
India Solar vs Coal Capacity 2026 : क्या बदल रही देश की बिजली व्यवस्था, PC- Chatgpt
भारत की बिजली व्यवस्था एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। देश में पहली बार स्वच्छ ऊर्जा की स्थापित क्षमता जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता से आगे निकल गई है। अगस्त 2026 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत में स्वच्छ ऊर्जा की स्थापित क्षमता करीब 331.7 गीगावाट पहुंच गई है, जबकि जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता करीब 302 गीगावाट है। लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है।
सोलर ने अकेले कोयले को पीछे नहीं छोड़ा है। सौर ऊर्जा की क्षमता करीब 211 गीगावाट है, जबकि कोयले की क्षमता करीब 254.4 गीगावाट है। बदलाव यह हुआ है कि सौर, पवन, जलविद्युत और अन्य स्वच्छ स्रोतों को मिलाकर कुल क्षमता अब जीवाश्म ईंधन से ज्यादा हो गई है।
यही आंकड़ा भारत की ऊर्जा कहानी में एक महत्वपूर्ण मोड़ दिखाता है। लेकिन असली चुनौती अब शुरू होती है—सूरज डूबने के बाद देश की बिजली जरूरत कौन पूरी करेगा?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बिजली संयंत्र की स्थापित क्षमता और उससे वास्तव में पैदा होने वाली बिजली दो अलग चीजें हैं। मान लीजिए किसी देश में 100 मेगावाट का सोलर प्लांट लगा है। इसका मतलब यह नहीं कि वह पूरे दिन 100 मेगावाट बिजली देगा। सूरज निकलने पर उत्पादन बढ़ेगा, दोपहर में सबसे ज्यादा होगा और शाम होते-होते घट जाएगा। रात में उसका उत्पादन लगभग शून्य हो जाता है।
इसके विपरीत कोयले का बिजलीघर दिन-रात चल सकता है और मांग के हिसाब से बिजली उत्पादन को अपेक्षाकृत स्थिर रख सकता है। यही वजह है कि भारत की स्थापित क्षमता में स्वच्छ ऊर्जा आगे निकलने के बावजूद बिजली उत्पादन में कोयले की भूमिका अभी भी बहुत बड़ी है। मौजूदा समय में भारत की बिजली का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा कोयले से आता है।
यानी क्षमता के मामले में भारत तेजी से सौर और दूसरी नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ चुका है, लेकिन उत्पादन के मामले में कोयला अभी भी सबसे बड़ा सहारा है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में सौर ऊर्जा क्षमता में जबरदस्त विस्तार किया है। 2010 में देश की सौर क्षमता महज करीब 0.07 गीगावाट थी। अब यह 200 गीगावाट से ऊपर पहुंच चुकी है। केवल 2025 से मध्य 2026 के बीच ही सौर क्षमता में 75 गीगावाट से अधिक की बढ़ोतरी हुई, जबकि इसी अवधि में कोयला क्षमता में वृद्धि करीब 3.8 गीगावाट रही।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 30 जून 2026 तक भारत की सौर क्षमता 162.15 गीगावाट थी। इसमें बड़े सौर संयंत्रों के साथ रूफटॉप और ऑफ-ग्रिड सौर परियोजनाएं भी शामिल हैं।
सौर ऊर्जा की सबसे बड़ी ताकत यह है कि एक बार संयंत्र लगने के बाद ईंधन खरीदने की जरूरत नहीं होती। भारत जैसे देश में जहां साल के बड़े हिस्से में धूप उपलब्ध रहती है, वहां सौर ऊर्जा का विस्तार स्वाभाविक विकल्प बन गया है। लेकिन, सौर ऊर्जा की यही सबसे बड़ी सीमा भी है। यह मौसम और समय पर निर्भर है।
दिन में जब सौर ऊर्जा का उत्पादन अपने चरम पर होता है, तब बिजली की मांग और उत्पादन के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। लेकिन शाम होते ही सौर उत्पादन तेजी से गिरने लगता है।
यही वह समय है जब घरों में पंखे, एसी, रोशनी और दूसरे उपकरण चल रहे होते हैं। गर्मियों में रात की बिजली मांग और बढ़ जाती है। हाल के वर्षों में रात के समय बिजली की मांग में तेज वृद्धि देखी गई है, खासकर एयर कंडीशनिंग और बढ़ती गर्मी के कारण।
ऐसे में सवाल है कि अगर भारत सौर ऊर्जा पर ज्यादा निर्भर हो गया तो शाम और रात की बिजली कौन देगा?
