18 अगस्त 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

मणिपुर में ‘घाटी बनाम पहाड़’ का विवाद: आखिर 10% जमीन पर क्यों रहता है आधा राज्य?

Manipur Geography Land Rights Controversy : मणिपुर में 'घाटी बनाम पहाड़' का विवाद क्या है? जानिए 10% घाटी में 90% आबादी के दबाव, MLR & LR एक्ट 1960 और मैतई व कुकी-जो समुदायों के बीच जमीन के अधिकारों की पूरी कहानी।
5 min read
Google source verification
Manipur Geography Land Rights Controversy

Manipur Geography Land Rights Controversy : समझें क्या है मणिपुर विवाद, PC- Chatgpt

मणिपुर का संघर्ष समझना हो तो सबसे पहले वहां के नक्शे को समझना जरूरी है। राज्य का करीब 90 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पहाड़ियों से घिरा है, जबकि बीच में स्थित इंफाल घाटी बहुत छोटा हिस्सा है। मणिपुर सरकार के एक दस्तावेज के अनुसार, राज्य के करीब 20,089 वर्ग किलोमीटर हिस्से में बाहरी पहाड़ हैं, जबकि केंद्रीय इंफाल घाटी का क्षेत्रफल करीब 1,843 वर्ग किलोमीटर है। यानी मोटे तौर पर 10 प्रतिशत जमीन वाली घाटी में राज्य की बड़ी आबादी रहती है।

यही भौगोलिक असमानता आगे चलकर जमीन, कानून, आबादी, राजनीति और पहचान के सवालों में बदल गई। एक तरफ मैतई समुदाय की बड़ी आबादी घाटी में सीमित जमीन पर रहती है, दूसरी तरफ कुकी-जो और नागा जैसे आदिवासी समुदाय मुख्य रूप से पहाड़ी इलाकों में रहते हैं, जहां जमीन और उसके इस्तेमाल की व्यवस्था अलग है। इसलिए मणिपुर का ‘घाटी बनाम पहाड़’ विवाद सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि अधिकारों और सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।

10 फीसदी घाटी में इतनी आबादी क्यों?

मणिपुर की केंद्रीय घाटी चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरी हुई है। इंफाल इसी घाटी का प्रमुख शहरी और प्रशासनिक केंद्र है। राज्य की राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा भी यहीं केंद्रित रहा है।

यही वजह है कि घाटी पर आबादी का दबाव अधिक है। दूसरी तरफ पहाड़ी क्षेत्र बहुत बड़े हैं, लेकिन उनकी आबादी अपेक्षाकृत कम और बस्तियां ज्यादा बिखरी हुई हैं। राज्य सरकार के पुराने आंकड़ों में भी घाटी और पहाड़ियों के बीच आबादी के घनत्व में बड़ा अंतर बताया गया है। 2015 के एक सरकारी विधेयक में कहा गया था कि राज्य का करीब 10 प्रतिशत क्षेत्र घाटी और 90 प्रतिशत पहाड़ी क्षेत्र है, जबकि 2011 की जनगणना के आधार पर घाटी में आबादी का घनत्व पहाड़ियों की तुलना में कई गुना अधिक था।

यानी तस्वीर कुछ ऐसी है जमीन कम, आबादी ज्यादा बनाम जमीन ज्यादा, आबादी कम। यही अंतर जमीन को मणिपुर की राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा बना देता है।

पहाड़ी इलाकों में जमीन का कानून अलग क्यों है?

