
मेइतेई भाषा के संवैधानिक सम्मान और सांस्कृतिक पहचान का अहम पड़ाव बना 20 अगस्त 1992 का संसदीय फैसला। फोटो:
भाषाकेवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति और इतिहास का आधार भी होती है। मेइतेई भाषा मणिपुर के लोगों की मातृभाषा होने के साथ उनकी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 20 अगस्त 1992 को भारतीय संसद ने 71वें संविधान संशोधन के ज़रिए मेइतेई (आधिकारिक नाम: मणिपुरी) भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। यही उपलब्धि आज भी हर वर्ष मणिपुरी भाषा दिवस के रूप में याद की जाती है।
20 अगस्त 1992 को लोकसभा और राज्यसभा ने संविधान (71वाँ संशोधन) विधेयक पारित किया। इसके बाद 31 अगस्त 1992 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलने के साथ यह कानून लागू हुआ और मेइतेई (मणिपुरी), कोंकणी तथा नेपाली भाषाओं को आठवीं अनुसूची में स्थान मिला। इस संशोधन के बाद अनुसूचित भाषाओं की संख्या 15 से बढ़कर 18 हो गई। यही वजह है कि मणिपुर में हर वर्ष 20 अगस्त को मणिपुरी भाषा दिवस मनाया जाता है।
मेइतेई, जिसे आधिकारिक रूप से मणिपुरी कहा जाता है, मणिपुर की प्रमुख भाषा है। यह तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार से जुड़ी है और उत्तर-पूर्व भारत की सबसे महत्वपूर्ण भाषाओं में गिनी जाती है। भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार इसके लगभग 18 लाख मातृभाषी वक्ता हैं। यह मणिपुर के अलावा असम, त्रिपुरा, नागालैंड और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में भी बोली जाती है।
मेइतेई भाषा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी पारंपरिक लिपि मेइतेई मयेक है। सदियों तक इस भाषा में इसी लिपि का प्रयोग होता रहा, लेकिन ऐतिहासिक कारणों से बाद में बंगाली लिपि का इस्तेमाल बढ़ गया।
21वीं सदी में मेइतेई मयेक को फिर से स्कूलों, विश्वविद्यालयों, सरकारी दस्तावेज़ों और सार्वजनिक संकेतकों में जगह मिलने लगी। आज मणिपुर में नई पीढ़ी अपनी मूल लिपि सीख रही है और इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक माना जाता है।
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संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद मेइतेई भाषा को कई महत्वपूर्ण संवैधानिक लाभ मिले।
भाषा के विकास और संरक्षण के लिए केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी बढ़ी।
साहित्य और अनुवाद को संस्थागत समर्थन मिला।
संघ लोक सेवा आयोग जैसी परीक्षाओं में भाषा के उपयोग की संभावनाएँ बढ़ीं।
सांस्कृतिक संस्थाओं और शोध कार्यों को नई पहचान मिली।
मेइतेई भाषा का साहित्य बेहद समृद्ध माना जाता है। इसके प्राचीन ग्रंथ पुया ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। लोकनृत्य रासलीला, पारंपरिक रंगमंच, लोकगीत और आधुनिक सिनेमा ने भी इस भाषा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
अब मेइतेई भाषा केवल किताबों तक सीमित नहीं है। यूनिकोड में मेइतेई मयेक के शामिल होने के बाद मोबाइल, कंप्यूटर और सोशल मीडिया पर इसका इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा है। शोधकर्ता टेक्स्ट-टू-स्पीच, मशीन अनुवाद और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित तकनीकों पर भी काम कर रहे हैं, जिससे डिजिटल दुनिया में इस भाषा की मौजूदगी और मजबूत हो रही है।
हालाँकि संवैधानिक मान्यता मिल चुकी है, लेकिन भाषा विशेषज्ञ मानते हैं कि मेइतेई के सामने कई चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं।
डिजिटल सामग्री का सीमित भंडार।
मूल लिपि के व्यापक प्रसार की आवश्यकता।
युवाओं में स्थानीय भाषा के उपयोग को बढ़ावा देने की चुनौती।
शिक्षा और तकनीक में अधिक संसाधनों की ज़रूरत।
इसी कारण 20 अगस्त केवल एक ऐतिहासिक तारीख नहीं, बल्कि भाषा और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के संकल्प का दिन भी माना जाता है।
20 अगस्त हमें याद दिलाता है कि भारत की भाषाई विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है। जिस तरह मेइतेई भाषा ने दशकों के संघर्ष के बाद संवैधानिक पहचान हासिल की, उसी तरह यह दिन क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और सम्मान का संदेश भी देता है।
Updated on:
20 Aug 2026 12:09 pm
Published on:
20 Aug 2026 12:09 pm
