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इंसान के दिमाग की हर कोशिका में छिपी है ‘मिनी कंप्यूटर’ जैसी ताकत, नई रिसर्च का खुलासा

Human Neurons पर नई रिसर्च बताती है कि मानव कॉर्टिकल न्यूरॉन साधारण स्विच नहीं, बल्कि बेहद जटिल गणना करने वाली शक्तिशाली जैविक इकाई है। डेंड्राइटिक संरचना और एनएमडीए रिसेप्टर इसकी क्षमता बढ़ाते हैं।
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भारत

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MI Zahir

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एम आई ज़ाहिर

Aug 13, 2026

Human Brain Research News

मानव मस्तिष्क की एक-एक कोशिका जटिल गणनाएं करने में सक्षम ‘मिनी कंप्यूटर’ जैसी शक्तिशाली इकाई है। (फोटो: AI)

मानव मस्तिष्क को दुनिया की सबसे जटिल जैविक संरचनाओं में गिना जाता है। अब एक नई रिसर्च ने यह संकेत दिया है कि इसकी असाधारण क्षमता केवल न्यूरॉन्स की बड़ी संख्या या उनके बीच मौजूद कनेक्शन्स की वजह से नहीं है। मस्तिष्क की एक-एक कोशिका खुद इतनी जटिल गणना कर सकती है कि उसे एक छोटे जैविक ‘मिनी कंप्यूटर’ की तरह समझा जा सकता है। यरूशलेम के हिब्रू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की इस रिसर्च ने मानव बुद्धिमत्ता को समझने का एक नया रास्ता सामने रखा है। पढ़ें यह स्पेशल रिसर्च स्टोरी :

हयूमन कॉर्टिकल न्यूरॉन्स की तुलना चूहे के न्यूरॉन्स से की

यह अध्ययन प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुआ है। रिसर्च का शीर्षक डेंड्राइटिक मॉर्फोलॉजी एंड सिनैप्टिक नॉनलाइनैरिटीज एन्हांस फंक्शनल कॉम्प्लेक्सिटी इन ह्यूमन कॉर्टिकल न्यूरॉन्स है। अध्ययन हयूमन कॉर्टिकल न्यूरॉन्स की तुलना चूहे के न्यूरॉन्स से की गई और पाया गया कि मानव न्यूरॉन्स की कार्यात्मक जटिलता काफी अधिक है।

सिर्फ ऑन-ऑफ स्विच नहीं है न्यूरॉन

आमतौर पर न्यूरॉन को एक ऐसी जैविक इकाई के रूप में समझा जाता है जो संकेत मिलने पर सक्रिय होती है और फिर आगे सूचना भेजती है। इस सोच में एक न्यूरॉन को कुछ हद तक साधारण ऑन-ऑफ स्विच जैसा माना जाता है। लेकिन नई रिसर्च बताती है कि यह तस्वीर अधूरी है।

कोशिका केवल संकेत प्राप्त करके आगे नहीं भेजती

हिब्रू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इदान सेगेव और उनकी टीम के मुताबिक मानव कॉर्टिकल न्यूरॉन आने वाली सूचनाओं को बहुत जटिल तरीके से संसाधित कर सकता है। यानी कोशिका केवल संकेत प्राप्त करके आगे नहीं भेजती, बल्कि उसके भीतर ही कई स्तरों पर गणनात्मक प्रक्रिया होती है। यही वजह है कि शोधकर्ताओं ने मानव न्यूरॉन को एक साधारण स्विच के बजाय एक शक्तिशाली जैविक कंप्यूटिंग इकाई के रूप में देखने की बात कही है।

मानव न्यूरॉन में क्या है खास?

इस क्षमता के पीछे न्यूरॉन की भौतिक बनावट महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। खास तौर पर इसकी डेंड्राइटिक संरचना यानी कोशिका की शाखाओं जैसी संरचना बहुत अहम है। मानव कॉर्टिकल न्यूरॉन्स में डेंड्राइटिक शाखाएं बेहद विस्तृत होती हैं। ये शाखाएं अलग-अलग स्रोतों से आने वाले हजारों संकेतों को ग्रहण करती हैं और उनके प्रभाव को कोशिका के भीतर संसाधित करती हैं।