फिलहाल इसका बड़ा जवाब है, कोयला, जलविद्युत, गैस, परमाणु ऊर्जा और कुछ हद तक बिजली भंडारण। लेकिन, भविष्य में जैसे-जैसे सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ेगी, भंडारण की जरूरत भी तेजी से बढ़ेगी।
सौर ऊर्जा को अगर बड़ी मात्रा में इस्तेमाल करना है तो दिन में पैदा हुई अतिरिक्त बिजली को बचाकर शाम और रात में इस्तेमाल करना होगा। यही काम ऊर्जा भंडारण प्रणाली यानी Energy Storage System करती है।
इसमें बैटरी स्टोरेज के अलावा पंप्ड स्टोरेज हाइड्रो जैसी तकनीक भी महत्वपूर्ण है। पंप्ड स्टोरेज में बिजली की अतिरिक्त उपलब्धता के समय पानी को ऊंचाई पर पहुंचाया जाता है और जरूरत पड़ने पर उसी पानी से बिजली बनाई जाती है।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुमान के मुताबिक 2026-27 में भारत को करीब 82.37 गीगावाट-घंटे ऊर्जा भंडारण की जरूरत होगी। 2031-32 तक यह आवश्यकता बढ़कर करीब 411.4 गीगावाट-घंटे हो सकती है।
यानी अगले कुछ वर्षों में केवल सोलर पैनल और पवन टर्बाइन लगाना पर्याप्त नहीं होगा। उनके साथ बड़े पैमाने पर बैटरी, पंप्ड स्टोरेज और मजबूत बिजली ग्रिड भी बनाना होगा।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की 2035-36 की योजना बताती है कि उस समय भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता करीब 1,121 गीगावाट तक पहुंच सकती है। इसमें लगभग 509 गीगावाट सौर और 155 गीगावाट पवन क्षमता का अनुमान है।
लेकिन इसके साथ ऊर्जा भंडारण की जरूरत भी बहुत बड़ी होगी। करीब 174 गीगावाट क्षमता और 888 गीगावाट-घंटे भंडारण। इसमें बैटरी स्टोरेज और पंप्ड स्टोरेज दोनों शामिल हैं।
इससे साफ है कि भारत की ऊर्जा क्रांति केवल सोलर पैनल लगाने की कहानी नहीं होगी। यह सोलर + स्टोरेज + ग्रिड + बैकअप बिजली का पूरा सिस्टम बनाने की चुनौती होगी।
कम से कम निकट भविष्य में ऐसा होता दिखाई नहीं देता। भारत की बिजली मांग लगातार बढ़ रही है। गर्मी बढ़ने के साथ एसी और कूलिंग की मांग बढ़ रही है, शहरों का विस्तार हो रहा है, उद्योग और डिजिटल बुनियादी ढांचा बढ़ रहा है और इलेक्ट्रिक वाहनों के कारण भविष्य में बिजली की जरूरत और बढ़ सकती है।
इसीलिए भारत एक तरफ नवीकरणीय ऊर्जा को तेजी से बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ कोयले को अचानक खत्म करने के बजाय उसे बिजली व्यवस्था के बैकअप के रूप में बनाए रख रहा है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के 2031-32 के अनुमान में भी करीब 259.6 गीगावाट कोयला आधारित क्षमता का प्रावधान है।
इसका मतलब यह नहीं है कि भारत कोयले पर निर्भरता हमेशा बनाए रखना चाहता है। बल्कि फिलहाल चुनौती यह है कि बढ़ती बिजली मांग को विश्वसनीय तरीके से पूरा करते हुए धीरे-धीरे जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी कम की जाए।
भारत की बिजली व्यवस्था में आने वाला अगला बदलाव बेहद महत्वपूर्ण होगा। अब सवाल यह नहीं है कि देश कितने सोलर प्लांट लगा सकता है। सवाल यह है कि जब सूरज नहीं होगा, तब वही बिजली व्यवस्था कैसे चलेगी?
अगर दिन में सौर ऊर्जा जरूरत से ज्यादा पैदा होती है तो उसे बर्बाद होने से बचाकर स्टोर करना होगा। इसके लिए बैटरी और पंप्ड स्टोरेज चाहिए। जहां बिजली बन रही है और जहां मांग है, उनके बीच मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क चाहिए। और जब नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध न हो, तब भरोसेमंद बैकअप भी चाहिए।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के 2029-30 के अध्ययन में भी बड़े पैमाने पर स्टोरेज की जरूरत बताई गई है। उसके अनुसार उस समय करीब 60.63 गीगावाट स्टोरेज क्षमता और 336.4 गीगावाट-घंटे भंडारण की आवश्यकता हो सकती है।
भारत में बिजली व्यवस्था का संतुलन बदल रहा है। स्वच्छ ऊर्जा की स्थापित क्षमता पहली बार जीवाश्म ईंधन से आगे निकल गई है। सौर ऊर्जा इसका सबसे बड़ा इंजन बन चुकी है और आने वाले वर्षों में इसकी भूमिका और बढ़ने वाली है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोयला तुरंत खत्म हो जाएगा। फिलहाल भारत की बिजली उत्पादन व्यवस्था में कोयले की भूमिका बहुत बड़ी है और बढ़ती मांग को देखते हुए कुछ समय तक इसकी जरूरत बनी रहने की संभावना है।
असल बदलाव यह है कि भारत अब कोयले से सोलर की ओर सिर्फ क्षमता के स्तर पर नहीं, बल्कि पूरे बिजली तंत्र को बदलने की दिशा में बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में इस बदलाव की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत कितनी तेजी से सस्ती बैटरी, पंप्ड स्टोरेज, मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और भरोसेमंद बिजली व्यवस्था तैयार कर पाता है।
Updated on:
18 Aug 2026 10:24 am
Published on:
18 Aug 2026 10:24 am