मणिपुर में जमीन का प्रशासन पूरे राज्य में एक जैसा नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण Manipur Land Revenue and Land Reforms Act, 1960 है। इस कानून की धारा 1 में साफ तौर पर कहा गया है कि यह कानून hill areas पर लागू नहीं होता, हालांकि सरकार अधिसूचना के जरिए इसके प्रावधानों को कुछ पहाड़ी इलाकों तक बढ़ा सकती है।

मणिपुर सरकार के राजस्व विभाग के अनुसार भी राज्य में घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों की भूमि व्यवस्था अलग रही है। घाटी के जिलों में राजस्व और भूमि रिकॉर्ड की औपचारिक व्यवस्था अधिक विकसित है, जबकि पहाड़ी जिलों में surveyed और unsurveyed दोनों तरह की जमीन मौजूद है।

पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन पर पारंपरिक और सामुदायिक अधिकारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। कई इलाकों में जमीन का स्वामित्व और इस्तेमाल गांव के मुखिया या समुदाय की पारंपरिक व्यवस्था से जुड़ा रहा है। अनुसूचित जनजातियों की जमीन को बाहरी लोगों द्वारा आसानी से खरीद लेने से रोकने के लिए अलग-अलग कानूनी और प्रशासनिक सुरक्षा भी मौजूद रही है।

इसका सीधा मतलब यह है कि मणिपुर में जमीन सिर्फ निजी संपत्ति का सवाल नहीं है; कई पहाड़ी इलाकों में यह समुदाय की पहचान और सामूहिक अधिकार से भी जुड़ी है।

मैतई समुदाय की चिंता क्या है?

मैतई समुदाय की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक घाटी में जमीन की सीमित उपलब्धता है। उनकी आबादी का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत छोटे घाटी क्षेत्र में केंद्रित है। इसके कारण आवास, कृषि, उद्योग और भविष्य के विस्तार के लिए जमीन को लेकर दबाव लगातार बना रहता है।

मैतई पक्ष का एक तर्क यह भी रहा है कि उन्हें पहाड़ी इलाकों में जमीन खरीदने की वही स्वतंत्रता नहीं मिलती जो गैर-आदिवासी लोग घाटी में जमीन खरीदने के मामले में रखते हैं। इस अंतर को मैतई संगठनों का एक हिस्सा असमान व्यवस्था के रूप में देखता है।

यहीं से अनुसूचित जनजाति यानी ST दर्जे की मांग भी जुड़ती है। मैतई समुदाय के कुछ संगठनों का तर्क रहा है कि ST दर्जा मिलने से उनकी जमीन, संस्कृति और पहचान को संवैधानिक सुरक्षा मिल सकती है। लेकिन, यही मांग पहाड़ी आदिवासी समुदायों के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गई।

कुकी-जो समुदाय को किस बात का डर है?

कुकी-जो और दूसरे आदिवासी समुदायों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा उनकी जमीन की सुरक्षा है। पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि समुदाय की सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था का आधार भी है।

इसलिए जब मैतई समुदाय को ST दर्जा देने की मांग तेज हुई, तो आदिवासी संगठनों में यह आशंका पैदा हुई कि अगर मैतई को ST सूची में शामिल किया गया तो वे भी पहाड़ी क्षेत्रों में जनजातीय भूमि और संसाधनों पर अधिकार का दावा कर सकेंगे।

मैतई राज्य की सबसे बड़ी आबादी है और उसका राजनीतिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। इसलिए कुकी-जो और दूसरे आदिवासी समूहों की चिंता केवल जमीन खरीदने तक सीमित नहीं है। उनके लिए सवाल यह है कि अगर बड़ी आबादी वाला समुदाय भी उन्हीं संवैधानिक भूमि अधिकारों का लाभ लेने लगे तो मौजूदा जनजातीय समुदायों की सुरक्षा कितनी मजबूत रह पाएगी? यही कारण है कि दोनों पक्ष एक ही जमीन व्यवस्था को बिल्कुल अलग नजरिए से देखते हैं।

2023 की हिंसा में जमीन का सवाल कैसे आया?

