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कुकी और मैतई समुदाय में झगड़े क्यों होते हैं? मणिपुर संघर्ष की पूरी कहानी

Manipur Violence Reasons Explained : मणिपुर में मैतई और कुकी-जो समुदायों के बीच हिंसा क्यों हुई? जानिए जमीन के अधिकार, ST दर्जे का विवाद, इंफाल घाटी बनाम पहाड़ी क्षेत्रों का विभाजन और स्थायी शांति की चुनौतियां।
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Manipur Violence Reasons Explained

Manipur Violence Reasons Explained : कुकी और मैतई समुदाय के बीच क्यों संघर्ष? PC- Chatgpt

मणिपुर में मैतई और कुकी-जो समुदायों के बीच संघर्ष को सिर्फ जमीन, आरक्षण या किसी एक घटना का नतीजा समझना सही नहीं होगा। इसके पीछे दशकों से चली आ रही जातीय पहचान, जमीन और संसाधनों पर अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, विकास में असमानता, प्रशासनिक स्वायत्तता और म्यांमार से लगी सीमा से जुड़े सुरक्षा व जनसांख्यिकीय सवाल हैं। मई 2023 में भड़की हिंसा ने इन पुराने तनावों को बेहद हिंसक रूप दे दिया और राज्य का सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह प्रभावित हुआ।

सबसे पहले समझिए मैतई और कुकी कौन हैं?

मणिपुर की आबादी मुख्य रूप से तीन बड़े जातीय समूहों- मैतई, नागा और कुकी-जो के रूप में देखी जाती है। मैतई राज्य का सबसे बड़ा समुदाय है और इसकी बड़ी आबादी इंफाल घाटी तथा उसके आसपास रहती है। समुदाय के भीतर हिंदू और सनामाही समेत अलग-अलग धार्मिक परंपराएं मौजूद हैं।

कुकी-जो कई जनजातीय समूहों का व्यापक समुदाय है। इनकी बड़ी आबादी मणिपुर के पहाड़ी जिलों में रहती है और अधिकांश कुकी-जो लोग ईसाई हैं। कुकी-जो और नागा समुदायों को अनुसूचित जनजाति यानी ST का दर्जा प्राप्त है।

मणिपुर का भूगोल भी इस विवाद को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। राज्य का लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र पहाड़ी है, जबकि मैतई आबादी का बड़ा हिस्सा करीब 10 प्रतिशत क्षेत्र वाली इंफाल घाटी में केंद्रित है। यही ‘घाटी बनाम पहाड़’ का विभाजन आगे चलकर जमीन, राजनीति और विकास के सवालों से जुड़ गया।

जमीन का सवाल इतना बड़ा क्यों है?

मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में जनजातीय जमीन को लेकर विशेष कानूनी और पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था है। इन इलाकों में जमीन के हस्तांतरण पर प्रतिबंधों का उद्देश्य आदिवासी समुदायों के भूमि अधिकारों की रक्षा करना है।

यहीं से दोनों समुदायों की चिंताएं अलग-अलग हो जाती हैं। मैतई पक्ष का तर्क है कि उनकी आबादी का बड़ा हिस्सा घाटी में सीमित है और वे पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन खरीदने के अधिकार से वंचित हैं। मैतई संगठनों की ओर से यह भी कहा जाता रहा है कि उनकी भाषा, संस्कृति और पारंपरिक पहचान की रक्षा के लिए संवैधानिक संरक्षण जरूरी है।

दूसरी तरफ कुकी और अन्य आदिवासी समूहों को आशंका है कि यदि मैतई समुदाय को ST का दर्जा मिल गया तो पहाड़ी इलाकों की जमीन पर उनकी दावेदारी मजबूत हो सकती है। मैतई राज्य की सबसे बड़ी आबादी है और उसका राजनीतिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। इसलिए आदिवासी संगठनों को डर रहा है कि उनकी जमीन और संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।

इसलिए जमीन का विवाद केवल जमीन खरीदने का मामला नहीं है। इसके पीछे पहचान, अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का सवाल भी जुड़ा है।

ST दर्जे का विवाद कैसे बना हिंसा की चिंगारी?