डेंड्राइटिक झिल्ली के क्षेत्रफल और शाखाओं के पैटर्न में महत्वपूर्ण अंतर

शोध के अनुसार मानव और चूहे के कॉर्टिकल न्यूरॉन्स में डेंड्राइटिक झिल्ली के क्षेत्रफल और शाखाओं के पैटर्न में महत्वपूर्ण अंतर है। इसके अलावा एनएमडीए-मध्यस्थित सिनैप्टिक रिसेप्टर्स की घनत्व और उनकी गैर-रैखिक गतिविधि भी न्यूरॉन की कार्यात्मक जटिलता बढ़ाती है। सरल भाषा में समझें तो मानव न्यूरॉन के पास सूचना लेने और उसे अलग-अलग स्तर पर संसाधित करने के लिए ज्यादा जटिल जैविक ढांचा मौजूद है।

वैज्ञानिकों ने कैसे नापी न्यूरॉन की ताकत?

रिसर्च की सबसे खास बात इसकी मापन पद्धति है। वैज्ञानिकों ने न्यूरॉन की कार्यात्मक जटिलता को मापने के लिए फंक्शनल कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स (एफसीआई) नाम की पद्धति विकसित की। इसके लिए शोधकर्ताओं ने उन्नत कंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉडल का इस्तेमाल किया। मूल विचार यह था कि किसी जैविक न्यूरॉन के इनपुट और आउटपुट के बीच संबंध को एक कृत्रिम न्यूरल नेटवर्क कितनी आसानी से दोहरा सकता है।

कृत्रिम मॉडल को ज्यादा जटिल संरचना की जरूरत

अगर किसी न्यूरॉन की गतिविधि की नकल करने के लिए कृत्रिम मॉडल को ज्यादा जटिल संरचना की जरूरत पड़ती है, तो उस जैविक न्यूरॉन की कार्यात्मक जटिलता अधिक मानी जाती है। इस तरह वैज्ञानिकों ने केवल न्यूरॉन की संरचना देखने के बजाय यह समझने की कोशिश की कि उसकी संरचना वास्तविक गणनात्मक क्षमता में कैसे बदलती है।

मानव और चूहे के न्यूरॉन में बड़ा अंतर

शोधकर्ताओं ने अलग-अलग कॉर्टिकल परतों के पिरामिडल न्यूरॉन्स का अध्ययन किया। परिणामों में मानव कॉर्टिकल न्यूरॉन्स को उनके चूहे के समकक्ष न्यूरॉन्स की तुलना में अधिक कार्यात्मक रूप से जटिल पाया गया।
वैज्ञानिकों ने इस अंतर को मुख्य रूप से डेंड्राइटिक झिल्ली के क्षेत्रफल, शाखाओं की संरचना और एनएमडीए से जुड़ी सिनैप्टिक गैर-रैखिकता जैसे कारकों से जोड़ा। यानी मानव न्यूरॉन की खासियत केवल यह नहीं है कि वह बड़ा या अलग आकार का है, बल्कि उसकी संरचना और विद्युत व्यवहार मिलकर उसे ज्यादा शक्तिशाली सूचना प्रसंस्करण इकाई बनाते हैं।

एक कोशिका कितनी जटिल गणना कर सकती है?

यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे मस्तिष्क की गणनात्मक क्षमता को देखने का पैमाना बदल सकता है। अभी तक मस्तिष्क की क्षमता को समझने में मुख्य जोर न्यूरॉन्स की संख्या और उनके बीच बने नेटवर्क पर रहा है। अगर प्रत्येक न्यूरॉन अपने स्तर पर भी जटिल गणना कर सकता है, तो मस्तिष्क की कुल क्षमता केवल न्यूरॉन्स की संख्या से नहीं समझी जा सकती। एक न्यूरॉन के भीतर मौजूद डेंड्राइटिक शाखाएं और सिनैप्टिक प्रक्रियाएं भी सूचना को बदलने, जोड़ने और उसका अर्थ निकालने में योगदान देती हैं।

यह रिसर्च जटिल क्षमताओं को समझने में नई दिशा दे सकती है

यही बात मानव मस्तिष्क की भाषा, कल्पना, गणित, सीखने और समस्या समाधान जैसी जटिल क्षमताओं को समझने में नई दिशा दे सकती है। हालांकि यह रिसर्च इन क्षमताओं का पूरा जैविक रहस्य नहीं सुलझाती, लेकिन यह बताती है कि इसकी खोज केवल पूरे मस्तिष्क के स्तर पर करने के बजाय एक-एक कोशिका के स्तर पर भी करनी होगी।