मई 2023 में भड़की हिंसा के पीछे कई कारण थे, लेकिन ST दर्जे का विवाद तत्काल राजनीतिक चिंगारी बना। 27 मार्च 2023 को मणिपुर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने राज्य सरकार को मैतई समुदाय को ST सूची में शामिल करने की मांग पर केंद्र को सिफारिश भेजने पर विचार करने का निर्देश दिया था।

इस आदेश के विरोध में 3 मई को Tribal Solidarity March आयोजित किया गया। इसके बाद चुराचांदपुर सहित कई इलाकों में हिंसा भड़क उठी और कुछ ही समय में यह व्यापक मैतई-कुकी संघर्ष में बदल गई।

बाद में हाईकोर्ट ने अपने आदेश के विवादित हिस्से को संशोधित किया। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि पूरा संघर्ष केवल उस आदेश की वजह से शुरू हुआ। जमीन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक अधिकार और लंबे समय से मौजूद जातीय अविश्वास पहले से मौजूद थे।

पहाड़ों में जमीन की सुरक्षा इतनी संवेदनशील क्यों है?

इसके पीछे इतिहास भी है। पहाड़ी इलाकों में भूमि व्यवस्था लंबे समय से पारंपरिक संस्थाओं और जनजातीय समुदायों से जुड़ी रही है। सरकारी रिपोर्टों में भी यह दर्ज है कि कई पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन का स्वामित्व गांव के मुखिया या समुदाय के पास रहा और खेती के लिए जमीन का आवंटन पारंपरिक व्यवस्था के तहत किया जाता रहा।

इसलिए पहाड़ी समुदायों के लिए जमीन पर बाहरी नियंत्रण का डर केवल आज का राजनीतिक मुद्दा नहीं है। यह उनकी सामाजिक संरचना और सामुदायिक अधिकारों से जुड़ा सवाल है।

दूसरी तरफ मैतई समुदाय की चिंता यह है कि राज्य के बड़े हिस्से में जमीन होने के बावजूद वे उस जमीन तक आसानी से पहुंच नहीं बना सकते, जबकि उनकी आबादी का बड़ा हिस्सा सीमित घाटी में रहता है।

यानी एक पक्ष कहता है-'हमारी जमीन सुरक्षित रहनी चाहिए।' दूसरा पक्ष कहता है- 'हमारे पास रहने और फैलने के लिए जमीन बहुत कम है।' यही विरोधाभास इस विवाद को इतना जटिल बनाता है।

क्या समाधान सिर्फ जमीन का कानून बदलना है?

शायद नहीं। क्योंकि समस्या केवल यह तय करने की नहीं है कि कौन किस जमीन को खरीद सकता है। इसके साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व, पहाड़ी क्षेत्रों का प्रशासन, विकास, रोजगार, सुरक्षा और समुदायों के बीच भरोसे का सवाल भी जुड़ा है।

मणिपुर में Hill Areas Committee और Autonomous District Councils जैसे संस्थागत ढांचे इसी व्यापक सवाल से जुड़े हैं। पहाड़ी समुदाय लंबे समय से अधिक प्रशासनिक अधिकारों की मांग करते रहे हैं, जबकि मैतई पक्ष मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता को लेकर चिंतित रहा है। इसलिए किसी एक कानून में बदलाव से पूरे विवाद का समाधान संभव नहीं दिखता।

असली कहानी 10 और 90 फीसदी की नहीं है

मणिपुर को सिर्फ इस तरह देखना कि '90 प्रतिशत पहाड़ है और 10 प्रतिशत घाटी' अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि इन दोनों भौगोलिक हिस्सों में रहने वाले समुदाय जमीन, अधिकार और भविष्य को किस तरह देखते हैं।

घाटी में रहने वाले मैतई समुदाय के लिए सीमित जमीन और बढ़ता दबाव चिंता का विषय है। पहाड़ियों में रहने वाले कुकी-जो और अन्य जनजातीय समुदायों के लिए उनकी जमीन पर बाहरी दखल सबसे बड़ी आशंकाओं में से एक है।

यही वजह है कि मणिपुर में जमीन का सवाल सीधे पहचान और अस्तित्व के सवाल में बदल जाता है। जब जमीन के साथ समुदाय की संस्कृति, राजनीतिक शक्ति और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा जुड़ जाए, तो कोई भी बदलाव केवल प्रशासनिक फैसला नहीं रह जाता।