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नवजात शिशुओं में एचआईवी खत्म करने का दावा: तीन जगह इलाज से मिली बड़ी कामयाबी

Aids Treetment:ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी की रिसर्च में तीन इलाजों के संयोजन से नवजात प्राइमेट्स में शुरुआती एचआईवी संक्रमण पूरी तरह खत्म होने का संकेत मिला। हालांकि, इंसानों में इस थेरेपी की सुरक्षा और असर की पुष्टि के लिए क्लिनिकल ट्रायल अभी बाकी है।
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भारत

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MI Zahir

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एम आई जाहिर

Aug 13, 2026

Triple Attack on HIV News

नन्हे हाथों में जागरूकता की डोर, एक स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य की ओर। ( फोटो: पत्रिका)

ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम ने नवजात गैर-मानव प्राइमेट्स में एचआईवी के शुरुआती संक्रमण पर एक नई थ्री-वे थेरेपी का असर देखा है। प्रोफेसर जोनाह साचा और उनकी टीम ने एंटीरेट्रोवायरल दवाओं, ब्रॉडली न्यूट्रलाइज़िंग एंटीबॉडी और प्रयोगात्मक एंटीबॉडी लेरोनलिमैब को मिलाकर ऐसा नतीजा पाया, जिसमें वायरस का पता नहीं चला। हालांकि, इसे अभी इंसानों में एचआईवी का इलाज या पक्की ‘क्योर’ नहीं माना जा सकता।

नई रिसर्च ने उम्मीद जगाई है

हर साल दुनिया में बड़ी संख्या में बच्चे एचआईवी से संक्रमित होते हैं। अभी एचआईवी को नियंत्रित रखने के लिए आमतौर पर लंबे समय तक एंटीरेट्रोवायरल दवाओं की ज़रूरत पड़ती है। ऐसे में नई रिसर्च ने उम्मीद जगाई है कि संक्रमण के बिल्कुल शुरुआती दौर में वायरस पर एक साथ कई तरफ से हमला किया जाए तो उसे शरीर में टिकने से रोका जा सकता है।

तीन इलाज, एक साथ हमला, खुशी की लहर

रिसर्च टीम ने तीन अलग-अलग तरीकों को एक साथ इस्तेमाल किया। पहला था एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी, जो एचआईवी की संख्या बढ़ने से रोकती है। दूसरा था ब्रॉडली न्यूट्रलाइज़िंग एंटीबॉडी, जो वायरस को पहचानकर उसे बेअसर करने में मदद करती है। तीसरा था लेरोनलिमैब, एक प्रयोगात्मक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी।

वायरस के लिए नई कोशिकाओं को संक्रमित करना मुश्किल

रिसर्च के अनुसार लेरोनलिमैब का खास काम सीसीआर5 नाम के रिसेप्टर को ब्लॉक करना है। एचआईवी कई प्रतिरक्षा कोशिकाओं में दाखिल होने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल करता है। रिसेप्टर को ब्लॉक करने से वायरस के लिए नई कोशिकाओं को संक्रमित करना मुश्किल हो सकता है। दिलचस्प बात यह है कि इन तीनों तरीकों को अलग-अलग इस्तेमाल करने पर वायरस को पूरी तरह खत्म करने में सफलता नहीं मिली थी। लेकिन जब तीनों को एक साथ इस्तेमाल किया गया, तो नतीजा कहीं बेहतर रहा।

यही रणनीति संक्रमण के 1 या 2 सप्ताह बाद भी काम कर सकती है?

इस प्रयोग की सबसे अहम बात इसका समय था। नवजात गैर-मानव प्राइमेट्स को संक्रमण के 72 घंटे के भीतर संयुक्त उपचार दिया गया। रिसर्चर्स के मुताबिक, संक्रमण के शुरुआती दिनों में शरीर के भीतर वायरस और प्रतिरक्षा तंत्र के बीच बेहद तेज़ बदलाव होते हैं। संभव है कि इसी दौरान वायरस को अलग-अलग दिशाओं से घेरने का मौका सबसे प्रभावी हो। प्रोफेसर जोनाह साचा के मुताबिक, टीम यह भी जानना चाहती है कि क्या यही रणनीति संक्रमण के एक या दो सप्ताह बाद भी काम कर सकती है। अभी इसका जवाब नहीं मिला है।

कैसे काम कर सकता है यह कॉम्बिनेशन?

