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कम लागत और बेहतर मिट्टी के लिए अपनाएं जैविक खेती, सफल किसानों से जानें सही रास्ता

क्या आप जानते हैं कि जैविक खेती किसानों की जिंदगियों में बदलाव ला रही है? आइए कुछ प्रेरणादायक कहानियों के जरिए जानते हैं कि ये खेती कैसे आपको फायदा पहुंचाती है।
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भारत

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Adarsh Thakur

Aug 25, 2026

Organic Farming

जैविक खेती के फायदे। (फोटोः एआई)

जैविक खेती आज के समय में किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती है। यह खेती मिट्टी की सेहत तो सुधारती ही है, साथ ही किसान की आमदनी और जीवन की गुणवत्ता में भी वृद्धि लाती है। आइए समझते हैं कि जैविक खेती कैसे लाभदायक हो सकती है और इसका असर किसान, समाज और पर्यावरण पर किस प्रकार पड़ता है।

अलग-अलग क्षेत्रों में जैविक खेती के लाभ

राजस्थान, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में अनेक किसान और समूह जैविक खेती अपनाकर सफल हुए हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में जदूनंदन प्रसाद वर्मा और उनकी पत्नी दिव्या वर्मा ने रासायनिक खेती छोड़कर जैविक पद्धति अपनाई। उन्होंने धान के साथ-साथ स्ट्रॉबेरी, रंगीन फूलगोभी और विदेशी फल-फूलों की खेती शुरू की। इससे उनकी वार्षिक आमदनी ₹2.5–3 लाख तक पहुंच गई है।

रांची के नगड़ी प्रखंड में “जैविक दीदी” के नाम से प्रसिद्ध महिलाएं जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक बनाकर खेती कर रही हैं। उन्होंने जीवामृत, वर्मी कम्पोस्ट, नाडेप कम्पोस्ट, ब्रह्मास्त्र, नीमास्त्र आदि तैयार कर खेती में उपयोग किया। इससे लागत कम हुई और मिट्टी की उर्वरता बनी रही।

सिक्किम भारत का पहला 100% जैविक राज्य बन चुका है। 2003 में इस दिशा में पहला कदम उठाया गया और 2014 तक रासायनिक इनपुट पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया। इस नीति के चलते सिक्किम को FAO का Future Policy Gold Award भी प्राप्त हुआ।

लक्षद्वीप ने भी जैविक खेती को जीवनशैली बना लिया है। 2005 से रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग बंद कर दिया गया। अब वहां की खेती पूरी तरह जैविक है, हालांकि प्रमाणन और बाजार तक पहुंच बढ़ाने की दिशा में कार्य जारी है।

मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के अवलिया गांव के किसान रमेश्वर बड़िया ने पारंपरिक खेती छोड़कर जैविक खेती अपनाई। उनकी कहानी बताती है कि कैसे एक किसान जैविक पद्धति से मिट्टी की सेहत सुधारकर स्थायी खेती की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

इंटीग्रेटेड ऑर्गेनिक फार्मिंग सिस्टम (IOFS) अपनाने वाले किसान भी लाभ में हैं। उदाहरण के लिए, अंडमान निकोबार के श्री लेस्ली ने सब्जी, फल, पोल्ट्री, पिग्गरी, मधुमक्खी पालन और नारियल से कॉप्रा उत्पादन को एकीकृत कर खेती की। इससे उन्हें वार्षिक ₹2.43 लाख का शुद्ध लाभ हुआ।

सतत खेती की दिशा में प्राकृतिक खेती (Natural Farming) का भी बड़ा योगदान है। आंध्र प्रदेश में कई किसान गोबर, गौमूत्र और गुड़ से बने जैविक मिश्रण का उपयोग कर रहे हैं। इससे मिट्टी में जलधारण क्षमता बढ़ी है और फसलें तूफानों व भारी वर्षा में भी सुरक्षित रहती हैं। राज्य में अब तक लगभग 7 लाख किसान प्राकृतिक खेती की ओर अग्रसर हो चुके हैं।

जैविक खेती के लाभ और चुनौतियां

जैविक खेती में प्रारंभ में उत्पादन कम हो सकता है और श्रम अधिक लग सकता है, लेकिन लागत कम होने और उत्पाद की बेहतर कीमत मिलने से इसकी भरपाई हो जाती है। जैसे, राजस्थान के कुशल पाल सिंह ने जैविक खेती के माध्यम से मिट्टी की सेहत सुधारते हुए पारंपरिक खेती की तुलना में अधिक आमदनी प्राप्त की है।

लागत घटाने में जैविक खाद, गोबर, वर्मी कम्पोस्ट, जीवामृत जैसे घरेलू संसाधनों का उपयोग सहायक होता है। इससे रासायनिक खाद की लागत बचती है और मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।

लाभदायक मॉडल और सामाजिक प्रभाव

जैविक खेती केवल आर्थिक लाभ नहीं देती, यह सामाजिक और पर्यावरणीय बदलाव भी लाती है। सिक्किम और लक्षद्वीप जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि नीति और समुदाय की भागीदारी से जैविक खेती को बड़े स्तर पर अपनाया जा सकता है।

अंडमान निकोबार में एकीकृत मॉडल ने खेती को विविधता और स्थिरता दी। इससे किसान की आय बढ़ी, मिट्टी स्वस्थ हुई और जोखिम कम हुआ।

प्राकृतिक खेती ने आपदा-प्रवण क्षेत्रों में भी फसल सुरक्षा और मिट्टी की क्षमता बढ़ाई है। इससे किसान आपदा के बावजूद खेती जारी रख पा रहे हैं।

क्या युवा किसान इस राह पर आगे बढ़ सकते हैं?

निश्चित रूप से। जैविक खेती अपनाने के लिए किसान निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं:

– सबसे पहले छोटे स्तर पर जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक बनाकर प्रयोग करें।
– स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता लें।
– एकीकृत मॉडल अपनाएं, जैसे सब्जी, फल, पशुपालन, मधुमक्खी पालन को मिलाकर खेती करें।
– उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखें और स्थानीय मंडी या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म (जैसे eNAM) से बेहतर दाम प्राप्त करें।
– समाज में साझा करें, जैसे “जैविक दीदी” ने किया, ताकि दूसरों को भी प्रेरणा मिले।

जोखिम और सावधानियां

– प्रारंभ में उत्पादन कम हो सकता है, इसलिए संयम और धैर्य आवश्यक है।
– प्रमाणन और बाजार तक पहुंच चुनौती हो सकती है, इसलिए समूह या FPO (फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन) के माध्यम से कार्य करना बेहतर होता है।
– बड़े निवेश से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें।

(डिस्क्लेमरः यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। अधिक जानकारी के लिए कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें।)