
mountain women self reliance through YouTube
Mountain women self reliance Youtube skill: यूट्यूब से हुनर सीखकर आत्मनिर्भरता की नई तस्वीर पेश करने वाली यह कहानी उन गांवों की है जहां एक-एक हुनर ने महिलाओं के लिए नई पहचान और आत्मनिर्भरता की राह खोल दी है। इनका टीचर और प्रशिक्षक दोनों ही यूट्यूब रहा। लोक कला और संस्कृति को बचाते इस हस्तशिल्प यात्रा ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक सोच बदलने में भी अहम भूमिका निभाई है।
उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के हटवाल गांव की अंजलि ने बिना किसी संस्थागत प्रशिक्षण के यूट्यूब से बुनाई और हस्तशिल्प सीखा। अब वह राखी, हैंडबैग, स्वेटर जैसे उपयोगी उत्पाद बना रही हैं और स्वरोजगार की नई कहानी लिख रही हैं।
यह पहल न केवल उसकी अपनी पहचान बन चुकी है, बल्कि गांव की महिलाओं और युवतियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही है। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल हटवाल ने कहा कि पहाड़ के गांवों में प्रतिभा की कमी नहीं है, बल्कि मंच और प्रोत्साहन की आवश्यकता है और अंजलि इस दिशा में एक मजबूत शुरुआत कर चुकी हैं।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले का एकताल गांव पीढ़ियों से चली आ रही ढोकरा कला के लिए जाना जाता है। यहां लगभग हर परिवार पीतल की मूर्तियां बनाता है, जिसमें सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी तकनीकें आज भी जीवित हैं। गांव के कलाकारों ने अपनी कला से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है और कई ने पुरस्कार भी जीते हैं।
उत्तराखंड के माणा गांव की महिलाएं भेड़ों के ऊन से स्वेटर, कंबल, टोपी जैसे ऊनी उत्पाद बनाती हैं। यह हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है और बद्रीनाथ धाम में चढ़ाने के लिए कंबल भी गांव की महिलाओं द्वारा ही बनाए जाते हैं। मार्च 2026 में प्रकाशित एक शोध पत्र में माणा को जनभागीदारी आधारित विकास का उदाहरण बताया गया है, जिसमें स्वयं सहायता समूहों और आजीविका कार्यक्रमों ने पारंपरिक शिल्प को नए बाजारों से जोड़ा है।
उत्तर प्रदेश के शाहबाजपुर कला गांव में चांदी के वर्क का हुनर लगभग 65 वर्ष पहले दिल्ली से आए मौली अंसारी ने शुरू किया था। आज गांव की लगभग 90 प्रतिशत आबादी इस हुनर से जुड़ी है। इस कला ने गांव को आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर किया है और धार्मिक-सांस्कृतिक सीमाओं को पार करते हुए समुदाय को एक सूत्र में पिरोया है।
भारत में हस्तशिल्प क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मजबूत आधार है। दिसंबर 2025 तक लगभग 64.66 लाख हस्तशिल्प कारीगर थे, जिनमें 71% बुनकर महिलाएं थीं। सरकार की एसएफयूआरटीआई योजना के तहत 100 से ज्यादा हस्तशिल्प क्लस्टर बनाए गए हैं, ताकि ग्रामीण कारीगरों को सशक्त और स्व-शासित उद्यमी बनाया जा सके।
बिहार के सीतामढ़ी और मिथिला क्षेत्र में पारंपरिक हस्तकलाओं जैसे सिक्की घास की टोकरियां, लकड़ी के खिलौने और मिट्टी के बर्तन पीढ़ी दर पीढ़ी बनते आए हैं। लेकिन ये हुनर अब तक बाजार में कठिनाई से पहुंच पाता है। ऐसे में उचित मूल्य न मिलने और बाजार की कमी के कारण युवा पीढ़ी इन कलाओं से दूर होती जा रही है।
इन गांवों की कहानियां बताती हैं कि हुनर केवल कला नहीं, बल्कि पहचान और आजीविका का जरिया भी है। चाहे वह यूट्यूब से सीखा हुनर हो, पीतल की मूर्तियां, ऊनी शिल्प या चांदी का काम, हर गांव ने अपनी परंपरा को आत्मनिर्भरता से जोड़ा है। सरकारी योजनाएं जैसे एसएफयूआरटीआई ने इस दिशा में मदद की है, लेकिन बाजार तक पहुंच और उचित मूल्य सुनिश्चित करना अभी भी चुनौती बना हुआ है।
इन गांवों की सफलता से सीखकर यदि देश के अन्य ग्रामीण इलाकों में भी हुनर और स्वरोजगार के रास्ते खुल जाएं, तो ने केवल भारतीय गांवों की कला और संस्कृति बचेगी बल्कि कई नई आर्थिक और सामाजिक स्थितियां बदलेंगी।
पंचायत और सरपंच स्तर पर स्थानीय हस्तशिल्प को पहचान देने, बाजार से जोड़ने और प्रशिक्षण-मार्केटिंग की व्यवस्था की जाए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।
अगला और बड़ा कदम ऐसा हो कि ये हाथों का हुनर गांवों से निकलकर देश और दुनिया के बाजारों में अपनी पहचान कायम कर सके। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जब हुनर चमकता है, तभी आत्मनिर्भरता की रोशन राह खुलती है।
Updated on:
28 Aug 2026 01:36 pm
Published on:
28 Aug 2026 01:36 pm