मैतई समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की मांग 2023 में अचानक पैदा नहीं हुई थी। इस मांग को लेकर लंबे समय से अभियान चल रहा था।

27 मार्च 2023 को मणिपुर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने राज्य सरकार को मैतई समुदाय को ST सूची में शामिल करने की मांग पर विचार करते हुए केंद्र को अपनी सिफारिश भेजने का निर्देश दिया। इस आदेश के बाद आदिवासी संगठनों में भारी नाराजगी पैदा हुई।

इसके विरोध में 3 मई 2023 को ‘Tribal Solidarity March’ निकाला गया। इसके बाद चुराचांदपुर सहित कई इलाकों में हिंसा भड़क गई और देखते ही देखते यह राज्य के कई हिस्सों में फैल गई। बाद में हाईकोर्ट ने अपने 2023 के आदेश में विवादित हिस्से को संशोधित या हटा दिया। इसलिए संघर्ष को केवल हाईकोर्ट के आदेश का परिणाम मानना सही नहीं होगा। वह तत्काल चिंगारी जरूर बना, लेकिन इसके पीछे लंबे समय से जमा अविश्वास मौजूद था।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी बड़ा मुद्दा

मणिपुर में मैतई समुदाय की आबादी अधिक है और विधानसभा की राजनीति में भी उसका प्रभाव बड़ा है। दूसरी तरफ पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदाय लंबे समय से राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।

कुकी और नागा संगठनों का आरोप रहा है कि राज्य की राजनीति और प्रशासन का केंद्र इंफाल घाटी रही है और पहाड़ी इलाकों को विकास तथा प्रशासनिक फैसलों में अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिली। इसी वजह से Hill Areas Committee, Autonomous District Councils और अधिक स्वायत्तता जैसे मुद्दे लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं।

दूसरी तरफ मैतई समुदाय का एक हिस्सा मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता को सबसे बड़ा मुद्दा मानता है। जब कुकी या नागा संगठनों की ओर से अलग प्रशासन या अलग क्षेत्रीय व्यवस्था की मांग उठती है तो इसे मणिपुर के विभाजन के खतरे के रूप में देखा जाता है।

अलग प्रशासन या 'कुकीलैंड' की मांग क्यों?

2023 की हिंसा के बाद कई कुकी संगठनों और कुकी विधायकों ने अलग प्रशासन की मांग को और मजबूती से उठाया। उनका तर्क है कि कुकी-बहुल पहाड़ी इलाकों का प्रशासन अलग तरीके से चलने पर समुदाय के भूमि, सुरक्षा और राजनीतिक अधिकारों की बेहतर रक्षा हो सकती है।

मैतई संगठनों का इसके विपरीत मानना है कि ऐसी मांग मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करेगी। इस तरह एक तरफ अधिक स्वायत्तता और अलग प्रशासन की मांग है, तो दूसरी तरफ एकीकृत मणिपुर बनाए रखने की चिंता। यही विरोध संघर्ष को और जटिल बनाता है।

विकास का असंतुलन भी बढ़ाता है अविश्वास

घाटी और पहाड़ी इलाकों के बीच विकास का अंतर भी लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में कई जगह सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं। कुकी और नागा संगठनों का आरोप रहा है कि विकास का बड़ा हिस्सा इंफाल घाटी के आसपास केंद्रित रहा।

इस असमानता ने यह भावना मजबूत की कि पहाड़ी समुदायों को राज्य के संसाधनों और राजनीतिक फैसलों में पर्याप्त हिस्सा नहीं मिलता। इसलिए जमीन या ST दर्जे जैसे मुद्दे केवल कानूनी सवाल नहीं रह जाते, बल्कि उनके साथ वर्षों से जमा असमानता और राजनीतिक अविश्वास भी जुड़ जाता है।

म्यांमार की सीमा ने विवाद को और संवेदनशील बनाया

मणिपुर की करीब 400 किलोमीटर लंबी सीमा म्यांमार से लगती है। सीमा के दोनों ओर रहने वाले कुछ समुदायों के बीच ऐतिहासिक और पारिवारिक संबंध भी हैं। 2021 में म्यांमार में सैन्य शासन आने के बाद वहां से लोगों के भारत आने का मुद्दा मणिपुर की राजनीति में और महत्वपूर्ण हो गया।

मैतई संगठनों और कुछ अन्य समूहों ने आरोप लगाया कि म्यांमार से आने वाले लोगों के कारण मणिपुर का जनसांख्यिकीय संतुलन बदल रहा है। कुकी संगठनों ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि सीमा के दोनों ओर रहने वाले समुदायों के पुराने सामाजिक संबंधों को अवैध प्रवासन के मुद्दे से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

इसी से जुड़ा NRC और अवैध प्रवासियों की पहचान का मुद्दा भी विवाद का हिस्सा बना। पहाड़ी क्षेत्रों में अफीम की खेती और नशीले पदार्थों के खिलाफ सरकारी अभियान को लेकर भी दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग दावे सामने आए हैं। इन मुद्दों से जुड़े कई दावे राजनीतिक रूप से विवादित हैं, इसलिए उन्हें स्थापित तथ्य के बजाय संबंधित पक्षों के आरोप या दावे के रूप में देखना जरूरी है।

क्या मणिपुर में ऐसा संघर्ष पहली बार हुआ?

