी ढंग से पेश किया।

बाई चाली सासरिये -राजस्थानी सिनेमा की यादगार फ़िल्म

सन 1988 की 'बाई चाली सासरिये' राजस्थानी भाषा की चर्चित फ़िल्मों में गिनी जाती है। कहानी में परिवार, रिश्ते और स्थानीय संस्कृति का रंग दिखाई देता है। भरत नाहटा के निर्माण और मोहन सिंह राठौड़ के निर्देशन ने इसे राजस्थानी सिनेमा की यादगार फ़िल्मों में जगह दिलाई।

फ़िल्म के बारे में जानकारी
रिलीज़ वर्ष: 1988
निर्माण बैनर: सुंदर फ़िल्म्स
निर्माता: भरत नाहटा
निर्देशक: मोहन सिंह राठौड़
भाषा: राजस्थानी
पटकथा लेखक: उपलब्ध स्रोत में स्पष्ट नहीं
गीतकार: ओ. पी. व्यास
पृष्ठभूमि: पारिवारिक और सामाजिक जीवन
अवधि: लगभग 151 मिनट
श्रेणी: नाटक
मुख्य पात्र: जगदीप, ललिता पवार, नीलू वाघेला, अलंकार, उपासना सिंह

चूंदड़ी ओढ़ासी म्हारो वीर - लोककथा और रिश्तों का रंग

चूंदड़ी ओढ़ासी म्हारो वीर राजस्थानी भाषा की फ़िल्म है, लेकिन इसकी कहानी राजस्थान की लोककथा नहीं है। यह बुंदेलखंड की प्रसिद्ध लोककथा लाला हरदौल से जुड़ी कहानी को पर्दे पर पेश करती है। फ़िल्म में भाई-बहन के रिश्ते, त्याग और लोकविश्वास प्रमुख हैं।

फ़िल्म के बारे में जानकारी
रिलीज़ वर्ष: 2012
निर्माण बैनर: कैर सांगरी मनोरंजन
निर्माता: मुकेश टक, शीतल टक
निर्देशक: निशांत भारद्वाज
भाषा: राजस्थानी
पटकथा लेखक: निशांत भारद्वाज
गीतकार: पंडित निर्मल शर्मा
पृष्ठभूमि: बुंदेलखंड की लोककथा ‘लाला हरदौल’
अवधि: लगभग 140 मिनट
श्रेणी: नाटक, पारिवारिक, ऐतिहासिक
फ़िल्मांकन: मुंबई
मुख्य पात्र: दिव्यांका त्रिपाठी, देवेंद्र भगत, सचिन चौबे, दीपिका चोकसी

फ़ौजी की फ़ैमिली -गांव और सामाजिक चुनौतियों की कहानी

सन 2011 की फ़िल्म 'फ़ौजी की फ़ैमिली' ग्रामीण परिवेश की कहानी सामने लाती है। फ़िल्म गांव के जीवन, अशिक्षा और सामाजिक परिस्थितियों से पैदा होने वाली चुनौतियों को सरल अंदाज़ में दिखाती है। इसकी कहानी में ग्रामीण समाज का हास्य और संघर्ष दोनों दिखाई देते हैं।

फ़िल्म के बारे में जानकारी
रिलीज़ वर्ष: 2011
निर्माण बैनर: भुआजी फ़िल्म्स
निर्माता: डी. पी. ढाका
निर्देशक: गांधी ब्रदर्स, नरपत धराठ
भाषा: राजस्थानी
पटकथा लेखक: प्रकाश गांधी, रामदास बरवाली
गीतकार: रोटू दादा
पृष्ठभूमि: राजस्थान का ग्रामीण जीवन
अवधि: लगभग 120 मिनट
श्रेणी: हास्य-नाटक
फ़िल्मांकन: राजस्थान
मुख्य पात्र: प्रकाश गांधी, शर्मिष्ठा मकवाना, सुमन शर्मा, नंदलाल सोनी, भोमाराम सुथार

बत्ती- एक बच्चे का रोशनी का सपना

बत्ती: ए बॉय हू ड्रीम्ट ऑफ इलेक्ट्रिसिटी राजस्थानी भाषा की प्रेरक फ़िल्म है। कहानी उदयपुर के एक दूरदराज़ पहाड़ी गाँव के बच्चे भेरू के इर्द-गिर्द घूमती है। वह अपने घर में बिजली पहुँचाने का सपना देखता है और सौर ऊर्जा के ज़रिये इसे पूरा करने की कोशिश करता है।

फ़िल्म का निर्देशन जिगर नागदा ने किया है। इसे राजस्थान की नई पीढ़ी के राजस्थानी सिनेमा की उल्लेखनीय फ़िल्मों में रखा जा सकता है।

फ़िल्म के बारे में जानकारी
रिलीज़ वर्ष: 2023-24
निर्माण बैनर: उदयपुर पिक्चर्स
निर्माता: जिगर नागदा
निर्देशक: जिगर नागदा
भाषा: राजस्थानी
पटकथा लेखक: जिगर नागदा, शुभम अमेटा
गीतकार: उपलब्ध स्रोत में स्पष्ट नहीं
पृष्ठभूमि: उदयपुर का दूरदराज़ पहाड़ी गाँव
अवधि: लगभग 73-74 मिनट
श्रेणी: फ़ीचर फ़िक्शन/नाटक
फ़िल्मांकन: राजस्थान
मुख्य पात्र: कुणाल मेहता, अनिल दाधीच, राखी मंशा

आटा-साटा — रिश्तों के बीच सामाजिक दबाव

आटा साटा विवाह की उस सामाजिक परंपरा पर केंद्रित है, जिसमें दो परिवार आपस में विवाह संबंधों का आदान-प्रदान करते हैं। फ़िल्म रिश्तों, पारिवारिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाओं को कहानी का हिस्सा बनाती है।

फ़िल्म के बारे में जानकारी


रिलीज़ वर्ष: 2022
निर्माता: मनमोहन कसाना
निर्देशक: निशांत जी. भारद्वाज
भाषा: राजस्थानी
पृष्ठभूमि: पारिवारिक रिश्ते और सामाजिक परंपरा
श्रेणी: नाटक
मुख्य पात्र: श्रवण सागर, वीशा पाराशर

पांच फ़िल्में, पांच अलग रंग

फ़िल्म वर्ष कहानी का रंग
बाई चाली सासरिये 1988 परिवार और संस्कृति
फ़ौजी की फ़ैमिली 2011 गाँव और सामाजिक चुनौतियाँ
चूंदड़ी ओढ़ासी म्हारो वीर 2012 लोककथा और रिश्ते
आटा साटा 2022 विवाह और सामाजिक दबाव
बत्ती 2023-24 बिजली, सपना और बदलाव

अब आप समझे कि राजस्थान का सिनेमा क्यों ख़ास है?

अब आप समझ गए होंगे कि राजस्थानी सिनेमा की असली ताक़त उसकी भाषा, लोक संस्कृति और ज़मीनी कहानियों में है। इन फ़िल्मों में कहीं परिवार और रिश्ते हैं, कहीं लोकविश्वास, तो कहीं गाँव का संघर्ष और बेहतर भविष्य का सपना। यही विविधता राजस्थानी सिनेमा को सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि राजस्थान और उससे जुड़े समाज को समझने का एक दिलचस्प माध्यम बनाती है। आज की बात यहीं तक, और याद रखें, देखना न भूलें राजस्थानी फ़िल्में। इजाज़त चाहता हूं।