एआई की दुनिया पर भी पड़ सकता है असर

इस खोज का संबंध केवल न्यूरोसाइंस से नहीं है। इसका असर भविष्य की एआई तकनीक पर भी पड़ सकता है। आज के ज्यादातर कृत्रिम न्यूरल नेटवर्क में इस्तेमाल होने वाली कृत्रिम इकाइयां जैविक न्यूरॉन की तुलना में काफी सरल होती हैं। इनमें प्रत्येक इकाई को मुख्य रूप से एक गणितीय प्रक्रिया के रूप में मॉडल किया जाता है। इसके विपरीत मानव न्यूरॉन अपने भीतर ही कई तरह की जटिल प्रक्रियाएं संचालित कर सकता है।

ब्रेन-इंस्पायर्ड एआई की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत

शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में ऐसी एआई प्रणालियां विकसित की जा सकती हैं जिनकी कृत्रिम इकाइयां खुद ज्यादा जटिल गणनाएं करने में सक्षम हों। इसे ब्रेन-इंस्पायर्ड एआई की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है।

भविष्य की कंप्यूटिंग तकनीकों से सीखा जा सकता है

इसका मतलब यह नहीं है कि वर्तमान एआई सीधे मानव मस्तिष्क की तरह काम करने लगेगा। बल्कि रिसर्च से यह समझने में मदद मिल सकती है कि जैविक न्यूरॉन किस तरह कम स्तर पर ही जटिल सूचना प्रसंस्करण कर पाता है और उस सिद्धांत से भविष्य की कंप्यूटिंग तकनीकों से क्या सीखा जा सकता है।

रिसर्च टीम में कौन-कौन शामिल?

इस अध्ययन का नेतृत्व इडो आइज़ेनबुड, डेनिएला योएली, डेविड बेनियागुएव, क्रिस्टियान पी. जे. डी कॉक, माइकल लंदन और इदान सेगेव ने किया। शोधकर्ताओं का संबंध यरूशलेम स्थित हिब्रू विश्वविद्यालय के एडमंड एंड लिली सफ्रा सेंटर फॉर ब्रेन साइंसेज सहित अन्य संस्थानों से है। टीम में एम्स्टर्डम की फ्री यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिक भी शामिल रहे। अध्ययन पीएनएएस में प्रकाशित हुआ। हिब्रू विश्वविद्यालय के शोध रिकॉर्ड में भी इस पेपर को पीयर-रिव्यू जर्नल आर्टिकल के रूप में दर्ज किया गया है।

मस्तिष्क को समझने का बदल सकता है नजरिया

इस रिसर्च का सबसे बड़ा संदेश यही है कि मानव बुद्धिमत्ता को केवल ‘कितने न्यूरॉन हैं’ से समझना पर्याप्त नहीं हो सकता। सवाल यह भी है कि हर न्यूरॉन कितना जटिल काम कर सकता है। मानव कॉर्टिकल न्यूरॉन्स की विस्तृत डेंड्राइटिक संरचना, विशिष्ट विद्युत गुण और सिनैप्टिक प्रक्रियाएं मिलकर उन्हें शक्तिशाली गणनात्मक इकाई बना सकती हैं। यही सूक्ष्म स्तर की जटिलता आगे चलकर पूरे मस्तिष्क के विशाल नेटवर्क में बदलती है।

मानव मस्तिष्क का रहस्य केवल आकार में नहीं, बल्कि कोशिका की क्षमता में ​छिपा

बहरहाल,वैज्ञानिकों के लिए अगली चुनौती यह समझना होगी कि इन शक्तिशाली एकल कोशिकाओं की गणनात्मक क्षमता जब अरबों न्यूरॉन्स के नेटवर्क के साथ जुड़ती है, तो उससे विचार, स्मृति, भाषा और चेतना जैसी जटिल मानवीय क्षमताएं कैसे उभरती हैं। नई रिसर्च ने कम से कम इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि मानव मस्तिष्क का रहस्य केवल उसके आकार में नहीं, बल्कि उसकी एक-एक कोशिका की असाधारण क्षमता में भी छिपा हो सकता है।