नहीं। मणिपुर में जातीय और राजनीतिक संघर्ष का इतिहास कई दशकों पुराना है। 1960 के दशक के बाद अलग-अलग समुदायों से जुड़े सशस्त्र और राजनीतिक आंदोलन उभरे। नागा और कुकी संगठनों की क्षेत्रीय मांगों तथा मैतई संगठनों की मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता को लेकर चिंताओं के बीच टकराव होते रहे हैं।

1990 के दशक में नागा-कुकी संघर्ष ने बड़े पैमाने पर हिंसा का रूप लिया। इसके अलावा मैतई और पंगल समुदाय के बीच भी अतीत में हिंसक संघर्ष हुआ। इसलिए 2023 की हिंसा को पूरी तरह नई घटना कहना सही नहीं होगा। यह पुराने जातीय अविश्वास, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और जमीन से जुड़े विवादों के बीच हुआ सबसे गंभीर और व्यापक विस्फोट था।

2023 की हिंसा ने क्या बदला?

मई 2023 के बाद मणिपुर में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। हजारों घर और धार्मिक स्थल प्रभावित हुए और बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में जाना पड़ा।

सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ कि कई इलाकों में मैतई और कुकी-जो समुदायों की आबादी लगभग पूरी तरह अलग-अलग हो गई। जिन जगहों पर दोनों समुदाय लंबे समय से साथ रहते थे, वहां भी बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ।

इससे केवल जान-माल का नुकसान नहीं हुआ, बल्कि सामाजिक संपर्क, व्यापार, आवाजाही और आपसी भरोसा भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। यही कारण है कि हिंसा की तीव्रता कम होने के बावजूद सामान्य स्थिति बहाल करना आसान नहीं है।

क्या अब मणिपुर में पूरी तरह शांति है?

स्थिति 2023 की तुलना में बदली है, लेकिन इसे पूरी तरह सामान्य कहना जल्दबाजी होगी। 2025 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद 13 फरवरी 2025 को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। 4 फरवरी 2026 को राष्ट्रपति शासन हटाकर युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में नई निर्वाचित सरकार बनी।

नई सरकार बनने के बावजूद समुदायों के बीच अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अगस्त 2026 में भी कांगपोकपी की एक घटना के बाद सरकार को सभी समुदायों से आपसी विश्वास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की अपील करनी पड़ी।

आखिर मणिपुर का असली विवाद क्या है?

मणिपुर का संघर्ष केवल जमीन या आरक्षण का विवाद नहीं है। इसके पीछे जमीन, पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, विकास, प्रशासनिक अधिकार, सुरक्षा और जनसांख्यिकी से जुड़े कई सवाल दशकों से जमा होते रहे हैं।

मैतई समुदाय की चिंता है कि वह अपनी ही भूमि में कई संवैधानिक और भूमि संबंधी प्रतिबंधों से घिरा हुआ है। दूसरी ओर कुकी-जो समुदाय को डर है कि राज्य की सबसे बड़ी आबादी और प्रभावशाली राजनीतिक समूह के सामने उनके भूमि और जनजातीय अधिकार कमजोर पड़ सकते हैं। 2023 में ST दर्जे से जुड़ा हाईकोर्ट का आदेश इस पुराने अविश्वास के बीच तत्काल चिंगारी बना, लेकिन संघर्ष का आधार पहले से मौजूद था।

इसलिए मणिपुर में स्थायी शांति सिर्फ सुरक्षा बलों की तैनाती या हिंसा रोकने से नहीं आएगी। इसके लिए जमीन के अधिकार, पहाड़ी क्षेत्रों की प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, विकास की असमानता, विस्थापित लोगों की वापसी और दोनों समुदायों के बीच भरोसा बहाल करने जैसे सवालों पर लंबे समय तक राजनीतिक संवाद जरूरी होगा।

मणिपुर की समस्या का समाधान तभी संभव है जब दोनों समुदायों की सुरक्षा, पहचान और अधिकारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के बजाय एक साथ देखने की कोशिश की जाए। यही इस लंबे संघर्ष से निकलने का सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी रास्ता है।