रिसर्च टीम ने तीनों इलाजों की भूमिका को आसान भाषा में समझाया है।

एंटी रेट्रोवायरल दवा- नल बंद करने जैसा काम: वायरस की कॉपी बनने की प्रक्रिया को दबाती है।

न्यूट्रलाइज़िंग एंटीबॉडी -सफाई जैसा काम: खून में मौजूद वायरस को पहचानने और नियंत्रित करने में मदद करती है।

लेरोनलिमैब -दरवाज़ा बंद करने जैसा काम: सीसीआर5 को ब्लॉक करके वायरस को नई प्रतिरक्षा कोशिकाओं में दाखिल होने से रोकने की कोशिश करता है।

यानी एक इलाज वायरस की बढ़त रोकता है, दूसरा बचे हुए वायरस पर प्रतिरक्षा हमला मजबूत करता है और तीसरा वायरस के लिए कोशिकाओं में प्रवेश का रास्ता बंद करता है।

रिसर्चर्स भी हैरान रह गए

ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और अध्ययन के सह-प्रमुख लेखक डॉ. जोनाह साचा ने कहा कि टीम को उम्मीद थी कि तीनों इलाज साथ मिलकर बेहतर काम करेंगे, लेकिन वायरस के पूरी तरह समाप्त होने जैसा नतीजा बेहद आश्चर्यजनक था।

इस रिसर्च में ओरेगन और कैलिफोर्निया के नेशनल प्राइमेट रिसर्च सेंटर से जुड़े वैज्ञानिकों ने मिलकर काम किया। अध्ययन में नैन्सी हैगवुड समेत कई वायरोलॉजिस्ट और इम्यूनोलॉजिस्ट भी शामिल रहे।

हैगवुड ने इस परिणाम को असाधारण बताया। उनके मुताबिक, संक्रमण के शुरुआती सप्ताह में वायरस और एंटीबॉडी के बीच होने वाली गतिविधियां पहले की सोच से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

क्या अब इंसानों में एचआईवी का इलाज संभव है?

अभी ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रयोग नवजात गैर-मानव प्राइमेट्स में किया गया है, इंसानों में नहीं। इंसानी शरीर में यही परिणाम मिलेंगे, इसकी कोई गारंटी अभी नहीं है।

एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी पहले से इंसानों में इस्तेमाल होती है। वहीं ब्रॉडली न्यूट्रलाइज़िंग एंटीबॉडी और लेरोनलिमैब का भी अलग-अलग स्तर पर क्लिनिकल रिसर्च में अध्ययन हो रहा है।

अगला बड़ा कदम इंसानों में क्लिनिकल ट्रायल होगा। शोधकर्ताओं का मानना है कि शुरुआती परीक्षणों में ऐसे वयस्कों को शामिल किया जा सकता है जिनमें हाल ही में एचआईवी संक्रमण हुआ हो। इसके बाद, सुरक्षा और प्रभावशीलता साबित होने पर नवजात शिशुओं में इस रणनीति की संभावना पर विचार किया जा सकता है।

सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी

रिसर्च की सबसे बड़ी सीमा यही है कि इलाज संक्रमण के तीन दिनों के भीतर दिया गया था। वास्तविक दुनिया में संक्रमण का सटीक समय हर मामले में पता लगाना आसान नहीं होता।

इसलिए वैज्ञानिक अब जानना चाहते हैं कि उपचार की यह ‘विंडो’ कितनी लंबी हो सकती है। क्या सात दिन बाद भी वायरस को खत्म किया जा सकता है? क्या दो सप्ताह बाद भी यही रणनीति काम करेगी?

अगर आगे के अध्ययनों में इन सवालों के जवाब सकारात्मक मिलते हैं, तो यह रणनीति एचआईवी के इलाज की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।

वायरस पर एक साथ कई तरफ से हमला करने का तरीका

फिलहाल इस रिसर्च को उम्मीद जगाने वाला शुरुआती वैज्ञानिक परिणाम कहना ज्यादा सही है, न कि इंसानों में एचआईवी का साबित इलाज। लेकिन एक बात साफ है-संक्रमण के शुरुआती दौर में वायरस पर एक साथ कई तरफ से हमला करने का तरीका वैज्ञानिकों के लिए नई दिशा खोल रहा है।